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सर्वकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

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प्रथम लम्बक. ९९
जब स्वामि कार्तिक के मन्दिर का मार्ग कुछ ही शेष रह गया तब मैं कठोर तप (निराहार)
से दुर्बल होकर थका हुआ अचेतन (बेहोश) होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा ॥५॥
तब मुझे अचेतनावस्था में ऐसा लगा कि हाथ में पवित्र (अस्त्र) लिये हुए कोई पुरुष
मुझे कह रहा है—'पुत्र उठो तुम्हारा सब कार्य सफल होगा' ॥६॥
अमृतवर्षा से सिंचन-सा मैं उस समय चैतन्य हुआ। भूख-प्यास नष्ट हो जाने के कारण
मैं पुनः स्वस्थ-सा हो गया ॥७॥
भक्ति भाव से भरा हुआ मैं देवस्थल पर पहुँचकर और स्नान करके मन्दिर के आन्तरिक
भाग में जाकर कुछ व्याकुल हो गया ॥८॥
मन्दिर के अन्तर्गृह में स्कन्द स्वामी ने मुझे दर्शन दिये। उनके दर्शन होते ही मेरे
मुँह में साक्षात् मूर्त्तिमती सरस्वती ने प्रवेश किया ॥९॥
तदनन्तर भगवान् स्कन्द ने अपने छहों मुखकमलों से 'सिद्धो वर्णसमाम्नाय' यह
सूत्र कहा ॥१०॥
यह सुनकर मानव-स्वभाव-सुलभ चञ्चलता से मैंने इसके आगे का सूत्र स्वयं अपनी कल्पना
के आधार पर कह दिया ॥११॥
मेरे स्वयं सूत्र बोल देने पर स्कन्द स्वामी ने कहा कि यदि तुम मानव-स्वभाव-सुलभ
चंचलता से स्वयं न बोल बैठते तो यह मेरा बनाया हुआ व्याकरण-शास्त्र पाणिनीय व्याकरण
को नीचा दिखा देता ॥१२॥
अब यह स्वल्प विस्तार के कारण कातन्त्र के नाम से प्रसिद्ध होगा। मेरे वाहन मयूर
के पक्षों के नाम पर इसका दूसरा नाम कालापक या कलाप भी होगा' ॥१३॥
ऐसा कहकर और अतिशय एवं संक्षिप्त व्याकरण को प्रकाशित करके स्कन्ददेव ने
मुझसे फिर कहा—॥१४॥
'वह तुम्हारा राजा (सातवाहन) पूर्वजन्म में परम तपस्वी कृष्ण नाम का ऋषि था और
भरद्वाज मुनि का शिष्य था ॥१५॥
एक बार वह कृष्णमुनि अपनी ओर आवती किसी मुनि कन्या को देखकर सहसा कामवश
हो गया ॥१६॥
इसी कारण मुनियों ने उसे शाप दिया और पृथ्वी पर मानव (सातवाहन) के रूप में
अवतीर्ण हुआ और वही मुनि-कन्या उसकी महारानी के रूप में अवतीर्ण हुई है ॥१७॥
इस प्रकार यह राजा सातवाहन ऋषि का अवतार है। तुम्हें देखते ही तुम्हारी इच्छा
से समस्त विद्याओं को प्राप्त कर लेगा ॥१८॥
पूर्वजन्म के उत्तम संस्कारों से प्राप्त सिद्धि के कारण भाग्यशाली व्यक्तियों के प्रयोजन
बिना कष्ट या विघ्न के ही सिद्ध हो जाते हैं ॥१९॥