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सर्वकोश
कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ

पृष्ठ 20, कुल 182 में से

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पृष्ठ 20
८कठोपनिषद्[ अध्याय १

नचिकेताकी शङ्का

पीतोदका जग्धतृणा दुग्धदोहा निरिन्द्रियाः ।
अनन्दा नाम ते लोकास्तान्स गच्छति ता ददत् ॥३॥

जो जल पी चुकी हैं, जिनका घास खाना समाप्त हो चुका है, जिनका दूध भी दुह लिया गया है और जिनमें प्रजननशक्तिका भी अभाव हो गया है उन गोओंका दान करनेसे वह दाता, जो अनन्द (आनन्द-शून्य) लोक हैं उन्हींको जाता है ॥ ३ ॥

| दक्षिणार्था गावो विशेष्यन्ते पीतमुदकं याभिस्ताः पीतोदकाः, जग्धं भक्षितं तृणं याभिस्ता जग्धतृणाः, दुग्धो दोहः क्षीराख्यो यासां ता दुग्धदोहाः, निरिन्द्रिया अप्रजननसमर्था जीर्णा निष्फला गाव इत्यर्थः । यास्ता एवंभूता गा ऋत्विग्भ्यो दक्षिणाबुद्ध्या ददत्प्रयच्छन्ननन्दा अनानन्दा असुखा नामेत्येतद्ये ते लोकास्तान्स यजमानो गच्छति ॥ ३ ॥ | दक्षिणाके लिये लायी हुई गौओंका विशेषण बतलाते हैं; जिन्होंने जल पी लिया है वे पीतोदका कहलाती हैं, जो तृण (घास) खा चुकी हैं [अर्थात् जिनमें और घास खानेकी शक्ति नहीं रही है] वे जग्धतृणा हैं, जिनका क्षीर नामक दोह दुहा जा चुका है वे दुग्धदोहा हैं तथा निरिन्द्रिया—जो सन्तान उत्पन्न करनेमें असमर्था अर्थात् बूढ़ी और निष्फल गौएँ हैं उन इस प्रकारकी गौओंको दक्षिणा-बुद्धिसे देनेवाला यजमान जो अनन्द अर्थात् सुखहीन लोक हैं उन्हींको जाता है ॥ ३ ॥ |

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