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काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ
५४६काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्क्षीरगुणविशेषीयाध्यायः २२]

क्षीरं सात्म्यं हि बालानां क्षीरं जीवनमुच्यते । क्षीरं पुष्टिकंर वृद्धिकरं बलविवर्धनम् ।।
क्षीरमोजस्करं पुंसां क्षीरं प्राणगुणावहम् । गर्भधानकरं क्षीरं बन्ध्यानामपि योषिताम् ।।

बालकों के लिये दूध सात्म्य होता है तथा उनका जीवन होता है (अर्थात् उनके लिये जीवन तुल्य होता है) । यह पुष्टि, शरीर की वृद्धि तथा बल को बढ़ाने वाला है । दूध प्राणियों में ओज को बढ़ाता है तथा प्राणों को बलवान् बनाता है तथा यह बन्ध्या (बांझ) स्त्रियों में गर्भ का स्थापन कराता है । अर्थात् इसमें गर्भस्थापक गुण हैं ।।

क्षीणानां च कृशानां च शोषिनां राजयक्ष्मणाम् ।
व्यायामश्रमनित्यानां स्त्रीनित्यानां च देहिनाम् ।।
संक्षीणरेतसां चापि गर्भस्त्रावे च दारुणे । रक्तपित्तामयेऽर्शस्सु मदक्षीणे ज्वरे तथा ।।
गर्भशोषे च वातानां क्षीरं परममुच्यते ।

यह क्षीण, कृश, शोथ तथा राजयक्ष्मा (क्षय) के रोगियों, नित्य व्यायाम, परिश्रम का कार्य तथा नित्य स्त्रीसंभोग करने वाले एवं जिनका वीर्य क्षीण (निर्बल) हो गया है—उन मनुष्यों में हितकर माना गया है । इसके अतिरिक्त दारुण गर्भस्राव (Severe Abortion), रक्तपित्त, अर्श, मद के कारण हुई क्षीणता, ज्वर तथा वायु के कारण हुए गर्भशोष में दूध अत्यन्त हितकर माना गया है । सुश्रुत सू. अ. ४५ में दूध के सामान्य गुण अत्यन्त विस्तार से दिये गये हैं ।।

सामान्यादिह दुग्धानां पुरा चोक्ता गुणादयः ।।
पृथक्त्वेन च वक्ष्यामि गवादीनां विशेषणम् ।

ये सम्पूर्ण दूध के सामान्य गुण कहे गये हैं। अब मैं गौ आदि के दूध का विशेष रूप से पृथक् २ वर्णन करूंगा ।।

तृणगुल्मौषधीनां च अग्राग्रं पय एव हि ।।
खादन्ति मधुरप्रायं लवणं च विशेषतः । तत्सारगुणवैशेष्याद्गवां क्षीरं प्रशस्यते ।।

गौ के दूध के गुण—गौ का दूध तृण, गुल्म और ओषधियों का प्रधान अथवा सारभाग होता है । गौएं मधुर एवं लवण प्रधान द्रव्यों का भक्षण करती हैं । इसलिये गौओं का दूध उन सबका सार होने के कारण प्रशस्त माना गया है ।।

मधुरो हि रसः श्रेष्ठो रसानां परिकीर्तितः । तन्नित्यं वा गवां क्षीरं मधुरं बृंहणं मतम् ।।

सम्पूर्ण रसों में मधुर रस श्रेष्ठ माना गया है। उसका नित्य सेवन करने के कारण गौओं का दूध मधुर एवं बृंहण होता है ।।

औषधाग्रातिभक्षत्वाद्विरेचयति तत् पयः । एतस्मात् कारणादुक्तं गवां क्षीरं रसायनम् ।।

ओषधियों के प्रधान अंश का अत्यधिक भक्षण करने के कारण वह (गोदुग्ध) विरेचन कराता है । इसी कारण से गौ का दूध रसायन माना गया है । ये सब गोदुग्ध के विशेष गुण कहे गये हैं। इसी प्रकार चरक सू. अ. २७ तथा सुश्रुत अ. ४५ में भी कहा है । आहार के विषय में पाश्चात्य विद्वान् Robert Mc carrison ने अपनी ‘Food’ नामक पुस्तक में विस्तृत रूप से लिखा है ।।

एष वैशेषिकगुणो गोक्षीरस्य प्रकीर्तितः । क्रिमीकीटपतङ्गैश्च सर्पैरपि तृणाश्रितैः ।।
सह नानातृणं हीनं महिष्यो भक्षयन्ति हि । अवगाहन्ति तोयानि गर्भाणि च विशेषतः ।।
एतस्ताम् कारणात्तासां क्षीरं कषायशीतलम् । शीतत्वाद् दुर्जरं स्निग्धं (गुरु) दाहनिबर्हणम् ।।
गवां क्षीराच्चाल्पा (गु)णं महिषीणां पयो मतम् ।

क्षीरगुणविशेषीयाध्यायः २२] खिलस्थानम् ५४७

भैंस के दूध के गुण—भैंसे तृण घास आदि में रहने वाले कृमि, कीड़े, पतङ्गे तथा सांप आदि के साथ नाना प्रकार की हीन (निकृष्ट) तथा घास को खाती हैं। तथा वे पानी में अवगाहन करती रहती हैं अर्थात् पानी में बैठी रहती हैं इस लिये उनका (भैंसों का) दूध कषाय एवं शीतल होता है। शीतल होने से वह दुर्जर, स्निग्ध, गुरु (भारी) तथा दाह को शान्त करने वाला है। इसलिये भैंसों का दूध गाय के दूध की अपेक्षा अल्पगुणों वाला होता है। इसी प्रकार चरक सू. अ. २७ तथा सुश्रुत सू. अ. ४५ में भी कहा है॥

अजानामल्पकायत्वात् कटुतिक्तानिबर्हणात् ।।
अल्पत्वाच्च बलित्वाच्च लघु दोषहरं पयः । अल्पत्वात्तद्धनं क्षीरं घनत्वादपि बृंहणम् ।।
शीतं संग्राहि मधुरं बल्यं वातानुलोमनम् ।

बकरी के दूध के गुण—बकरियों के सूक्ष्म काय होने के कारण तथा कटु एवं तिक्त द्रव्यों (वृक्ष आदि के पत्तों) के सेवन करने से तथा उनके दूध के अल्प एवं बलवान् होने के कारण बकरी का दूध लघु एवं दोषनाशक होता है। वह दूध अल्प (परिमाण में थोड़ा) होने के कारण घन (सान्द्रगाढ़ा) होता है तथा घन होने से वह बृंहणकारक होता है। वह दूध शीतल, संग्राही, मधुर, बलवान् तथा वायु का अनुमोदन करने वाला होता है। इसी प्रकार चरक सू. अ. २७ तथा सुश्रुत सू. अ. ४५ में भी कहा है॥

महाशयतया श्याम(न)मधुरप्रायसेवनात् ।।
बहुत्वाच्च घनत्वाच्च बल्यं पुष्टिकरं पयः । गुरु वृष्यं च निर्दिष्टं मधुरं च विशेषतः ।।
अल्पाहारतयोष्ट्रीणां प्रियं चाऽऽलवणं ...... ।।
(इति ताडपत्रपुस्तके २५९ त¹मं पत्रम् ।)

ऊंटनी के दूध के गुण—ऊंटनी के शरीर के बहुत बड़ा एवं श्याम वर्ण का होने से, मधुर प्राय ओषधियों के सेवन करने से तथा दूध के परिमाण में अधिक होने से ऊंटनी का दूध बल्य (Tonic), पुष्टिकारक, गुरु, वृष्य तथा विशेषकर रस में मधुर होता है। ऊंटनी के आहार कम करने से वह दूध प्रिय तथा ईषत् लवण (नमकीन) होता है। इसी प्रकार चरक सू. अ. २७ तथा सुश्रुत सू. अ. ४५ में भी कहा है॥

वक्तव्य—इससे आगे यह अध्याय खण्डित है। उस खण्डित अंश में बचे हुए प्राणियों के प्रत्येक के दूध का इसी प्रकार पृथक् २ वर्णन होना चाहिये। अब हम अन्य ग्रन्थों के आधार पर बचे हुए प्राणियों के दूध के गुणों का वर्णन करेंगे। भेड़ के दूध के गुण—यह पित्त और कफ को बढ़ाने वाला है। (च.सू. अ. २७)। हथिनी के दूध के गुण—'हस्तिनीनां पयोबल्यं गुरु स्थैर्यकरं परम्' । (चरक सू. अ. २७)। घोड़ी, गधी आदि एक शफवाले प्राणियों के दूध के गुण—यह रूक्ष, लघु, मधुर, अम्ल तथा अनुरस में लवण है—तथा शाखागत वात रोगों को नष्ट करता है (सुश्रुत सू. अ. ४५)। शाखा का अभिप्राय हाथ, पैर आदि से है। स्त्री के दूध के गुण—'जीवनं बृंहणं सात्म्यं स्नेहनं मानुषं पयः । नावनं रक्तपित्त च तर्पणं चाक्षिशूलिनाम् ॥' (चरक. सू. अ. २७)। आजकल के विद्वान् भी दूध को पूर्ण भोजन (Perfect food) मानते हैं। दूध में लगभग वे सब घटक न्यूनाधिक रूप में विद्यमान होते हैं जो मनुष्य के शरीर के पोषण तथा वृद्धि के लिये आवश्यक होते हैं। दूध प्रत्येक प्राणी को जातिसात्म्य होता है इसीलिये दूध बालक, वृद्ध, युवा, स्त्री, प्रौढ़-प्रत्येक अवस्था में हितकर एवं सात्म्य होता है। बालक तथा वृद्ध व्यक्तियों के लिये तो जीवन का सबसे अधिक सहारा होता है। दूध एक प्रकार का स्नेह का घोल (Emmulsion) होता है अर्थात् इसमें स्नेह के कण (Fat globules) अत्यन्त सूक्ष्म अवस्था में विद्यमान होते हैं इसीलिये यह अत्यन्त सुपच होता है।


१. अस्याग्रे एकं पत्रं खण्डितं ताडपत्रपुस्तके।

५४८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् पानीयगुणविशेषीयाध्यायः २३]

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यह अध्याय भी प्रारंभ में खण्डित है। अध्याय के अन्त के समाप्तिसूचक लेख को देखकर ही इस अध्याय का 'पानीयगुणविशेषीय' यह नाम प्रतीत होता है। इस अध्याय में भिन्न २ प्रकार के जलों के विशेष गुण दिये गये हैं। अब हम प्राप्त एवं खण्डित श्लोकों की यथासंभव व्याख्या करते हैं।

अतीते प्रथमे मासि प्रावृट्प्रौष्ठपदागमे ।।
दिव्यं खात् पतितं तोयं नाम्ना हंसोदकं शिवम् ।
आपूतं सूर्यतेजोभिरगस्त्येनाऽविषीकृतम् ।।

प्रावृत्त ऋतु (आषाढ़ तथा श्रावण मास) और प्रौष्ठपद (भाद्रपद मास-वर्षा ऋतु का प्रारम्भ) के व्यतीत हो जाने पर प्रथम मास में अर्थात् शरदऋतु (कार्तिक तथा मार्गशीर्ष) में आकाश से गिरनेवाला दिव्य जल 'हंसोदक' कहलाता है। यह जल कल्याणकारक एवं पवित्र होता है तथा सूर्य के तेज एवं अगस्त्य नक्षत्र के उदय होने के कारण विषरहित हो जाता है। अर्थात् शरद् ऋतु से पूर्व वर्षा में जल अत्यन्त मलिन एवं अपरिपक्व (अम्लविपाक) होता है—उसका सम्यक् पाक नहीं होता है। उस जल में वर्षा के कारण बहुत मलिनताएं होती हैं। वह जल पीने के योग्य नहीं होता है। इस जल के सेवन में अनेक प्रकार के संक्रामक रोग होने का भय रहता है। इसीलिये चरक में कहा है—'उदमन्थं दिवास्वप्नमवश्यायं नदीजलम् ......... चात्र वर्जयेत् ।। इसके बाद शरदऋतु में वही जल काल द्वारा सम्यक् परिपक्व होकर दोषरहित तथा अगस्त्य नक्षत्र के उदय होने से विषरहित हो जाता है। उस जल को 'हंसोदक' कहते हैं। इस जल का सेवन करना चाहिये। हंसोदक का अर्थ सूर्य और चन्द्रमा के कारण निर्मल हुआ अथवा हंस के समान निर्मल जल होता है।।

..................................... । ...................................ति ।।
स्निग्धं वृष्यं च बल्यं च हेमन्ते गुरु वर्षति । शिशिरे वर्षति जलं कफवातप्रकोपनम् ।।
वसन्ते वर्षति जलं कषायस्वादुरूक्षणम् । तत्र ................................. ।।

....... हेमन्त ऋतु में वर्षा के समय जल स्निग्ध, वृष्य, बलवान् तथा गुरु होता है। शिशिर ऋतु में बरसने वाला जल कफ तथा वायु को प्रकुपित करता है। तथा वसन्त में बरसने वाला जल कषाय, स्वादु तथा रूक्ष होता है। ..... भिन्न २ ऋतुओं में बरसने वाले जलों के गुण पृथक् २ होते हैं। चरक सू. अ. २७ में इसका वर्णन किया गया है।।

.................. (पति)तं क्षितौ । तत् पात्रोपेक्षितवति पात्रदोषेण तत्त्वतः ।।
नानारसत्वं भजते तोयं संप्राप्य भूत लम् ।

....... अन्तरिक्ष से गिरता हुआ जल भूमि पर पहुंचकर पात्र (स्थान) की अपेक्षा रखता है। पात्रों (भिन्न २ स्थानों) के दोषों के अनुसार वह भूमि पर पहुँच कर अनेक रसों वाला हो जाता है।

**वक्तव्य—**साधारणतया आन्तरिक्ष जल का कोई रस नहीं होता है। उसका रस अव्यक्त माना गया है। परन्तु जब वह बरस कर नीचे भूमि पर आता है तब उसमें आकाश, वायुमण्डल तथा भूमि की अनेक मलिनताओं के मिल जाने से वह जल अनेक रसों वाला हो जाता है। आन्तरिक्ष जल सब जगह का एक ही गुण वाला होता है। परन्तु भिन्न २ स्थानों की भूमि के गुण भिन्न २ हुआ करते हैं। उस २ भूमि पर पहुंचने पर वह अव्यक्तरस वाला आन्तरिक्ष जल भिन्न २ रसोंवाला हो जाया करता है। चरक सू. अ. २७ तथा सुश्रुत सू. अ. ४५ में भी इसी प्रकार कहा गया है।।


CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पानीयगुणविशेषीयाध्यायः २३] खिलस्थानम् ५४९

सर्वाम्बु सद्यःपतितमप्रशस्तमनार्तवम् ।।
त ...................................... । ................................... रूदकम् ।।

सम्पूर्ण जल जो सद्यः पतित हों तथा बेमौसमी हों वे अप्रशस्त माने गये हैं। ..... वर्षा ऋतु के अतिरिक्त दूसरी ऋतुओं के आन्तरिक्ष जल का प्रयोग नहीं करना चाहिये। सुश्रुत सू. अ. ४५ में भी ऐसा कहा गया है॥

कफानिलकरं पित्ते हितं शीतातिकारकम्। रक्तापित्तहरं रूक्षमवश्यायोदकं लघु ।।
एतच्चतुर्विधं प्रोक्तं तत्त्वेनाम्भोऽन्तरिक्षजम्। सह .................................... ।।
............................................................... श्लेष्मप्रकोपनाः ।

अवश्याय (ओस) का जल, कफ तथा वायु को बढ़ाने वाला है, पित्त में हितकर है, अत्यन्त शीतकारक है, रक्तपित्त को नष्ट करता है और रूक्ष तथा लघु है। यह आन्तरिक्ष जल चार प्रकार का कहा गया है। ........

वक्तव्य—यहां चार प्रकार के आन्तरिक्ष जलों में से केवल एक अवश्याय (ओस) जल का वर्णन मिलता है। शेष तीन का वर्णन उपलब्ध नहीं है। तत्संबंधी श्लोक खण्डित हैं अतः उनके विषय में निश्चय से कुछ नहीं कहा जा सकता है। सुश्रुत सू. अ. ४५ में भी चार प्रकार के आन्तरिक्ष जल का वर्णन मिलता है। कहा है—तत्रान्तरीक्षं चतुर्विधम्। तद्यथा—धारं कारं तौषारं हैममिति। अर्थात् जो धारारूप में वर्षा हो उसे ‘धार’ कहते हैं। यदि ओले गिरें तो उस जल को ‘कार’, ‘तुषार’ (Snow या ओस) के रूप में गिरने वाले जल को तौषार तथा हिम (बर्फ-Ice) के रूप में गिरने वाले जल को ‘हैम’ जल कहते हैं॥

क्षारोदाः प्राक्सृता नद्यः कफघ्नाः पित्तकोपनाः ।।
लघूदकाः प्रतीचीगा वातलाः कफनाशनाः । क्षारं ताभ्यस्तु सामुद्रं मधुरं गुरु पच्यते ।।
...................................................... । ........................ लवणं जलम् ।।

पूर्व की ओर बहने वाली नदियों का जल क्षारयुक्त होता है तथा वह कफनाशक और पित्तप्रकोपक होता है। पश्चिम की ओर बहने वाली नदियों के जल लघु, वातकारक तथा कफनाशक होते हैं। सामुद्रजल क्षारयुक्त, मधुर, गुरु ....... एवं लवणयुक्त होता है।

वक्तव्य—यहां भिन्न २ दिशाओं की ओर बहने वाली नदियों के जलों के गुण दिये गये हैं। चरक (सू. अ. २७), सुश्रुत (सू. अ. ४५), अष्टाङ्ग हृदय आदि ग्रन्थों में भी इसी प्रकार का वर्णन मिलता है॥

साभिष्यन्दि स्वादुपाकि शीतं पित्तघ्नमौद्भिदम्।
सत्त्वक्लेदमलाद् दुष्टं पल्बलाम्बु गुरु स्मृतम् ।।
कषायमधुरं स्वादु विमलं सारसं जलम्। कौपं पि ................................ ।।
.................................................... । इत्यष्टधा जलं प्रोक्तं भूमिजं वृद्धजीवक ! ।।

औद्भिद जल के गुण—औद्भिद जल अभिष्यन्दि, स्वादुपाकी (मधुर विपाक वाला), शीतल तथा पित्तनाशक होता है। पल्वल का जल-पल्वल का जल सत्त्व, क्लेद तथा मल के कारण दूषित होता है तथा गुरु होता है। सरोवर का जल—सरोवर का जल कषाय, मधुर, स्वादु तथा निर्मल होता है। कूप का जल.... (खारा, पित्तकारक, कफनाशक, दीप लघु होता है—सुश्रुत के आधार पर यह अर्थ किया गया है) हे वृद्धजीवक ! इस प्रकार यह आठ तरह का भौमजल कहा गया है।

५५० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् पानीयगुणविशेषीयाध्यायः २३]

वक्तव्य—यहां श्लोकों के खण्डित होने से आठो प्रकार के जलों का वर्णन उपलब्ध नहीं है। केवल तीन चार प्रकार के जलों का संक्षेप से वर्णन मिलता है। सुश्रुत सू. अ. ४५ में सात प्रकार के भौम जल दिये हैं—तत्पुनः सप्तविधम् । तद्यथा-कौपं, नादेयं, सारसं, ताडागं, प्राप्रवणं, औद्भिदं, चौण्ट्यमिति । इससे आगे इन भौमजलों के पृथक् २ गुणों का वर्णन भी सुश्रुत में वहीं पर किया गया है ॥

लघु प्रकामं सस्नेहं शीतं सर्वरसान्वितम् । तृष्णापहं मनोल्हादि श्लेष्मघ्नं क्रिमिनाशनम् ।।
रक्षोघ्नं जीवनं वृष्यं मूर्च्छघ्नं ........ । ........................................ ।।

सेवनीय जल—जो जल लघु, ईषत् स्नेहयुक्त, शीतल तथा सब रसों से युक्त हो, जो तृष्णा को शान्त करता हो, मन को आह्लादित करता हो, श्लेष्मा, कृमि तथा जन्तुओं का नाशक हो, जीवन को देनेवाला हो, वृष्य हो तथा मूर्च्छा को नष्ट करता हो—वह जल सेवन करने योग्य होता है ॥

............ सूक्ष्मप्राणिसमाकुलम् । बहलं कलुषं चैव तथा पिच्छिलमाविलम् ।
ग्रामक्षेत्ररसैर्दुष्टं विषमूलोपदूषितम् ।।
शकुन्तक्रिमिशैवालयुक्तमत्युष्णचिक्कणम् ।

त्याज्य जल—जिस जल में सूक्ष्म प्राणी (कृमि कीट आदि) हों, जो बहल (घना-सान्द्र), कलुष (कलुषित या मैला), पिच्छिल (चिपचिपा) तथा आविल (मलयुक्त) हो, जो जल ग्राम, क्षेत्र (खेत) तथा अनेक प्रकार के रसों के कारण दूषित हो, जो विषयुक्त मूलों (कन्दों) से विषैला हो, जिसमें अनेक पक्षी, कृमि तथा शैवाल (काई) पड़ी हुई हो तथा जो अत्यन्त गरम एवं चिकना हो—ऐसे जल का त्याग कर देना चाहिये । चरक सू. अं. २७ में भी इसी प्रकार कहा है ॥

........................................................................... ।।
............................ गुर्विणीषु च वर्जयेत् ।
धात्रीणां च विशेषेण स्वस्थानां रोगिणामपि ।।
पूर्वोक्तगुणबाहुल्यात् पानीयं सेव्यमिष्यते ।
विपाके मधुरं शैत्याद्वारि पित्तघ्नमुच्यते ।।

शीतल जल का निषेध .... गर्भिणी स्त्रियों को (शीतल जल का) प्रयोग नहीं कराना चाहिये । पूर्वोक्त गुणों की अधिकता के कारण स्वस्थ अथवा रुग्ण धात्रियों को शीतल जल का प्रयोग कराना चाहिये । शीतल होने के कारण जल विपाक में मधुर होता है । इसीलिये वह पित्तनाशक होता है ।

वक्तव्य—शीतल जल के निषेध के कारण प्रसङ्गवश हम शीतल जल के प्रयोग का विधान भी लिखते हैं जो इस ग्रन्थ में संभवतः खण्डित हो गया है। सुश्रुत सू. अ. ४५ में कहा है—मूर्च्छापित्तोष्णादाहेषु विषे रक्ते मदात्यये । भ्रमक्लमपरीतेषु तमके वमथौ तथा ।। ऊर्ध्वगे रक्तपित्ते च शीतमम्भः प्रशस्यते ॥

................................................................... ।
............. णशीतमुष्णमथापि वा । भक्तस्य पूर्वं पीतं वा कृशत्वं कुरुते शिशोः ।।
भक्तस्य मध्ये पीतं तन्मध्यमत्वं नियच्छति । भक्तस्योपरि पीतं तु पीनत्वं (संप्रयच्छति) ।।

...... भोजन से पूर्व चाहे उष्ण अथवा शीतल जल पीने से शिशु कृश (कमजोर) हो जाता है । भोजन के मध्य में जल का सेवन करने से मध्य अवस्था रहती है तथा भोजन के अन्त में जल का सेवन करने से शिशु मोटा हो जाता है । तन्त्रान्तर में साधारणतया भोजन के बाद जल का पीना प्रशस्त माना गया है परन्तु कुछ रोगों की अवस्था में उसका निषेध किया गया है । ऐसा चरक सू. अ. २७ में कहा है ॥

पानीयगुणविशेषीयाध्यायः २३] खिलस्थानम् ५५१

.................................... । ............ निष्क्वाथोष्णाम्बु पाचनम् ।।
श्रमे भेदेषु तृष्णासु मूर्च्छास्वतिपिपासिते । निष्क्वाथलाघवादम्बु सलिलं तप्तशीतलम् ।।
निर्दिशेत् सर्वदोषघ्नं बालानां ........................... ।

उष्ण जल के गुण—क्वाथ बनाकर गरम किया हुआ जल पाचक होता है । क्वाथ बनाने के कारण लघु हुआ यह जल श्रम, भेद (मलभेद-अतिसार), तृष्णा, मूर्च्छा तथा अत्यन्त पिपासा में उपयोगी है । गरम करके ठण्डा किया हुआ यह जल बालकों के सब रोगों को नष्ट करने वाला कहा गया है । सुश्रुत सू. अ. ४५ में कहा है—कफमेदोऽनिलामघ्नं दीपनं बस्तिशोधनम् । श्वासकासज्वरहरं पथ्यमुष्णोदकं सदा ।। यहां उष्ण किये हुए अथवा क्वाथ बनाकर तैयार किये हुए हुए जल का क्या अभिप्राय है-इसको भी आचार्य स्वयं वहीं स्पष्ट करते हैं कि—जो जल क्वाथ बनाने के कारण हल्का हो गया हो तथा चतुर्थांश शेष रहा हो-वही गुणकारी होता है ।।२४-२५।।

......................................................... ।।
.............. मुष्णोदकं शिशोः । रक्तपित्तामयं त्यक्त्वा प्रायो वातकफात्मके ।।
रोगे शिशुर्वा धात्री वा गुर्विणी वोष्णकं पिबेत् । क्वचिद्रोगविशेषेण तप्तशीतं हितं बहु ।।
(इति ताडपत्रपुस्तके २६१ तमं पत्रम् ।)

रक्तपित्त रोग को छोड़कर प्रायः सब वात एवं कफ के रोगों में शिशु को उष्ण जल का प्रयोग कराना चाहिये । शिशु, धात्री तथा गर्भिणी स्त्री को उष्ण जल का ही प्रयोग कराना चाहिये । किसी २ रोग में गरम करके ठण्डा किया हुआ जल अधिक हितकर माना गया है । ऐसा सुश्रुत सू. अ. ४५ में कहा है । रक्तपित्त रोग में उष्ण जल का निषेध किया गया है क्योंकि उष्णता से रक्तपित्त प्रकुपित हो जाता है ।।

अथान्तरिक्षं शरदि प्रशस्तं संतप्यमानं च रवेर्मयूखैः ।
पिबेत्सरो वाऽथ नदीं तडागं हेमन्तकाले शिशिरे च बालः ।।
वाप्यौद्भिदं प्रास्रवणं हि तोयं ग्रीष्मे प्रशस्तं कुसुमागमे च ।
वर्षासु कौपं सलिलं प्रशस्तमारोग्यहेतोरथ तप्तशीतलम् ।।

बालकों के लिये शरद् ऋतु में सूर्य की किरणों से सन्तप्त (तपाया हुआ) हुआ आन्तरीक्ष जल (वर्षा जल) प्रशस्त माना गया है । हेमन्त तथा शिशिर ऋतु में सरोवर, नदी तथा तडाग (तालाब) का जल पीना चाहिये । ग्रीष्म तथा वसन्त ऋतु में बाबड़ी, औद्भिद अथवा झरने का जल प्रयोग में लाना चाहिये । तथा वर्षा ऋतु में गरम करके ठण्डा किया हुआ कुंए का पानी आरोग्य के लिये हितकर होता है ।।

इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।
(इति) खिलेषु पानीयगुणविशेषीयाध्यायः ।। (२३)

ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।
(इति) खिलेषु पानीयगुणविशेषीयाध्यायः ।। (२३)

५५२ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | मांसगुणविशेषीयाध्यायः २४]

अथ मांसगुणविशेषीयाध्यायश्चतुर्विंशः ।

अथातो मांसगुणविशेषीयं व्याख्यास्यामः ।।१।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।२।।

अब हम मांसगुणविशेषीय अध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था। अर्थात् इस अध्याय में मांस के सामान्य तथा विशेष गुणों का वर्णन किया जायेगा ।।१-२।।

मांसं वृष्यं च बल्यं च मांसं प्राणविवर्धनम् । मांसं पुष्टिकं वृद्धकृशानां मांसवर्धनम् ।।३।।

**मांस के सामान्य गुण—**मांस वृष्य, बल्य तथा प्राणों की शक्ति को बढ़ाने वाला है। यह पुष्टिकारक है तथा वृद्ध एवं कृश व्यक्तियों के मांस को बढ़ाता है।

**वक्तव्य—**शरीर के मांस की वृद्धि करने में मांस सबसे बढ़कर माना गया है। 'सर्वदा सर्वभावानां सामान्यं वृद्धिकारणम्' इस सिद्धान्त के अनुसार शरीर के मांस तथा खाद्य मांस में मांसत्व के सामान्य होने से यह शरीर के मांस की वृद्धि करता है ।।३।।

क्षयिणां क्षीणदेहानां मांसमेव परायणम् । न मांसतुल्यमन्यत्त्वारोग्यवीर्यविवर्धनम् ।।४।।

क्षय के रोगी तथा क्षीण देह वाले व्यक्तियों के लिये मांस ही श्रेष्ठ द्रव्य है। उनके आरोग्य तथा वीर्य की वृद्धि के लिये मांस के समान और कोई पदार्थ नहीं है ।।४।।

नराणां क्षीणशुक्राणां मांसं रेतोभिवर्धनम् । बन्ध्यानामपि नारीणां कुमाराणां तथैव च ।।५।।

जिन व्यक्तियों का शुक्र (वीर्य) क्षीण हो गया है उनमें मांस से वीर्य की वृद्धि होती है। तथा बन्ध्या स्त्रियों में एवं बालकों में भी यह शुक्र धातु की वृद्धि करता है ।।५।।

गर्भाधानकरं मांसमन्ते पुष्टिकं तथा । गर्भिणीनां च नारीणां वातप्रशमनं परम् ।।६।।

मांस गर्भाधान (गर्भस्थिति) कराने वाला है तथा अन्त में गर्भ की पुष्टि करता है। गर्भिणी स्त्रियों में मांस का सेवन करने से वायु की शान्ति होती है ।।६।।

स्त्रीणां प्रसवकाले तु मांस ............ मेव च । गर्भकाले च बालानां सरसं परमौषधम् ।।७।।

प्रसव के समय स्त्रियों में मांस (रस) ..... श्रेष्ठ माना गया है। गर्भ के समय (गर्भस्थित) बालकों के लिये रसयुक्त मांस (अर्थात् मांसरस) श्रेष्ठ ओषधि माना गया है ।।७।।

स्त्रीप्रियाणां तथा पुंसां नित्यव्यायामसेविनाम् ।
क्षीणानां यक्ष्मणां चैव ज्वरक्षीणाश्च ये नराः ।।८।।
वाताहतास्तु ये सत्त्वास्तेषां मांसरसो हितः ।

जिन व्यक्तियों को स्त्रियां प्रिय हैं (अर्थात् जो स्त्रियों का सहवास अथवा मैथुन अधिक करते हों), जो नित्य व्यायाम करते हों तथा जो क्षीण एवं क्षय के रोगी हैं, जो ज्वर के कारण क्षीण हुए हैं तथा जो वातरोग से पीडित हैं—ऐसे व्यक्तियों में मांसरस हितकर होता है ।।८।।

सुसंस्कृतो मांसरसो बिडजीरकहिङ्गुभिः ।।९।।
स्नेहे सिद्धश्च पयसा विशेषाद्वातिके स्मृतः ।

मांंसगुणविशेषीयाध्यायः २४] खिलस्थानम् ५५३

विडनमक, जीरा तथा हींग से अच्छी प्रकार संस्कृत किया हुआ तथा दूध डालकर स्नेह के साथ सिद्ध किया हुआ मांस रस विशेषकर वातरोगों में हितकर माना गया है ॥९॥

वातपित्तोत्तरे पुंभिः शर्करामधुरीकृतः ।।१०।।
स्निग्धो मांंसरसः पेयस्तथा रक्तामयार्दितैः ।

वात एवं पित्त के प्रकोप तथा रक्त रोगों से पीडित व्यक्तियों में शर्करा के द्वारा किया हुआ स्निग्ध मांंसरस पिलाना चाहिये ॥१०॥

क्षीण(र)सिद्धो मांंसरसो मधुरो लवणोऽपि वा ।।११।।
बालानां क्षीणदेहानां गर्भकाले च शस्यते ।

दूध के द्वारा सिद्ध किया हुआ मधुर अथवा लवण मांंसरस क्षीण देह वाले बालकों के लिये तथा गर्भ के समय प्रशस्त होता है ॥११॥

हितं च बा(ब)लकामानां मांंसस्वरससाधितः (म) ।।

बल को चाहने वाले व्यक्तियों के लिये मांंसरस से सिद्ध किये हुए द्रव्य हितकर माने जाते हैं ॥१२॥

सुसिद्धं लवणे सिद्धं मांसं कटुकरोचनम् । कायाग्निदीपनं चैव रसा ....... पो हितः ।।१३।।

अच्छी प्रकार लवण के साथ सिद्ध तथा मरिच आदि कटु पदार्थों के द्वारा रुचिकारक बनाया हुआ मांस कायाग्नि को प्रदीप्त करता है ....... ॥१३॥

वेसवारः समधुरो लावणो वाऽपि रोचनः । पिष्टचूर्णितपक्वं ब्रा प्रकु ...... वापिवाग्न(?)तत् ।।१४।।

रुचिकारक मीठा या नमकीन वेसवार अथवा पिठ्ठी के चूर्ण से पकाया हुआ मांस हितकर होता है। जो मांस अस्थि रहित करके उबाल कर पुनः पत्थर पर पीस लिया जाय । .... उसमें फिर पिप्पली, मरिच, सोंठ, गुड तथा घृत मिलाकर पका लिया जाय उसे 'वेसवार' कहते हैं (सुश्रुत सू. अ. अ. ४६) ॥१४॥

शूल्यमङ्गारतप्तं च मांसं श्लेष्मामये हितम् ।
साम्लः(म्लं) सलवणश्चै(णं चै)व हितस्त (तं त)स्मात्तु जीवक ! ।।१५।।

लोहे की शलाका पर लेप करके अङ्गारों पर पकाया हुआ मांस श्लेष्म रोगों में हितकर होता है । इसलिये हे जीवक ! अम्ल एवं लवण युक्त करके इसका प्रयोग करना प्रशस्त माना गया है ॥१५॥

पिष्टं वा खण्डशो वाऽपि मांसं पुटकसाधितम् । सहिङ्गुसैन्धवबिडैर्मरिचाम्लसजीरकैः ।।१६।।
साङ्कुरैर्धान्यकैश्चैव शृङ्गबेरार्द्रकैरपि । पलाशै भूस्तृणोपेतं मांसं सिद्धं प्रयोजयेत् ।।१७।।

मांस को पीसकर अथवा उसके टुकड़े २ करके हींग, सैन्धव, विडनमक, मरिच, अनार दाना, जीरा, अङ्कुरयुक्त गेहूँ, चने आदि धान्य तथा सोंठ, अदरक एवं भूस्तृण (गन्धतृण) आदि के द्वारा बर्तन में सिद्ध किया जाय । सिद्ध होने पर इसका प्रयोग करे ॥१६-१७॥

अथ मांंसरसं(सः) सर्पिः सिद्धं (द्धः)सक्षीरमि(रइ)ष्यते ।
रसपाकविशेषेण तद्वल्यं (स बल्यः) तद्व (स र) सायनम् (नः) ।।१८।।

घृत से सिद्ध किये हुए मांस रस में दूध मिलाकर प्रयोग करना चाहिये । इस प्रकार यह मांस-रस एवं पाक की विशेषता के कारण बल्य (Tonic) एवं रसायन (Alterative) माना गया है ॥१८॥

५५४काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्मांसगुणविशेषीयाध्यायः २४]

अतः परं तु मांसानां रसपाकविशेषणम्। वक्ष्ये गुणविशेषं च वृद्धजीवक ! तच्छृणु ।।१९।।

हे वृद्धजीवक ! अब मैं मांसों के रस एवं पाक की विशेषता तथा उनके विशेष गुणों का वर्णन करूंगा। इसे तुम सुनो ।।

कफपित्तकरं मांसं गवां वाते हितं गुरु। विदाहि बृंहणं चैव, खङ्गमांसं च तत्समम् ।।२०।।

गौ का मांस—गौ का मांस कफ तथा पित्तकारक, वातरोगों में हितकर, गुरु, विदाहि एवं बृंहण होता है। गैंडे का मांस—यह भी गौ के मांस के ही समान होता है ॥२०॥

न्यङ्कूनां विहितं वाते कफपित्तहरं लघु। सक्षारं दान्तिनं मांसं बृंहणं कटुतिक्तकम् ।।२१।।
वीर्येणोष्णं च तद्विद्यात् कफपित्तं करोति च।

शम्बर मृग (बारहसिंगे) का मांस—शम्बर मृग का मांस वातरोगों में हितकर है तथा यह कफ—पित्तहर एवं लघु है। हाथी का मांस-हाथी का मांस क्षारयुक्त, बृंहण, कटु एवं तिक्त होता है। यह वीर्य में उष्ण होता है तथा कफ और पित्त को बढ़ाता है ॥२१॥

गोकर्णमांसं तत्तुल्यं गवयस्थ रुरोरपि ।।२२।।

गोकर्ण (मृगभेद), गवय (गलकम्बल से शून्य गौ के समान पशु-नील गाय) तथा रुरु (मृगभेद) का मांस भी हाथी के मांस के समान ही होता है ॥२२॥

रसे पाके च मधुरं वातपित्तहरं गुरु। उष्णं चैव च्छागमांसमाविकं चापि तद्गुणम् ।।२३।।

अजा का मांस—अजा (बकरे) का मांस रस एवं विपाक में मधुर, वात पित्त नाशक, गुरु तथा उष्ण है। भेड़ का मांस—भेड़ के मांस-भेड़ के मांस के गुण बकरे के मांस के समान ही है ॥२३॥

वृष्यं तु मांस वाराहं मधुरं गुरु पच्यते। तद्गुणं माहिषं विद्धि, शौकरं स्यात्ततो गुरु ।।२४।।

सूअर का मांस—सूअर का मांस वृष्य, मधुर तथा गुरुपाकी होता है। भैंस का मांस—भैंस के मांस के वे ही गुण हैं जो सूअर के मांस के हैं। सूअर का मांस इससे गुरु होता है ।।

गर्दभस्य तथाऽश्वस्य मांसं यत् पृषतस्य च। कफघ्नं वातलं रूक्षं कटुतिक्ताह्वयं लघु ।।२५।।

गदहा, घोड़ा तथा पृषत (जिसके शरीर पर चित्र विचित्र बिन्दु होते हैं ऐसा चित्तल मृग) नामक हरिण का मांस-कफनाशक, वातकारक, रूक्ष, कटु, तिक्त एवं लघु होते हैं ।।

श्वदंष्ट्रो वृषदंष्ट्रश्च ऋष्यः शरभ एव च। वातघ्ना उष्णवीर्याश्च रसत: कटुकान्वया: ।।२६।।
गोलाङ्गूला वानराश्च तत्तुल्या मधुरोत्तराः ।

श्वदंष्ट्र (चार दांत वाला एक मृग), वृषदंष्ट्र (रान का बिलाव), ऋष्य (नीले अण्डकोश वाला रोहू मृग) तथा शरभ (महासिंह नामक काश्मीर देशीय हरिण विशेष—अष्टापद उष्ट्रप्रमाणो महाशृङ्गः पृष्ठगतचतुष्पादः काश्मीरे प्रसिद्ध) का मांस वातनाशक, उष्णवीर्य तथा रस में कटु होता है। गोलाङ्गूल (बन्दर की जाति) तथा वानरों का मांस-इन्हीं के समान है परन्तु इनमें कुछ मधुर रस की अधिकता होती है ॥२६॥

वृकर्क्षकोकजम्बूकाः सिंहा व्याघ्रतरक्षवः ।।२७।।

(इति ताडपत्रपुस्तके २६२ तमं पत्रम्)

मांसगुणविशेषीयाध्यायः २४] खिलस्थानम् ५५५

स्वाद्युमांसास्स्त्विमे वृष्या उष्णाः पित्तविवर्धनाः । कषायतिक्ता रसतो वातघ्नाः कटुपाकिनः ।। २८ ।।

वृक (भेडिया), ऋक्ष (रीछ), कोक (ईहामृग), जम्बूक (गीदड़), सिंह, व्याघ्र, तरक्षु (व्याघ्रविशेष) का मांस स्वादु, वृष्य, उष्ण तथा पित्तवर्धक होता है। इनका रस कषाय एवं तिक्त होता है, ये वातनाशक हैं तथा इनका विपाक कटु होता है ॥२७-२८॥

नकुलो मूषिकः श्वाविद्बभ्रुः शल्यक एव च । कषायमधुराः शीता वृष्या गोधाश्च तद्गुणाः ।। २९ ।।

नेवला, मूषिक (चूहा), श्वावित् (सेही), बभ्रु (नकुल भेद) तथा शल्यक—का मांस कषाय, मधुर, शीत एवं वृष्य होता है। गोधा (गोह) का मांस भी इन्हीं के समान होता है ॥

ये स्युः शशकुरङ्गाद्याः सृमरश्चमराश्च ये । लघवो ........ ष्णाः पित्तला नातिबृंहणाः ।। ३० ।।

शश (खरगोश), कुरंग (हरिण), सृमर (शृङ्ग त्यागी मृग), चमर (चंवर गाय) का मांस-लघु, ... उष्ण, पित्तकारक तथा थोड़े बृंहण होते हैं ॥३०॥

बार्हिणं मधुरोष्णं तु विषघ्नं गुरु बृंहणम् । तुल्यं कौक्कुटजं वन्यं, तत्तुल्यं ग्राम्यकौक्कुटम् ।। ३१ ।।

मोर का मांस—मधुर, उष्ण, विषनाशक, गुरु एवं बृंहण होता है। जंगली तथा ग्राम्य (पालतू) मुर्गे का मांस भी इन्हीं के समान है ॥३१॥

विष्किराः क्रौञ्चवर्तीका मयूरेण समाः स्मृताः ।
तस्माल्लघुस्तु वर्तीरो वर्तीका लघवो लघुः ।। ३२ ।।

विष्किर (पंजों से कुरेद कर चुगने वाले प्राणी—विकीर्य विष्किराश्चेति), क्रौञ्च तथा वर्तीक (बटेर) के मांसों के गुण मोर के मांस के समान होते हैं। वर्तीर (कपिञ्जल के समान पक्षी-घरघरा) उससे लघु होता है वर्तीक (बटेर) उससे भी लघु होता है ॥३२॥

तित्तिरिस्तु कटुः पाके सोष्णास्तु कफवातजित् । कपिञ्जलश्चकोरश्च उपचक्रश्च तत्समाः ।। ३३ ।।

तीतर (काला तीतर) का मांस—विपाक में कटु, उष्ण तथा कफ और वात को शान्त करने वाला है। कपिञ्जल (गोरा तीतर), चकोर तथा उपचक्र (हंस विशेष) के मांस इन्हीं के समान होते हैं ॥३३॥

लोहपृष्ठो रक्तपृष्ठो रक्ताक्षो जीवजीवकः । तथाऽन्ये हिमवज्जाता मधुरा वृष्यबृंहणाः ।। ३४ ।।
गुरवः शीतलाः पाके कषाया रसस्तथा ।

लोहपृष्ठ (कङ्कपक्षी), रक्तपृष्ठ, रक्ताक्ष (पारावत-कबूतर), जीवजीवक (प्लवजातीय चकोर भेद) तथा अन्य हिमालय में उत्पन्न होने वाले प्राणी-मधुर, वृष्य, बृंहण, गुरु, पाक में शीतल तथा रस में कषाय होते हैं ॥३४॥

खञ्जरीटो वपुक्कारः क्रकरो दीर्घपुंसकः ।। ३५ ।।
कोयष्टिकः कपोतश्च रक्तपादो वसन्तकः । भृङ्गराजोऽथ हारीतः कोकिलः शुकसारिकाः ।। ३६ ।।
एते चान्ये च प्रच्छदा (?) शीतमारुतकोपकाः । कषायमधुराः स्वादे कफघ्नाः कटुपाकिनः ।। ३७ ।।

खञ्जरीट (खञ्जन), वपुक्कार, केकड़ा, दीर्घपुंसक, कोयष्टिक (टिटिहरी या क्रौञ्च), कबूतर, रक्तपाद (तोता), वसन्तक, भृङ्गराज (पक्षिविशेष), हारीत (हरिताल पक्षी), कोयल, तोता तथा मैना—इन तथा अन्य भी प्रच्छद पक्षियों के मांस शीत तथा वायु को कुपित करनेवाले हैं। ये स्वाद में कषाय एवं मधुर हैं, कफनाशक हैं तथा इनका विपाक कटु है ॥३५-३७॥

५५६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् मांसगुणविशेषीयाध्यायः २४]

गृध्रः काकः श्येनचाषौ भासोलूककुलिङ्गकाः । शशन्ता मूषिकाः क्रोडास्तथाऽन्ये मांसभोजनाः ।।
प्रसहास्ते तु मधुरा वातघ्नाः कटुपाकिनः । बृंहणाश्चोष्णवीर्याश्च सततं शोषिणां हिताः ।।३९।।

गृध्र, कौवा, श्येन (बाज), चाष, भास (गोकुलचारी गृध्रविशेष), उल्लू, कुलिङ्गक (चिड़िया), शशन्त, मूषिक, क्रोड-तथा अन्य जो भी प्रसहवर्ग के मांस भोजन करनेवाले हैं वे मधुर, वातनाशक, कटुपाकी, बृंहण तथा उष्णवीर्य हैं एवं शोषरोगियों के लिये निरन्तर सेवन करने से हितकर हैं। प्रसह—अपना भोजन जबरदस्ती पकड़ कर खानेवाले प्राणी 'प्रसह' कहलाते हैं ।।

प्लवा बका बलाकाश्च तीदार्यः कुररास्तथा । ........ रक्ताक्षा मल्लिकाक्षाः सवारटाः ।।४०।।
नदीमुखा मेघरावाः शराख्या जलकुक्कुटाः । समुद्रकाकाः कुहरा गोट्टुभा गण्डमालकाः ।।४१।।
कारण्डवाः सजीमूतास्तथाऽन्ये जलचारिणः । पाके च मधुरा वृष्या गुरवश्च ........ ।।४२।।
............................................ । ............................................ ।।४३।।

प्लव (पानी में तैरनेवाले जीव संघातंचारी पक्षी), बक (बगुला), बलाका (बकभेद), तीदार्य, कुरर, ..... रक्ताश्व, मल्लिकाक्ष (हंस विशेष), वारट (हंसी), नन्दीमुख, मेघराव (मेघनाद या चातक), शर, जलकुक्कुट (जल मुर्गा), समुद्र का, कुहर, गोट्टुभ, गण्डमालक, कारण्डव (सफेद हंस का भेद), जीमूत तथा अन्य जो भी जलचर पक्षी हैं उनका मांस पाक में मधुर, वृष्य एवं गुरु होता है ....... ।।४०-४३।।

हंसस्तु गुरुरत्यर्थं वृष्योऽथ कफपित्तलः । शरारिः पाकहंसश्च चक्रवाकस्तथैव च ।।४४।।
जालपादास्तथाऽन्ये च हंसतुल्या गुणैः स्मृताः ।

हंस का मांस अत्यन्त गुरु, वृष्य तथा कफ एवं पित्तवर्धक हैं। शरारि (आटी), पाकहंस, चक्रवाक, जालपाद तथा अन्य पक्षी गुणों में हंस के समान माने गये हैं ।।४४।।

क्रौञ्चः कुलिङ्गो द्रविडः पद्मपुष्करसादकः ।।४५।।
वार्धीणसः सारसश्च सारङ्गो धामृण्यलिकः (?) ।
एते चान्ये चाम्बुचराः पक्षिणो गुरवः स्मृताः ।।४६।।
रसे पाके च मधुरा उष्णाः सलवणान्वयाः । वृष्या वातहराश्चैव कफपित्तविवर्धनाः ।।४७।।

क्रौञ्च, कुलिङ्ग, द्रविड, पद्मपुष्कर, सादक,, वार्धीणस (नीली ग्रीवा तथा लाल सिर वाला पक्षी विशेष), सारस, सारङ्ग (मृगभेद-चित्रमृग), धामृण्यलिक (?)—इत्यादि तथा अन्य भी जलक्षर पक्षी गुरु माने गये हैं। ये रस तथा विकाप में मधुर होते हैं और ये उष्ण, लवणरसयुक्त, वृष्य, वातनाशक एवं कफ और पित्त को बढ़ाने वाले हैं ।।४५-४७।।

नलमीनो झषश्चैव पाठीनश्चर्मपीवरः । चेलीमः शकुलार्भ(द)श्च शिलीन्ध्रो गर्गरस्तथा ।।४८।।
पुष्करो गोकरो मूचो वारडः शूलपाटलः । कृष्णमत्स्यः श्वेतमत्स्यो गोमत्स्यो रोहितस्तथा ।।४९।।
शकली महाशकली चम्पः कुन्दोऽथ मद्गुरः ।
इल्यः शङ्कुश्चिरणो राजीवः शफरी तथा ।।५०।।
एते चान्ये च बहवो विविधा मत्स्यजातयः । रसे पाके च मधुरा वातघ्ना वृष्यबृंहणाः ।।५१।।
उष्णवीर्याश्च ते ज्ञेया गुरवः कफपित्तलाः । लघ्वाशायास्तेऽन्ये तु किञ्चित्तिक्तान्वयान्तराः ।।५२।।
रोहितो नलमीनश्च ........... लघवः स्मृताः ।

मांसगुणविशेषीयाध्यायः २४] खिलस्थानम् ५५७

नलमीन (चिलिचिम मछली), झष (मत्स्यभेद), पाठीन, चर्सपीवर, चेलीम, शकुलार्भक, शिलीन्द्र, गर्गर, पुष्कर, गोकर, मूच, वारड, शूलपाटल, कृष्णमत्स्य, श्वेतमत्स्य, गोमत्स्य, रोहित, शकली, महाशकली, चम्प, कुन्द, मद्गुर, इल्य, शङ्क (शांकोच), चिचरण, राजीव, शफरी (प्रोष्ठी मत्स्य), इत्यादि तथा अन्य भी कई मछलियों की जातियां रस एवं पाक में मधुर, वातघ्न, वृष्य, बृंहण, उष्णवीर्य, गुरु तथा कफ एवं पित्तवर्धक हैं। इनमें लघु शरीर वाले तथा कुछ तिक्त रस वाले प्राणियों का ग्रहण करना चाहिये। रोहित एवं नलमीन ..... आदि लघु कहे गये हैं॥४८-५२॥

कूर्मो दुटिश्च नक्रश्च मकरोऽवकुशस्तथा ॥५३॥
तिमिः सहस्रदशनस्तथैव च तिमिङ्गिलः । इञ्चकः शुक्तिकः शङ्खोऽवलूको जलसूकरः ॥५४॥
शम्बूकश्चन्द्रिकः शृङ्गी कर्कटः शकुटीपयः । एते चान्ये च जलजा मधुरा रसपाकयोः ॥५५॥
गुरवश्चोष्णवीर्याश्च गुरवः कफपित्तलाः ।।

कूर्म (कछुआ), दुटि, नक्र (नाका), मकर (मगरमच्छ), अवकुश, तिमि, सहस्रदशन, तिमिङ्गिल, इञ्चक, शुक्तिक (सीप), शङ्ख, अवलूक, जलशूकर, शम्बूक (घोंघा), चन्द्रिक, शृङ्गी, कर्कट (केंकड़ा), शकुटीपय आदि तथा अन्य जलचर प्राणी रस तथा पाक में मधुर, गुरु, उष्णवीर्य, गुरु तथा कफ एवं पित्तवर्धक होते हैं ॥५३-५५॥

आनूपे तूत्तमश्छागः, श्रेष्ठो मत्स्येषु रोहितः ॥५६॥
जलजे शुक्तिकूर्मौ च, वारटोऽप्यथ पक्षिषु । एणो मृगेषु प्रवरः, प्रतुदेषु शुको वरः ॥५७॥
(इति ताडपत्रपुस्तके २६२ तमं पत्रम्)

विषयेषु ...... ग्न्यो लावः खगेषु तु ।
तित्तिरो विष्किरेष्वग्न्यः, काकोऽग्न्यः प्रसहेषु तु ॥५८॥

आनूप (जलयुक्त प्रदेश में रहने वाले) प्राणियों में बकरा सबसे श्रेष्ठ माना गया है। मछलियों में रोहित मछली सबसे श्रेष्ठ होती है (रोहितो मत्स्यानां-चरक सू. अ. २५), जलज प्राणियों में शुक्ति और कूर्म (कछुआ), पक्षियों में वारट, मृगों में एण हरिण (ऐणेयं मृगमांसानां-चरक सू. अ. २५), प्रतुद (नोक से कुरेदकर चुगनेवाले) पक्षियों में तोता, विषयों में ........., पक्षियों में लाव (लावः पक्षिणां चरक सू. अ. २५), विष्किर (पंजों से कुरेदकर चुगने वाले) प्राणियों में तीतर, प्रसह (अपना भोजन जबरदस्ती पकड़ कर खाने वाले) प्राणियों में कौवा श्रेष्ठ माना गया है ॥५६-५८॥

लघूक्तं रुधिरं मांसाद् गुरु मेदश्च चर्म च । मज्जावसे गुरुतरे तेभ्यो गुरु शिरः स्मृतम् ॥५९॥

मांस की अपेक्षा रक्त लघु कहा गया है तथा मेद और चर्म (त्वचा) गुरु और मज्जा तथा वसा इनसे गुरु तथा सिर इनसे भी गुरु माना गया है ॥५९॥

लघुः स्कन्धो हि शिरसस्तस्मात् पार्श्वं लघु स्मृतम् ।
पार्श्वात् सक्थि लघु प्रोक्तं पादमांसं गुरु स्मृतम् ॥६०॥

सिर की अपेक्षा कन्धा लघु होता है, कन्धों से पार्श्वभाग तथा पार्श्व से सक्थि लघु होती है तथा पैरों का मांस गुरु होता है ॥६०॥

वसा मेदश्च मज्जा च वातपित्तहिताः स्मृताः । रसे पाके च मधुराः स्नेहाच्छ्लेष्मप्रकोपनाः ॥६१॥
रक्तं रक्तप्रशमनं मांसं मांसविवर्धनम् ।

वसा मेद तथा मज्जा—वात एवं पित्त के लिये हितकर होते हैं। ये रस तथा पाक में मधुर होते हैं, स्नेहयुक्त होते हैं तथा श्लेष्मा को प्रकुपित करते हैं। रक्त रक्त को निर्मल करने वाला है तथा मांस मांस की वृद्धि करता है ॥६१॥

५५८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् मांसगुणविशेषीयाध्यायः २४]

गुरवः प्राणिनो बाला, युवानो वृष्यबृंहणाः ।।६२।।
वृद्धास्तु वातला रूक्षाः, पुंभ्यस्तु लघवः स्त्रियः ।
मृगाल्लघुतरः पक्षी, पक्षिभ्योऽम्बुचरो गुरुः ।।६३।।

बाल (छोटे) प्राणी गुरु माने गये हैं, युवा प्राणी वृष्य तथा बृंहण होते हैं तथा वृद्धप्राणी वातकारक एवं रूक्ष होते हैं। पुरुषों (Males) की अपेक्षा स्त्रियां (Females) लघु होती हैं। मृगों (पशुओं) की अपेक्षा पक्षी लघु होते हैं तथा पक्षियों से जलचर प्राणी गुरु होते हैं ॥६२-६३॥

महाशरीराश्चल्पकाया लघवो जीवक ! स्मृताः । विज्ञेयाश्चाल्पभुग्भ्योऽपि गुरवो बहुभोजनाः ।।६४।।

हे जीवक ! (नकुल मूषिक आदि) अल्प शरीरवाले प्राणियों में बड़े और मोटे प्राणियों का मांस लघु होता है । अल्पभुक् (थोड़ा खानेवाले) प्राणियों में अधिक भोजन करनेवाले प्राणी गुरु होते हैं ॥६४॥

लघवोऽल्पभूमिचरा, अलसेभ्यो विदूरगाः । लघुदेशचरा अल्पा लघवो लघुभोजनाः ।।६५।।

अल्पभूमिचर (थोड़ा चरने वाले) प्राणी लघु होते हैं । आलसी प्राणियों में बहुत दूर तक जाकर चरने वाले प्राणी लघु होते हैं तथा लघु देश में चरने वाले, अल्प शरीर वाले एवं लघु भोजन करने वाले प्राणी भी लघु होते हैं ॥६५॥

गुरुदेशचराः स्थूला गुरवो गुरुभोजनाः । पाशबद्धं गुरु मांसं रूक्षं क्षुद्व्याधिभिर्हतम् ।।६६।।

गुरु (भारी) देश (स्थान) में विचरने वाले, स्थूल तथा गुरु भोजन करने वाले प्राणी गुरु होते हैं। जाल में पकड़े हुए प्राणियों का मांस गुरु होता है। क्षुधा (भूख) एवं रोग से मरे हुए प्राणी का मांस रूक्ष होता है ॥६६॥

श्वभिर्हतं पीतरक्तं नातिबृंहणमुच्यते । विषैर्हतमभक्ष्यं स्याच्छुष्कं नातिगुणावहम् ।।६७।।

कुत्तों द्वारा मारे हुए तथा जिसका रक्तपान कर लिया गया है ऐसे प्राणियों का मांस अधिक बृंहण नहीं होता है। विष द्वारा मारे हुए प्राणियों का मांस अभक्ष्य होता है। वह शुष्क तथा गुणहीन होता है ॥६७॥

सद्योऽपरिक्लिष्टहतं मांसं धातुं विवर्धयेत् । पूतिमांसं गुर्वसारं तदवृष्यमबृंहणम् ।।६८।।

ताजा मारा हुआ तथा अदूषित मांस-मांस तथा धातु की वृद्धि करता है। जो मांस सड़ा हुआ, गुरु एवं साररहित हो वह अवृष्य तथा अबृंहण होता है ।

**वक्तव्य—**चरक सू. अ. २५ तथा सुश्रुत सू. अ. ४६ में भी अत्यन्त विस्तारपूर्वक देश, काल, अवस्था, लिङ्ग, जाति तथा अङ्गों के भेद से मांस के गुणों का वर्णन किया गया है ॥६८॥

एवं मांसविशेषज्ञः कल्पयेद्भोजने सदा । बालानां गुर्विणीनां वा बालपुत्रासु वा भिषक् ।।६९।।
दुष्प्रजातासु वा स्त्रीषु बाले वा कृशिते सदा । प्रयुञ्जन् सिद्धिमप्नोति तत्त्वविद् वृद्धजीवक ! ।।७०।।

इस प्रकार मांस के गुणों को जानने वाले व्यक्तियों को भोजन में सदा मांस की कल्पना करनी चाहिये । हे वृद्धजीवक ! जो तत्त्ववेत्ता मनुष्य बालक, गर्भिणी, छोटी लड़की, दुष्प्रजाता स्त्री तथा कृश बालकों में इस प्रकार कल्पनानुसार मांस का प्रयोग करता है वह सिद्धि (सफलता) को प्राप्त करता है ॥६९-७०॥

इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।
(इति) खिलेषु मांसगुणविशेषीयाध्यायश्चतुर्विंशतितमोऽध्यायः ॥२४॥ चू (७०)

देशसात्म्याध्यायः २५] खिलस्थानम् ५५९

ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।

(इति) खिलेषु मांसगुणविशेषीयाध्यायश्चतुर्विंशतितमोऽध्यायः ॥२४॥ चू (७०)


अथ देशसात्म्याध्यायः पञ्चविंशः ।

अथातो देशसात्म्याध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥२॥

अब हम देशसात्म्याध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।

**वक्तव्य—**इस अध्याय में किस २ देश में कौन २ सा आहार-विहार सात्म्य होता है—इसका वर्णन किया जायगा। यह अध्याय भी अपूर्ण ही मिलता है। इसमें कुरुक्षेत्र को मध्य (Centre) मानकर पहले पूर्व दिशा के देश तथा सात्म्य आहार विहार का वर्णन किया है। उससे आगे दक्षिण दिशा के देश में केवल नामों का ही उल्लेख मिलता है। उससे आगे अध्याय खण्डित हो गया है। उस खण्डित अंश में संभवतः दक्षिण देशों का सात्म्य आहार-विहार तथा पश्चिम एवं उत्तर देशों के नामपूर्वक सात्म्य आहार-विहार आदि का वर्णन किया गया होगा ॥१-२॥

कश्यपाख्यमृषिश्रेष्ठं पृष्टवान् ...... रोचतः । देशसात्म्यमजानन्तः कथं कुर्युश्चिकित्सितम् ॥३॥
कस्य देशस्य मध्ये तु कुरुक्षेत्रं प्रतिष्ठितम् ।

कश्यप नाम वाले श्रेष्ठ ऋषि से जीवन ने प्रश्न किया-देश सात्म्य को जाने बिना हम किस प्रकार चिकित्सा कर सकते हैं तथा कुरुक्षेत्र किस देश के मध्य में स्थित है ॥३॥

इत्येवमुक्तो भगवान् काशिराजो महामुनिः ॥४॥
इदमुत्तरमक्लिष्टं व्याख्यातुमुपचक्रमे । कुरुक्षेत्रं मध्यदेशश्चाद्योजनानां शतं परम् ॥५॥
समस्तान् षड्रसान् प्रायो भुञ्जते मध्यदेशजाः । भक्ष्यभोज्यान्नवीरास्ते तु भुञ्जन्तो वाऽसकृत्तथा ॥६॥

इस प्रकार प्रश्न किये जाने पर महामुनि भगवान् काशीराज ने सरल ढंग से उत्तर देना प्रारंभ किया-देश के मध्यभाग में सौ योजन विस्तार वाला कुरुक्षेत्र प्रदेश है। मध्य देश के निवासी प्रायः सम्पूर्ण छहों रसों (रसों से युक्त आहार) का सेवन करते हैं। वे भक्ष्य, भोज्य एवं अन्न (खान पान) में अत्यन्त वीर होते हैं तथा वे अनेक बार भोजन करते हैं। अर्थात् वे खूब खाने पीने वाले होते हैं ॥४-६॥

पूर्वदिशस्तु विज्ञेयो मधुरः शीतलो गुरुः । कुमारवर्तनीमा(चा)दौ कटीवर्षस्तथैव च ॥७॥
मगधासु महाराष्ट्रऋषभद्वीपमेव च । पौण्ड्रवर्धनकं चापि मृत्तिकावर्धमानकम् ॥८॥
कर्वटं च समातङ्गं ताम्र(प्र)लिप्तं सचीरकम् । प्रियङ्गुमथ कौशल्यं कलिङ्गपृष्ठपूरकम् ॥९॥

पूर्व दिशा के देश मधुर, शीतल तथा गुरु माने गये हैं। वे देश निम्न हैं—सबसे पहले कुमारवर्तनी, फिर कटीवर्ष, मगध में महाराष्ट्र, ऋषभ द्वीप, पौण्ड्रवर्द्धनक, मृत्तिकावर्धमानक, कर्वट, मातङ्ग, ताम्रलिप्त, चीर (चीन), प्रियङ्गु, कौशल्य, कलिङ्ग तथा पृष्ठपूरक ॥७-९॥

एषु प्लीहविनो मर्त्या गलगण्डिकमे(न ए)व च । गुडशाल्योदनप्राया मत्स्यभोजनसेविनः ॥१०॥
प्रायशो मधुराहारा वातश्लेष्मात्मका नराः ।

५६० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

इन देशों के लोग प्लीहा एवं गलगण्ड से युक्त होते हैं अर्थात् उनमें प्लीहारोग (Enlargement of Spleen आदि) तथा गलगण्ड (Goitre) रोग अधिक होते हैं। ये प्रायः गुड तथा शालिचावल और मछली का भोजन करते हैं। इनका आहार प्रायः मधुर होता है तथा यहां के लोग वात एवं श्लेष्म प्रकृति के होते हैं ॥१०॥

तेषां कटुकतिक्तं च रूक्षमुष्णं च भोजनम् ।।११।।
यच्चान्यदपि श्लेष्मघ्नं तेषां तत्तत् प्रयोजयेत् ।

इन व्यक्तियों को कटु, तिक्त, रूक्ष एवं उष्ण भोजन कराना चाहिये तथा अन्य जो भी श्लेष्मनाशक आहार-विहार है—उसका सेवन कराना चाहिये ॥११॥

कञ्चीपदा नवध्वाना कावीरास्तुल्ययोरपि ।।१२।।
वानसी कुमुदाराज्यं चिरिपालिस्तथैव च। चीरराज्यञ्च चोराणां पुलिन्द(न्दं)द्रविडेषु च ।।१३।।
करघाटशनानां च विवे(दे)हा मण्डपेषु च। कान्तारं च वराहं च घटास्वाभीरमेव च ।।१४।।
दक्षिणां दिशमाश्रित्य देशा वि ........ ।
(इति ताडपत्रपुस्तके २६४ तमं पत्रम्)

दक्षिण दिशा का आश्रय करके निम्न देश हैं—कञ्चीपद, नवध्वान, कावीर, वानसी, कुमुदाराज्य, चिरिपालि, चोरों का चीरराज्य, द्रविड में पुलिन्द, शनों में करघाट, मण्डपों में विदेह, कान्तार, वाराह तथा घटाओं में आभीर देश हैं।....
(वक्तव्य—इन देशों का यथासंभव परिचय उपोद्धात में दिया गया है। पाठक इन्हें वहीं देखें) ॥१२-१४॥

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खिलस्था¹नस्यैतावानेव भाग उपलब्धः ।
खिलस्थान का इतना ही भाग उपलब्ध होता है।

काश्यपसंहिता वृद्धजीवकीयतन्त्रं च एतावत्येवोपलब्धभागे विश्राम्यति ।


१. खिलान्यशीतिरध्याया इति पूर्वोद्देशानुसारेणाऽस्मादपूर्णपञ्चविंशाध्यायादुत्तरं पञ्चपञ्चाशदध्याया अवशिष्यन्ते, तेनाऽर्धग्राम इवायमकाण्डे विच्छिन्नो ग्रन्थः पूर्त्तये पुनरनुकूलदैवं समीहते। उक्तं चाभियुक्तैः—
द्वीपादन्यस्मादपि मध्यादपि जलनिधेर्दिशोऽप्यन्तात्। आनीय झटिति घटयति विधिरभिमतमभिमुखीभूतः॥ इत्यलम्।

काश्यपसंहिताया विषयानुक्रमणिका

सूत्रस्थानम् ।

विषयपृ.^१पं.विषयपृ.पं.
लेहाध्यायः ।शुद्धक्षीरस्य लक्षणम्१२६
लेहनविषये जीवकस्य प्रश्नाः११अशुद्धक्षीरसेवनदोषास्तेषां शान्तिश्च१३१
कश्यपस्योत्तरम्२१वज्रस्य (स्तनकीलकस्य) संज्ञाहेतुसंप्राप्ति-लक्षणानि१३३
गर्भिण्या रसधातोस्त्रिधा विभागः२२वज्रस्य चिकित्सा१४५
देहिनां प्रकृत्यभिनिर्वृत्तौ हेतुः२४नार्याः स्तनोपरि दुष्टदृष्टिपातस्तच्चिकित्सा च१५२
देहप्रकृतेर्भेदाः२४दन्तजन्मिकाध्यायः २० ।
देहप्रकृत्याश्रिता भेषजकल्पना४१दन्तजन्मविषये जीवकस्य प्रश्नाः१५८
वयोभेदेन बालेषु भेषजमात्रानिर्देशः४२कश्यपस्योत्तरम्१६१
लेहनायोग्या बालाः५६दन्तानां भेदाः, संज्ञाः, उत्पत्तिकालश्च१६१
बालानां सात्म्यान्येवान्नपानान्युपयोज्यानि६१कुमारीणां कुमाराणां च दन्तजन्मनि विशेषः१७१
लेहनविधिः६३दन्तानां निषेकोद्भेदादौ हेतुः१७२
बालानां सुवर्णप्राशनगुणाः६५दन्तानां निषेककालः१८१
बालानां मेधाजनना लेहाः७२अप्रशस्तं दन्तजन्म, तच्छान्तिश्च१८१
बालानां लेहनार्थम् अभयं घृतम्७६चतुर्विधं दन्तजन्म१८५
बालानां लेहनार्थम् संवर्धनं घृतम्८३सामुद्रसंवृतविवृतानां दोषाः१८५
बालानां लेहनार्थम् ब्राह्मयाद्यं घृतम्८५मासविशेषेण दन्तनिषेकस्य दोषा गुणाश्च१८७
क्षीरोत्पत्त्यध्यायः १९ ।दन्तसंपत्१८१०
स्कन्दादिग्रहदूषितधात्रीदुग्धलक्षणम्९१अप्रशस्ता दन्ताः१८१२
रसवर्णाभ्यां धात्र्याः क्षीरपरीक्षा९५चूड़ाकरणीयाध्यायः २१ ।
दुष्टक्षीरस्य संशोधनम्९६कर्णपालीवर्धनोपायाः२११
क्षीरवर्धनम्१०५अभिषजः कर्णवेधननिषेधः२१४
क्षीरविशोधनो गणः१०८स्नेहाध्यायः २२ ।
क्षीरशोधनकालिक आहारः११२स्नेहस्य योनिर्विकल्पाश्च२३३
क्षीरसंशोधनकाले वर्जनीयानि११३स्थावरस्नेहाः२३३
क्षीर-प्रजनन-वर्धनानि११४

१. अत्र सर्वत्र पङ्क्तिसंख्यागणनायां केवलं संस्कृतमूलश्लोकगद्यस्थितपङ्क्तीनामेव ग्रहणम् ।

५६२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

विषयपृ.पं.विषयपृ.पं.
औद्भिदाः स्नेहाः२३४जीर्णस्नेहलक्षणम्३३३
घृततैलवसामज्ज्ञां पूर्वपूर्वस्य श्रेष्ठत्वम्२३५स्नेहावपीडगुणाः३३६
घृतगुणाः२४१स्नेहापचारजा रोगाः, तच्चिकित्सा च३३८
तैलगुणाः२४३स्नेहव्यापद्धेतुस्तच्चिकित्सा च३४३
मज्जावसोर्गुणाः२४४स्नेहविचारणायोग्या नराः३४५
तिलतैलघृतप्रयोगप्रशंसा२४५प्रमेहादिषु स्नेहने विशेषविधिः३४८
ऋतुविशेषेण स्नेहविशेषोपयोगः२५१स्नेहनस्वेदनविशोधनक्रमः३५१
स्नेहविशेषेणानुपानविशेषः२५३स्वेदाध्यायः २३ ।
उष्णोदकानुपानगुणाः२५५स्वेदविषये जीवकस्य प्रश्नाः३५४
उष्णोदकनिर्माणविधिः२५६कश्यपस्योत्तरम्३५७
उष्णोदकानुपानं येषां निषिद्धम्२५७स्वेद्या नराः३५१०
ओदनादिभिः स्नेहप्रयोगविधानम्२६१दोषविशेषेण स्वेदविशेषः३५११
प्रकृतिविशेषेण स्नेहप्रयोगकालः, ततोऽन्यथा प्रयोगे दोषाश्च२६३शरीरावयवविशेषे स्वेदविशेषः३६२
स्नेहाच्छपाने त्रिविधा मात्रा, तद्योग्या नराश्च२७१स्वेदनसमये नेत्रादिसंरक्षणविधिः३६३
त्रिविधस्नेहमात्राणां गुणाः२८१स्वेदनिर्वर्तनकालः३७३
घृतपानयोग्या नराः२८५अतिस्विन्नस्य लक्षणं चिकित्सा च३७४
तैलपानयोग्याः नराः२८७मन्दस्विन्नस्य लक्षणं चिकित्सा च३७८
वसापानयोग्याः नराः२९१सम्यक्स्विन्नस्य लक्षणम्३८१
मज्जपानयोग्याः नराः२९३अस्वेद्या नराः३८३
स्नेह्याः नराः२९५स्वेद्या नराः३८५
अस्नेह्याः नराः३०१स्वेदस्यादौ भेदाः३९२
अस्नेह्यानामच्छस्नेहपानाद्दोषाः३०५हस्तस्वेदविधिः३९३
अस्निग्धस्य लक्षणम्३०७अवहितेन बालेषु स्वेदो योज्यः४०१
स्निग्धस्य लक्षणम्३०८प्रदेहस्वेदविधिः४०७
अतिस्निग्धस्य लक्षणम्३०९नाडीस्वेदविधिः४११
स्नेहपानात् पूर्वदिने कर्तव्यम्३११प्रस्तरस्वेदविधिः४१२
स्नेहपीतस्य विहारः३१३सङ्करस्वेदविधिः४२१
कोष्ठभेदेन स्नेहनकालः३१४उपनाहस्वेदविधिः४२३
मृदुकोष्ठस्य लक्षणम्३१५उपकल्पनीयाध्यायः २४ ।
अजीर्णस्नेहलक्षणम्३२३सम्यक्शुद्धस्यान्नसंसर्जनक्रमः४३१
स्नेहजीर्णाजीर्णविशङ्कायां चिकित्सा३२४अन्नसंसर्जनक्रमव्यभिचारजा रोगाः४५७
तैलादीनामजीर्णे विशेषलक्षणानि३२६शुद्धस्य शीतपानान्नादिसेवनजा रोगाः४६२
स्नेहाजीर्णे चिकित्सा३३१सम्यग्जीर्णान्निलक्षणम्४६३

विषयानुक्रमणिका

विषयपृ.पं.विषयपृ.पं.
अजीर्णत्रिलक्षणम्४६४विषूचिकाया लक्षणानि५१६
अजीर्णस्य चत्वारो भेदाः४७१अलसकस्य लक्षणानि५१७
आमविदग्धसश्लेष्मरसशेषाजीर्णानां लक्षणानि४७२नेत्रामयानां लक्षणानि५२१
कण्ड्वाः लक्षणानि५२२
अजीर्णानां सामान्यलक्षणम्४७३आमस्य पूर्वरूपाणि५२४
अजीर्णानां साध्यासाध्यविचारः४७४पाण्डुरोगस्य लक्षणानि५२६
अजीर्णानां चिकित्सा४७७कामलायाः लक्षणानि५२७
सम्यक्कृतसंशोधनगुणाः४८३मदात्ययस्य लक्षणानि५२८
वेदनाध्यायः २५ ।उरोघातस्य लक्षणानि५३१
अवचसां बालानां वेदनाज्ञानविषये जीवकस्य प्रश्नाः४८८जन्तुकार्दितस्य लक्षणानि५३३
ग्रहाबाधायाः पूर्वरूपाणि५३४
कश्यपस्योत्तरम्४९१बालरोगाणां सामान्यासाध्यत्वलक्षणानि५३१३
शिरोरुजाया लक्षणम्४९२बालरोगाणामुपक्रमाः५४३
कर्णवेदनायाः लक्षणम्४९३चिकित्सासंपदीयाध्यायः २६ ।
मुखामयस्य लक्षणम्४९४चिकित्सायाश्चत्वारः पादाः५४६
कण्ठवेदनायाः लक्षणम्४९५भिषजो गुणाः५५३
अधिजिह्विकायाः लक्षणम्४९६भेषजसंपत्५५७
गलग्रहस्य लक्षणम्४९७आतुरसंपत्५६१
कण्ठश्वयथोः लक्षणम्४९७परिचारकसंपत्५६४
ज्वरपूर्वरूपाणि४९८चतुःषु पादेषु भिषजः श्रेष्ठत्वम्५७१
अतिसारस्य पूर्वरूपाणि५०२रोगाध्यायः २७ ।
शूलिनो बालस्य लक्षणानि५०३रोगाणां प्रभेदविषये महर्षीणां मतानि५८३
छर्देः पूर्वरूपाणि५०४रोगाणां असंख्येयत्वे हेतुः५८९
श्वासस्य पूर्वरूपाणि५०५रोगाणां अधिष्ठानद्वयम्५८१०
हिक्कायाः पूर्वरूपाणि५०५व्याधेः प्रकृतेश्च लक्षणम्५८११
तृष्णायाः पूर्वरूपाणि५०६रोगाणां द्विविधा प्रकृतिः५९२
आनाहस्य पूर्वरूपाणि५०७वातादिदोषाणां शरीरे विशिष्टस्थानानि५९३
अपस्मारस्य पूर्वरूपाणि५०८निजागन्तुरोगयोर्विशेषः६०१
उन्मादस्य रूपाणि५०८ओजसः स्वरूपम्६०३
मूत्रकृच्छ्रस्य रूपाणि५०९ओजसो वर्धनानि६११
प्रमेहस्य रूपाणि५११वातादिसाम्यवैषम्ययोः फलम्६१२
अर्शसां रूपाणि५१३आविष्कृततमानां व्याधीनां स्थूलतः कथनम्६१३
अश्मर्याः रूपाणि५१४अशीतिवातविकाराणां नामतो निर्देशः६१४
विसर्पस्य पूर्वरूपाणि५१५वायोः स्वरूपं, कर्म, उपक्रमाश्च६३१

५६४ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

विषयपृ.पं.विषयपृ.पं.
चत्वारिंशत्पित्तविकाराणां नामतो निर्देशः६३५शुभाशुभानि स्फिगलक्षणानि६९१६
पित्तस्य स्वरूपं, कर्म, उपक्रमाश्च६४१शुभाशुभानि कुकुन्दरलक्षणानि६९१८
कफजविंशतिविकाराणां नामतो निर्देशः६५१शुभाशुभानि जघनलक्षणानि६९१९
श्लेष्मणः स्वरूपं, कर्माणि, उपक्रमाश्च६५४शुभाशुभानि वृषणलक्षणानि६९२०
वातपित्तश्लेष्मणां विशिष्टोपक्रमाः६६१शुभाशुभानि प्रजननलक्षणानि६९२३
एकविधा व्याधयः६६३शुभाशुभानि मूत्रलक्षणानि६९२४
द्विविधाः६६५शुभाशुभानि योनिलक्षणानि७०१
त्रिविधाः६६६शुभाशुभानि रोमराजिलक्षणानि७०४
चतुर्विधाः व्याधयः६६८शुभाशुभानि कुक्षिलक्षणानि७०६
पञ्चविधाः व्याधयः६६१०शुभाशुभानि उदरलक्षणानि७०७
षड्विधाः व्याधयः६६१०शुभाशुभानि नाभिलक्षणानि७०११
सप्तविधाः व्याधयः६६११शुभाशुभानि पायुलक्षणानि७०१३
अष्टविधाः व्याधयः६६१२शुभाशुभानि पार्श्वलक्षणानि७०१३
दशविधाः व्याधयः६६१२शुभाशुभानि पृष्ठलक्षणानि७०१४
विंशतिविधाः व्याधयः६६१२शुभाशुभानि अंसलक्षणानि७०१५
उपद्रवलक्षणम्६७१शुभाशुभानि कक्षालक्षणानि७०१७
उपद्रवचिकित्साविचारः६७२शुभाशुभानि बाहुलक्षणानि७०१८
रक्तजविकाराणां हेतुः६७६शुभाशुभानि मणिबन्धलक्षणानि७०२०
रक्तजा रोगाः६८१शुभाशुभानि यवपंक्तिलक्षणानि७०२१
रक्तजानां रोगाणां चिकित्सा६८४शुभाशुभानि केशभूमिलक्षणानि७०२४
बालोपक्रमे विशेषः६८६शुभाशुभानि गतिलक्षणानि७०२६
लक्षणाध्यायः २८ ।अप्रशस्तानि शरीराणि७०२७
बालानां शुभाशुभदेहलक्ष्णविषये जीवकस्य प्रश्नाः६९१बालानां प्रशस्तानि रुषितादीनि७०२८
कश्यपस्योत्तरम्६९३वक्त्रचक्षुःस्वररूपैर्वृत्तमनःसारगुणानां परीक्षा७४१
शुभाशुभानि नखलक्षणानि६९४सत्त्वानां भेदाः७४३
शुभाशुभानि पादलक्षणानि६९७ब्राह्मसत्त्वस्य लक्षणम्७५२
शुभाशुभानि अङ्गुलीलक्षणानि६९११प्राजापत्यसत्त्वस्य लक्षणम्७५३
शुभाशुभानि पार्ष्णिलक्षणानि६९१२आर्षसत्त्वस्य लक्षणम्७५४
शुभाशुभानि उत्तरपादलक्षणानि६९१३ऐन्द्रसत्त्वस्य लक्षणम्७५५
शुभाशुभानि गुल्फलक्षणानि६९१३याम्यसत्त्वस्य लक्षणम्७५६
शुभाशुभानि जङ्घालक्षणानि६९१४वारुणसत्त्वस्य लक्षणम्७५७
शुभाशुभानि जानुलक्षणानि६९१५कौबेरसत्त्वस्य लक्षणम्७६१
शुभाशुभानि ऊरुलक्षणानि६९१६गान्धर्वसत्त्वस्य लक्षणम्७६२
शुद्धसत्त्वस्य सामान्यलक्षणम्७६३

विषयानुक्रमणिका
५६५

विषयपृ.पं.
आसुरसत्त्वस्य लक्षणम्७६६
राक्षससत्त्वस्य लक्षणम्७७१
पैशाचसत्त्वस्य लक्षणम्७७२
सार्पसत्त्वस्य लक्षणम्७७३
याक्षसत्त्वस्य लक्षणम्७७४
भूतसत्त्वस्य लक्षणम्७७५
शाकुनसत्त्वस्य लक्षणम्७७६
राजससत्त्वस्य सामान्यलक्षण्७८१
पाशवसत्त्वस्य लक्षणम्७८२
मात्स्यसत्त्वस्य लक्षणम्७८३
वानस्पत्यसत्त्वस्य लक्षणम्७८४
तामससत्त्वस्य सामान्यलक्षणम्७८५
सत्त्वरजस्तमसां लक्षणानि७८६
सत्त्वानुरूपं देहिनामाचरणं तत्फलं च७९१
समानसत्त्वाया धात्र्याः प्रशस्तत्वम्७९२
नवविधसाराणां नामतो निर्देशः७९४
त्वक्सारबालस्य लक्षणम्७९६
रक्तसारबालस्य लक्षणम्७९७

विमानस्थानम् ३ ।

कर्णायजयावळीवनं(?)विमानम् ? ।

विषयपृ.पं.
अवेक्षितगदानां चिकित्सा८३१

शिष्योपक्रमणीयं विमानम् ? ।

विषयपृ.पं.
शिष्योपनयनयोग्यः कालः८३६
शिष्योपनयनविधिः८३८
शिष्यगुणाः८५१
गुरोर्गुणाः८५४
शिष्यानुशासनम्८६१
अध्ययनविधिः८७१
अनध्ययनकालाः८७४
अधीतायुर्वेदस्य कर्तव्यानि८७८
तद्विद्यसंभाषाविधिः८८७
आयुर्वेदविषये पञ्चदश प्रश्नाः८९१
आयुषो लक्षणम्८९४
आयुर्वेदशब्दस्य निरुक्तिः८९६
आयुर्वेदस्याष्टावङ्गानि८९८
आयुर्वेदस्योत्पत्तिः८९१०
ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यैः किमर्थमायुर्वेदोऽध्येयः८९१३
कौमारभृत्यतन्त्रस्याष्टस्वङ्गेष्वाद्यत्वम्८९१८
आयुर्वेदस्य पञ्चमवेदत्वप्रतिपादनम्९०१
आयुर्वेदस्य नित्यत्वप्रतिपादनम्९०६
आयुर्वेदस्य वातपित्तकफाश्रयत्वप्रतिपादनम्९०८
वातपित्तश्लेष्मप्रकृतीनां लक्षणानि९०१०

शारीरस्थानम् ४ ।

विषयपृ.पं.
ऋतुविभागः९५१
युगविभागेन कालविभागः९५४
*सृष्ट्युत्पत्तिक्रमः९७१
अष्टौ प्रकृतयः९७१
पञ्च बुद्धीन्द्रियाणि९७२
पञ्च कर्मेन्द्रियाणि९७३
पञ्च इन्द्रियार्थाः९७३
मनसोऽतीन्द्रियत्वम्९७३
क्षेत्रक्षेत्रज्ञनिरूपणम्९७४
आत्मनो लिङ्गानि९७५
मनसो लक्षणम्९७६
पञ्चमहाभूतानि९७८
महाभूतानां गुणाः९७८
नव द्रव्याणि९७९
गुणानां द्रव्याश्रितत्वम्९७९
खादीनां विशिष्टा गुणाः९७१०
इन्द्रियाणां विप्रकृष्टसन्निकृष्टवृत्तित्वम्९७१०
सर्वेन्द्रियाणां स्पर्शनलक्षणत्वम्९७११

असमानगोत्रीयशारीराध्यायः ?

विषयपृ.पं.
गर्भाभिवृद्धिक्रमः, चतुर्थादिमासेषु गर्भिण्या लिङ्गानि च१०२१

गर्भावक्रान्तिशारीराध्यायः ? ।

विषयपृ.पं.
जीवस्य गर्भेऽवक्रमणम्१०५१