काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
दशमूलात् प्रभृत्येते भागा दशपलाः स्मृताः । यवाः कुलत्था माषाश्च ........... ।।
| २१४ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | धात्रीचिकित्सिताध्यायः ? ] |
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दशमूलात् प्रभृत्येते भागा दशपलाः स्मृताः । यवाः कुलत्था माषाश्च ........... ।।
................................................ । ........... (जल)द्रोणे चतुर्थागावशेषिते ।।
तं कषायं परिस्त्राव्य पुनरग्नावधिश्रयेत् । अथेमान्यौषधान्यत्र पलिकानि निधापयेत् ।।
द्वे मेदे द्वे हरिद्रे च काकोल्यौ वृषजीवकौ । माषपर्णी ................................... ।।
.............................................. । त्वक्पत्रचन्दनोशीरं द्वे बले लवणद्वयम् ।।
मूर्वा श्वदंष्ट्रा शार्ङ्गष्टा श्यामा द्राक्षा सुरोहिणी ।
मधुकं हस्तिपिप्पल्यः कुष्ठं व्याघ्रनखं वचा ।।
सूक्ष्मैलागुरुकश्मर्यः शतपुष्पा परूषकम् ।
............................................. । ............................... नि च ।।
शङ्खपुष्पी विशल्या च वृश्चिकाली मधूलिका ।
दाडिमानि चाम्लानि गुग्गुल्वादि सुगन्धि च । अक्षोटं पनसं भव्यं प्राचीनमलकानि च ।।
शतावरी विदारी च मधुपर्णी विषा(णिका) ।
.................................................................. ।
.............................. (क)षायार्धाढकं भवेत् ।
लवङ्गपुष्पं कर्पूरं स्पृक्काऽथ कटुकाफलम् ।।
आढकं तिलतैलस्य क्षीरद्रोणं च पाचयेत् । तत् सिद्धं प्रतिसंहृत्य बलातैलं निधापयेत् ।।
घृतभाण्डे दृढे दान्ते ................................ ।
.................................................................. ।
........................................ सां म्रक्षणेषु(प्र)शस्यते ।
बलातैल निर्माण विधि—धोकर शुद्ध की हुई बलामूल (खरैटी की जड़)-१ तुला (१०० पल)। दशमूल, शतावरी, गिलोय, रोहिषतृण, रास्ना, वृश्चिकाली (वरहंटा-मेषशृंगी का भेद), पुनर्नवा, बांसा, सहचर (पियाबांसा), खस, सारिवा, मूर्वा (चव्य) ......, काकजंघा, अंशुमती (शालपर्णी), अश्वगन्धा, मृगैर्वारु (श्वेत अथवा बड़ी इन्द्रवारुणी), काला (त्रिवृत्-काली निशोत), नवमालिका (बासन्ती-नेवारी-वनमोगरा), अतिमुक्तक (तिनिश वृक्ष अथवा नवमल्लिका भेद), शार्ङ्गष्टा (काकमाची-मकोय अथवा गुंजा), कपित्थ (कैथ), त्रिफला तथा दशमूल-प्रत्येक १० पल। तथा यव (जौ), कुलत्थ और उड़द। .... जल १ द्रोण (४ आढक)। इन्हें पकाकर चतुर्थांश रहने पर उस कषाय को छानकर पुनः अग्नि पर रख दे। इसके बाद इसमें निम्न औषधियां प्रत्येक १ पल डालें-मेदा, महामेदा, हरिद्रा, दारुहरिद्रा, काकोली, क्षीरकाकोली, वांसा, जीवक, माषपर्णी, ... दालचीनी, तेजपत्र, चन्दन, खस, बला, अतिबला (अथवा नागबला), दोनों लवण (सैन्धव तथा सौवर्चल), मूर्वा (मरोड़फली-मोरबेल-चुरनहार), गोखरू, शार्ङ्गष्टा (काकमाची-मकोय अथवा गुंजा), श्यामा (काली त्रिवृत), द्राक्षा, कुटकी, मुलहठी, गजपिप्पली, कुष्ठ, व्याघ्रनख, वच, छोटी इलायची, अगर, गंभारी, सौंफ, परूषक (फालसा) ...., शङ्खपुष्पी, विशल्या (लांगली), वृश्चिकाली (बरहंटा), मधूलिका (गिलोय-अथवा नृत्यकुण्डक नामक तृण धान्य विशेष-मर्कट), अनार आदि अम्लपदार्थ, गुग्गुल आदि सुगन्धित पदार्थ, अखरोट, कटहल, भव्य (फलविशेष, ओट-Dillenia indica), पुराने आंवले, शतावरी, विदारीकन्द, मधुपर्णी (गिलोय), विषाणिका (अजशृंगी-उत्तरवारुणी)..... तथा लौंग के फूल, कपूर, स्पृक्का (सुगन्धशाक विशेषअसवर्ग-Trifolium
धात्रीचिकित्सिताध्यायः ? ] चिकित्सास्थानम् २१५
officinalis), कटुकाफल (कटुतुम्बी या कुटकी)-इनका कषाय आधा आढ़क । तिलतैल-१ आढ़क, दूध-१ द्रोण (४ आढ़क)-इन सबको मिलाकर पकाये। सिद्ध होने पर इस बला तैल को एक दृढ एवं हाथी दांत के बने हुए घृत युक्त (जिसमें पहले से घी का लेप किया गया हो) बर्तन में डालकर रख दें। .... मालिश करने के लिये यह तैल प्रशस्त माना गया है।
शाखागतं कोष्ठगतमस्थिमज्जसिरागतम् ।।
बहिराभ्यन्तरायामं हनुस्तम्भं शिरोभ्रमम् । एकपक्षवधं शोषम्लानकार्दितगुल्मिनम् ।।
बधिरं वेप (मानं च) .................... । ................................... ।।
.......... (ऽ) पस्मारमुन्मादं कटपूतनाम् । कर्णशूलं शिरःशूलं ब्रध्नं मारुतकुण्डलम् ।।
अशीतिं वातिकान् रोगान् योनिदोषांश्च विंशतिम् । रेतोदोषान् ग्रहान् सर्वान् बलातैलमपोहति ।।
वृद्ध्यां ................................ । ................................... ।।
...... ज्वरे जीर्णे तृतीयकचतुर्थके । नारीणां दुष्प्रजातानां योनिशूले श्रमेषु च ।।
नानातिसारज्वरयोः कफरोगेषु सर्वशः । नाजीर्णकृशमूर्च्छासु न च्छर्द्यां च प्रयोजयेत् ।।
(इति ताडपत्रपुस्तके १३९ तमं पत्रम्।)
बला तैल का उपयोग—यह बलातैल शाखा, कोष्ठ, अस्थि, मज्जा, एवं सिरागत रोगों, बाह्यायाम तथा अन्तरायाम, हनुस्तम्भ, शिरोभ्रम, एकाङ्गवध (Paresis), पक्षवध (Paralysis), शोष, म्लानक, अर्दित (facial Paralysis) गुल्म, बधिरता (बहरापन-Deafness), कंपकंपी, अपस्मार, उन्माद, कटपूतना (ग्रहरोग), कर्णशूल, शिरःशूल, ब्रध्न (आन्त्रवृद्धि-Hernia), वातकुण्डलिका, ८० वातरोग, २० योनिदोष, वीर्यदोष तथा सम्पूर्ण ग्रहरोगों को नष्ट करता है। इनके अतिरिक्त वृद्धि, ..... जीर्णज्वर, तृतीयक तथा चतुर्थक ज्वर, दुष्प्रजाता नारियों के योनिशूल एवं श्रम (थकावट), अनेक प्रकार के अतिसार एवं ज्वरों तथा सम्पूर्ण श्लैष्मिक रोगों में इसका प्रयोग करना चाहिये। परन्तु अजीर्ण, कृशता, मूर्च्छा, एवं छर्दि रोग में इसका प्रयोग नहीं करना चाहिये।
वक्तव्य—शाखा—रक्त आदि धातु तथा त्वचा को 'शाखा' शब्द से कहा जाता है। चरक सू. अ. ११ में कहा है—तत्र शाखा रक्तादयो धातवस्त्वक् च, स बाह्यो रोगमार्गः। यह रोग का बाह्यमार्ग समझा जाता है॥
एतेनैव विधानेन रास्नातैलं विपाचयेत् । निहन्ति रोगान् भूयिष्ठं य एते परिकीर्तिताः ।।
इसी उपर्युक्त विधान से ही रास्नातैल का पाक करे। यह भी उपर्युक्त रोगों को नष्ट करता है॥
शतावर्या बदर्याश्च गुडूच्या मधुकस्य च । पुनर्नवाया द्राक्षायाः पीलोः सहचरस्य च ।।
वृषस्य नागवीर्याया अनन्ताशतपुष्पयोः । स्वनामपाकतैलानामेष एव (विधिः स्मृतः) ।।
इसीप्रकार अपने २ नाम के अनुसार शतावरी, बदरी (बेर), गिलोय, मुलहठी, पुनर्नवा, द्रक्षा, पीलु, सहचर (पिया बांसा), बांसा, नागवीर्या, अनन्ता (सारिवा) तथा शतपुष्पा (सौंफ) आदि के तैल के पाक की भी यही विधि है॥
............ लं पक्वं तैले सहाचरे ।।
दद्यान्निर्मथ्य सततमेतद्र विशेषणम् ।
..... इसी प्रकार सहाचर (नीली कटसरैया-काला बांसा) का भी तेल बनाया जाता है। इनमें अन्तर इतना ही है कि उसे पानी में मथकर तैल में डाला जाता है॥
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श्योनाकतैलस्य विधिः स एव परिकीर्तितः ।।
कषाये मधुमांसस्य दद्यात् त्रिंशत्पलानि तु ।
श्योनाक तैल की भी यही निर्माण विधि है। इसमें श्योनाक के कषाय (क्वाथ) में ३० पल मधु (शहद अथवा सुरा) और मांस डालना चाहिये ॥
कपित्थतैलस्य विधिः स एव परिकीर्तितः ।।
कपित्थानां तु पक्वानां तुलां दद्यात् स ..... ।
कपित्थ तैल की भी यही निर्माण विधि है। इसमें पके हुए कपित्थ (कैथ) एक तुला (१०० पल) लेना चाहिये... ॥
......................... देव प्रकीर्तितम् ।।
केवलं स्वरसस्यात्र दद्यात्तैलाच्चतुर्गुणम् ।
..... इसी प्रकार इस श्लोक में भी किसी अन्य ओषधि के तेल का निर्माण दिया हुआ है जो कि उपर्युक्त विधान के अनुसार ही तैयार किया जाता है। भेद केवल इतना ही है कि इसमें स्वरस की मात्रा तैल से चतुर्गुण ली जाती है ॥
मीनतैलं च मीनानां कषायेण रसेन च ।।
पक्वं बलातैलमिव वातव्याधिषु शस्यते ।
मछली के कषाय तथा रस से पकाकर मीनतैल बनाया जाता है। इसका भी बलातैल के समान वातव्याधि में प्रयोग करना चाहिये ॥
बलाकाहंसवल्गूनां क्रौञ्चसारसयोरपि ।।
आटीशकुनकानां च तैलान्याहुः स्वनामभिः ।
इसी प्रकार अपने २ नाम के अनुसार बलाका (बिसकण्ठी बगुली), हंस, वल्गु, क्रौञ्च, सारस तथा आटी (दलदल के स्थान में रहने वाला पक्षीविशेष-Tardus-ginginia mus आदि पक्षियों के द्वारा तैल बनाये जाते हैं।
......................... (दौर्गं) न्ध्यनाशनम् ।
विधानं कीर्तितं पुण्यं षण्ढबन्ध्याप्रजाकरम् ।
...... ये दुर्गन्धि को नष्ट करते हैं। नपुंसक तथा बन्ध्या स्त्री के पुत्रोत्पत्ति के लिये इनका विधान दिया गया है ॥
योनिनासामुखश्रोत्रदौर्गन्ध्ये पिच्छिलेषु च ।।
कपित्थतैलं पिचुभिर्धारयेयुः सदा स्त्रियः ।
योनि, नासिका, मुख तथा श्रोत्र की दुर्गन्धि एवं पिच्छिलता में स्त्रियों को सदा पिचु (Swab) के द्वारा कपित्थ तैल को धारण करना चाहिये ॥
सहकाररसेनापि तद्वत्तैलं प्रशम्यते ।।
विविधानां च तैलानां हृद्या .........
............ न्यानां च निषेवणम् ।।
सहकार (आम्र) के रस से भी तैल का निर्माण किया जाता है इसी प्रकार अनेक तरह के हृदय को अच्छे लगने वाले तैलों का प्रयोग करना चाहिये ......... ॥