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सर्वकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

पृष्ठ 870, कुल 942 में से

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पृष्ठ 870

५१० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् चर्मदलचिकित्सिताध्यायः १५]

अथ या धात्री गुर्वम्ललवणमधुराभिष्यन्दिदिवास्वप्नालस्याहितानि चात्यर्थमुपसेवते तस्याः प्रकुपितः श्लेष्मा वायुना समुदीर्यमाणः स्तन्यमभिदूषयति। तस्य लक्षणं—जले निषीदत्यधस्ताद्रूपेण सान्द्रं स्नेहबहुलं स्पर्शेन शीतपिच्छिलं रसेन मधुरमिति। तत् पिबतो जन्तोरिमानि रूपाणि भवन्ति—शीतस्तिमितस्निग्धसान्द्रैर्मण्डलैः श्वेताभैर्बहुभिर्नात्यर्थवेदनाकरैः सर्षपमात्रीभिः पिडकाभिरुपचितैश्चिरपाकिभिः सकण्डूतोदयुतैरुपचीयते, ततोऽस्य प्रतिश्याया-रोचकाङ्‌गौरवकासपाका उत्पद्यन्ते, बहुलं पिच्छिलं चाऽनुबद्धमतिसार्यते, निष्ठनति श्लेष्माणं छर्दयति, तन्द्राभिभूतः श्वेततालवोष्ठश्च भवतीति श्लेष्मचर्मदलः ॥९॥

जो धात्री गुरु, अम्ल, लवण, मधुर, अभिष्यन्दि आहार और दिन में सोना, आलस्य तथा अन्य अहितकर आचार आदि का अत्यधिक सेवन करती है उसका प्रकुपित हुआ श्लेष्मा वायु से प्रेरित होकर स्तन्य (दूध) को दूषित कर देता है। उस श्लेष्मा से दूषित दूध के निम्न लक्षण होते हैं—यदि उसे जल में डाला जाय तो वह नीचे बैठ जाता है, वह देखने में सान्द्र (गाढ़ा-Concentrated) होता है, उसमें स्नेह (चिकनाई-Fat) की अधिकता होती है, वह स्पर्श में शीतल तथा पिच्छिल (चिपचिपा सा) होता है तथा उसका रस मधुर होता है। योगरत्नाकर में कहा है—कफदुष्टं घनं तोये निमज्जति सुपिच्छिलम्। उस दूध का सेवन करनेवाले बालक में निम्न लक्षण हो जाते हैं—उसके शरीर में शीत, स्तिमित (जड़ीभूत), स्निग्ध तथा सान्द्र (घने) मण्डल (चकत्ते-दाग) हो जाते हैं तथा श्वेत रंग वाले, संख्या में बहुत, कम वेदना वाले, सरसों के बराबर बड़े, बहुत देर में पकनेवाले तथा कण्डू एवं तोद (पीड़ा) से युक्त पिडिकायें हो जाती हैं। उसके बाद उसे प्रतिश्याय, अरुचि, अङ्गगौरव, कास तथा पाक आदि हो जाते हैं। उसे संख्या में बहुत, पिच्छिल तथा ढीले (बिना बंधे हुए) दस्त आते हैं, वह कठिनता से श्वास लेता है तथा श्लेष्मा का वमन करता है अर्थात् उसकी वमन में श्लेष्मा आती है। वह तन्द्रायुक्त होता है तथा उसके ओष्ठ एवं तालु सफेद हो जाते हैं। ये श्लैष्मिक चर्मदल के लक्षण हैं ॥९॥

यदा तु त्रिदोषसंसृष्टं क्षीरमनुपिबति तदाऽस्याङ्गे मण्डलानि प्रादुर्भवन्ति कृष्णरक्तावभासानि दग्धगुडप्रकाशानि वा त्रिभिर्गुणैरन्वितानि क्षिप्रपाकीनि विगन्धीन्यवदीर्णानि पूतिकुणपविस्त्रावीणि चेति । तैः स सर्वावनद्धाङ्गो निष्ठनत्यनिशं कृच्छ्रेण रोदिति स्तनं नाभिनन्दति, कृष्णारुणवर्णावभासं चाऽतिसार्यते । सोऽसाध्यः सन्निपातात्मक इति ।।१०।।

जब बालक त्रिदोषयुक्त दूध पीता है तब उसके शरीर में काले तथा लाल वर्ण वाले, जले हुए गुड के समान दिखाई देने वाले, तीनों दोषों के गुणों युक्त अर्थात् तीनों दोषों वाले, शीघ्र पक जाने वाले, दुर्गन्धयुक्त, विदीर्ण होने वाले (फटने वाले) तथा जिनमें से पूति (दुर्गन्धि) एवं कुणप (मुर्दे की गन्धवाला) स्राव निकलता हो—ऐसे मण्डल (चकत्ते-दाग) हो जाते हैं। उन मण्डलों के द्वारा उसका सम्पूर्ण शरीर व्याप्त हो जाता है, वह निरन्तर कष्टपूर्वक सांस लेता है, रोते हुए उसे कष्ट होता है, उसे दूध पीने की इच्छा नहीं होती है तथा उसे काले एवं अरुण (लाल) रंग के अतिसार आने लगते हैं। यह सान्निपातिक चर्मदल असाध्य होता है ॥१०॥

छर्दितृष्णाज्वराध्मानश्वयथुहिक्काश्वासस्वरभेदोपद्रवान्वितश्च प्रत्याख्येयः ॥११॥

जिस चर्मदल में वमन, तृष्णा, ज्वर, आध्मान, शोथ, हिक्का, श्वास, स्वरभेद आदि उपद्रव हो जाते हैं वह प्रत्याख्येय (असाध्य) होता है ॥११॥

भवन्ति चात्र श्लोकाः—

नोपक्रमेदसाध्यं तु साध्यं यत्नेन साधयेत् । यत् पश्येद् द्वन्द्वजं रूपे पाकं वा रूपतोऽधिकम् ।।१२।।
तस्य तस्य विदित्वा तु क्रियां सम्यक् प्रयोजयेत् ।