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सर्वकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 794
४३४काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्रक्तगुल्मविनिश्चयाध्यायः ९]

स्नेहप्रमाणं यद्बस्तौ निरूहस्त्रिगुणस्ततः । अतिव्यवायव्यायामपानयानाध्वसङ्गिनः ।। १०९ ।।
वयस्थाः स्नेहसात्म्याश्च येषां चाग्निबलं दृढम् ।
येषां चाधः प्रकुपितो वायुर्वातात्मकाश्च ये ।। ११० ।।
तेषूत्तमां प्रणिदधेत् स्नेहमात्रां विचक्षणः । य एभ्यो मध्यमावस्थाः पुरुषास्तेषु मध्यमाम् ।। १११ ।।
वयोव्याधिबलावेक्षामितरामितरेषु च । इति कर्मादिबस्तीनां त्रितयं समुदाहृतम् ।। ११२ ।।

स्नेह की उत्तम मात्रा किन्हें देनी चाहिये ? —जो अत्यन्त मैथुन, व्यायाम, मद्यपान, यान (सवारी) तथा मार्गगमन करते हों, जिनकी आयु स्थिर हो, जिन्हें स्नेह सात्म्य हुआ हो, जिनकी जाठराग्नि दृढ़ हो, जिनके शरीर के अधोभाग में वायु का प्रकोप हो, जिनकी वातिक प्रकृति हो अथवा जिन्हें वायु के विकार हों—उनमें बुद्धिमान व्यक्ति को स्नेह की उत्तम मात्रा देनी चाहिये । जो पुरुष उपर्युक्त सब दृष्टियों से मध्यम अवस्था वाले हैं—उन्हें स्नेह की मध्यम मात्रा देनी चाहिये । जो व्यक्ति अवस्था, रोग तथा बल की दृष्टि से निकृष्ट (हीन) हैं—उनमें स्नेह की हीन मात्रा देनी चाहिये ।

इस प्रकार कर्म आदि (कर्म, काल, योग) तीनों बस्तियों का वर्णन किया गया है ।। १०९-११२ ।।

निर्देशश्च विकल्पश्च प्रविभागश्च कात्स्न्र्यतः ।
यच्च यस्मिन् विधातव्यं या मात्रा येषु युज्यते ।। ११३ ।।
निरूहयुक्तिः स्नेहश्च निरूहश्च प्रकीर्तितः । इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।। ११४ ।। अड(१११)
इति खिलेषु बस्तिविशेषणीयो (नामाष्टमोऽध्यायः ।। ८ ।।) उ (८)


इन सम्पूर्ण बस्तियों का पूर्णरूप से निर्देश, विकल्प (भेद) तथा विभाग कहे गये हैं । जिस बस्ति का जिस रोग तथा जिस मात्रा में व्यवहार करना चाहिये वह भी कह दिया गया है । निरूहबस्ति की योजना, स्नेह तथा निरूह इन सबका वर्णन कर दिया गया है । ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।। ११३-११४ ।।

अड (१११)
इति खिलेषु बस्तिविशेषणीयो (नामाष्टमोऽध्यायः ।। ८ ।।) उ (८)


अथ रक्तगुल्मविनिश्चयाध्यायो नवमः ।

अथातो रक्तगुल्मविनिश्चयमध्यायं व्याख्यास्यामः ।। १ ।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।। २ ।।

अब हम रक्तगुल्म विनिश्चय नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे । ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।। १-२ ।।

भगवन्तमृषिश्रेष्ठं सर्वशास्त्रविदां वरम् । कश्यपं भार्गवो धीमान् पर्यपृच्छत् प्रजापतिम् ।। ३ ।।

ऐश्वर्ययुक्त, सम्पूर्ण शास्त्रों के ज्ञाता तथा ऋषियों में श्रेष्ठ प्रजापति कश्यप से बुद्धिमान भार्गव (भृगुकुलोत्पन्न जीवक) ने प्रश्न किया ।। ३ ।।