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सर्वकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

पृष्ठ 782, कुल 942 में से

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पृष्ठ 782

४२२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् बस्तिविशेषणीयाध्यायः ८]

कालबस्ति—कर्मबस्ति की अपेक्षा संख्या में आधी होने के कारण इसे कालबस्ति कहते हैं। शरीर में बल मध्यम होने पर तथा वायु के साथ पित्त का संसर्ग होने पर बुद्धिमान व्यक्ति को इसका प्रयोग करना चाहिये ॥८॥

अल्पत्वात् स्नेहबस्तीनां युक्तेर्योगः स लाघवात् ।।९।।
प्रयोज्यः कफसंसृष्टे नातितीव्रबलेऽनिले ।

योगबस्ति—इसमें स्नेहबस्तियों के योग के कम होने से तथा इसी लिये लघु होने से इसे योगबस्ति कहा है। यदि कफ का संसर्ग हो तथा इसमें वायु का बल अधिक तीव्र न हो तो इसका प्रयोग करना चाहिये ॥९॥

अन्वासनाश्चतुर्विंशतिर्निरूहाः षट् च कर्मणि ।।१०।।
(द्वादशाऽन्वासनाः काले) निरूहाश्चात्र वै त्रयः ।।११।।
त्रय एव निरूहाः स्युर्योगे पञ्चानुवासनाः । कर्मादीनां त्रिपञ्चाशद्वस्तिसंख्या निदर्शिता ।।१२।।

कर्मबस्ति समुदाय में अनुवासन बस्ति २४ तथा निरूह बस्तियां ६ होती हैं। कालबस्तियों में १२ अनुवासन तथा ३ निरूह बस्तियां होती हैं। तथा योगबस्ति में ५ अनुवासन तथा ३ निरूह बस्तियां होती हैं। इस प्रकार कर्म, काल तथा योग में कुल बस्तिसंख्या ५३ होती हैं। कर्मबस्तियां कुल ३०, कालबस्तियां १५ तथा योगबस्तियां ८ होती हैं। इस प्रकार कुल ३०+१५+८=५३ बस्तियां होती हैं। चरक सि. अ. १ में कहा है--त्रिंशत्स्मृताः कर्मसु बस्तयो हि कालस्ततोऽर्धेन ततश्च योगः। अर्थात् कर्म ३० बस्तियों के समुदाय को कहते हैं। कालसंज्ञक बस्ति समुदाय में कर्म की अपेक्षा आधी अर्थात् १५ या १६ बस्ति होती हैं। और योग संज्ञक बस्ति समुदाय में इसमें भी आधी अर्थात् ८ बस्तियां होती हैं। यहां कुल संख्या ३०+१६+८=५४ दी है। क्योंकि १५ का आधा करने पर ७-१/२ होता है जो कि बस्ति की अवस्था में संभव नहीं। आधी बस्ति नहीं दी जा सकती। इस लिये इसे १६ मान लिया गया है। जिससे उसका आधा करने पर योगबस्तियां ८ होती हैं ॥१०-१२॥

पञ्चादौ कर्मणि स्नेहाश्चत्वारोऽन्ते तथाऽनयोः । मध्ये षण्णां निरूहाणामन्तरेषु त्रयस्त्रयः ।।१३।।
आदावन्तेऽन्तरे चैव काले स्नेहास्त्रयस्त्रयः । योगे निरूहान्तरितास्त्रयोऽन्ते द्वाविति क्रमात् ।।१४।।
प्रोक्तो विभागनिर्देशस्तद्विकल्पमतः शृणु ।

कर्मबस्ति में प्रारम्भ में ५ तथा अन्त में ४ स्नेहबस्तियां होती हैं तथा इनके मध्य में भी ६ निरूहों के बीच में तीन स्नेहबस्तियां होती हैं कालबस्ति में प्रारंभ, अन्त तथा बीच में भी तीन २ स्नेहबस्तियां होती हैं। अर्थात् इसमें स्नेह-बस्तियां ३ प्रारंभ में, तीन अन्त में तथा एक २ निरूह के व्यवधान से तीन निरूहों के बीच में तीन २ (अर्थात् ६) मध्य में होती हैं। इसमें निरूह बस्ति ३ होती हैं। योग बस्ति में स्नेहबस्तियां निरूह के व्यवधान से बीच २ में तीन तथा दो अन्त में होती हैं। अर्थात् तीन मध्य में, दो अन्त में एवं एक प्रारंभ में होती है। तथा बीच २ में तीन निरूह होती हैं। इन्हें हम निम्नरूप में रख सकते हैं-कर्मबस्ति-५ स्नेह+१ निरूह+३ स्नेह+१ निरूह+३ स्नेह+१ निरूह+३ स्नेह+१ निरूह+३ स्नेह+१ निरूह+३ स्नेह+१ निरूह+४ स्नेह=३०, कालबस्ति-३ स्नेह+१ निरूह+३ स्नेह+१ निरूह+३ स्नेह+१ निरूह+३ स्नेह=१५, योगबस्ति-१ स्नेह+१ निरूह+१ स्नेह+१ निरूह+१ स्नेह+१ निरूह+२ स्नेह+८। चरक सि. अ. १ में यह बस्ति समुदाय कुछ भिन्न रूप में मिलता है। तद्यथा-कर्मबस्ति में १ स्नेहबस्ति आदि में+५ अन्त में+मध्य में १२ अनुवासन+१२ निरूह=३० बस्तियां काल बस्ति में अन्त में ३ स्नेहबस्तियां+प्रारंभ में १ स्नेहबस्ति+निरूह के व्यवधान से ६ स्नेहबस्तियां=१६ बस्तियां। योगबस्ति में ३ निरूह+आदि, अन्त और मध्य की मिलाकर ५ स्नेहबस्तियां=८ बस्तियां। इस प्रकार यह कर्म, काल तथा योग के अनुसार बस्तियों के विभाग का निर्देश किया गया है। अब इसके विस्तार को सुनो। यहां यह जिज्ञासा हो सकती है कि इस प्रकार निरूह एवं अनुवासन के