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सर्वकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

पृष्ठ 744, कुल 942 में से

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पृष्ठ 744

३८४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् यूषनिर्देशीयाध्यायः ४]

सर्वरोगेषु भूयिष्ठं संसृष्टेषु प्रशस्यते। अत्यग्निषु विनिद्रेषु स्तब्धाङ्गच्छुबुकाक्षिषु (?) ।।६२।।
निर्यूहिण समं दद्यान्मांसनिर्यूहमेव तु। कार्यः सतितलकल्को वा जीर्णातीसारशान्तये ।।६३।।

दीपक पञ्चमूल, मधुर वर्ग के फल, सब धान्य, धनिया, मरिच, काकोली, क्षीर काकोली, गंभारी, फालसा, बेर, कुलत्थ, रास्ना, एरण्ड, पुनर्नवा, दो पल गोखुरु तथा तरुण सुहांजना और ढाक—इन्हें एक द्रोण जल में पकाकर इस क्वाथ का चतुर्थांश शेष रखे। दही, कांजी, सिरका, तैल तथा घृत—सब एक २ प्रस्थ होने चाहिये। पत्र सहित तरुण मूलियां १०० होनी चाहिये। यह त्रिकटु के संस्कार से संस्कृत करके सिद्ध किया हुआ यूष महायूष कहलाता है। यह सब प्रकार के मिश्रित रोगों, अग्नि की वृद्धि, अनिद्रा, स्तब्धाङ्ग तथा छुबुकाक्षि (?) रोगों में प्रशस्त माना गया है। इस निर्यूह के समान इसमें मांस का निर्यूह और तिल का कल्क मिलावे। यह जीर्ण अतिसार को नष्ट करता है ।।५७-६३।।

उक्तो लशुनयूषस्तु स्वकल्पे वातनाशनः। सूपाश्च रसकाश्चैव त्रिविधाः प्राङ्निदर्शिताः ।।६४।।

लशुन कल्प में वातनाशक लशुन यूष कहा गया है। पहले तीन प्रकार से सूप तथा रसक कहे गये हैं ।।६४।।

स्विन्नानि मूलकान्यप्सु निष्पीड्य तरुणो विभुः। परिभृज्य ततः स्नेहे तत आदानमावपेत् ।।६५।।
एष मूलकयूषस्तु सर्वरोगविनाशनः।

तरुण एवं सर्वज्ञाता वैद्य पानी में मूली को उबाल कर पीस ले। तब उसे स्नेह (घृत या तैल) में भून ले उसमें प्रक्षेप डालकर यूष बनाये। यह मूलक यूष सब रोगों को नष्ट करता है ।।६५।।

अनम्लोलदक(लावक ?)रसः संस्कृतो जलसर्पिषोः ।।६६।।
भवेत् पित्तोपशमनस्तैलभृष्टोऽनिलापहः।

अम्ल (खटाई) से रहित लावक (बटेर) का मांस रस जल और घृत में संस्कृत किया हुआ पैत्तिक रोगों को शान्त करता है तथा तेल में भूनने पर वात को नष्ट करता है ।।६६।।

एते यूषाः स्वतन्त्रोत्था उक्ता व्याससमासतः ।।६७।।

ये स्वतन्त्र रूप से बनाये हुए यूष विस्तार तथा संक्षेप से कहे गये हैं ।।६७।।

यवागूरपि वक्ष्यामि नानाद्रव्योपसंस्कृताः। नानारोगोपशमनीः शृणु वृद्धैकविंशतिम् ।।६८।।

अब मैं नाना द्रव्यों से संस्कृत यवागुओं का वर्णन करूंगा। हे वृद्धजीवक ! तू नाना रोगों को शान्त करनेवाली २१ यवागुओं को सुन ।।६८।।

ओदनस्य विलेप्याश्च यवाग्वाश्च किमन्तरम्। शुश्रूषे भगवन्नेतदित्युक्तः प्राह कश्यपः ।।६९।।

हे भगवन् ! मैं ओदन, विलेपी तथा यवागू के भेद को सुनना चाहता हूँ। यह प्रश्न किया जाने पर भगवान् कश्यप ने उत्तर दिया ।।६९।।

ओदनो विशदः सिद्धः सुस्विन्नो निस्रुतो मृदुः। तण्डुलैः सकलप्रायैरक्षीणैश्चापि पठ्यते ।।७०।।

ओदन के गुण—ओदन विशद होता है, सिद्ध किया हुआ होता है, अच्छी प्रकार से स्विन्न (उबाला हुआ-पकाया हुआ) होता है, निस्रुत—इसमें से मांड चुआ दी जाती है, मृदु होता है तथा इसमें तण्डुल (चावल) सम्पूर्ण (पूरे) होते हैं तथा कम नहीं होते ।।७०।।

अस्विन्नत्वमवक्लेदस्त्वसाकल्यमनिस्स्रवः। विरसोऽविशदः शीत ओदनस्य विपर्ययाः ।।७१।।