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काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

पृष्ठ 570, कुल 942 में से

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पृष्ठ 570

२१२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् धात्रीचिकित्सिताध्यायः ? ]

धात्रीचिकित्सिताध्यायः ।

अथातो धात्रीचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ।।१।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।२।।

अब हम धात्री-चिकित्सा का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ॥१-२॥

............................... । धात्रीचिकित्सां निखिलां वक्तुमर्हसि मे मुने ।।
सुखं दुःखं हि बालानां धात्रीमूलमसंशयम् ।

हे महर्षि ! आप मुझे सम्पूर्ण धात्री-चिकित्सा का उपदेश कीजिये । क्योंकि बालकों के सब दुःख और सुख (रोग और आरोग्य) धात्री पर ही आश्रित होते हैं ॥

इति पृष्टः स शिष्येण स्थविरेण महातपाः ।।
धात्रीचिकित्सितं कृत्स्नं प्रोवाच वदतां वरः ।।

इस प्रकार ज्ञानी शिष्य द्वारा प्रश्न किये जाने पर महातपस्वी एवं श्रेष्ठ विद्वान् महर्षि कश्यप ने उसे सम्पूर्ण धात्रीचिकित्सा का उपदेश किया ॥

....................... । ................ ।।
........ (पु)ष्पिकी धात्री तीक्ष्णाग्निर्वातपैत्तिकी ।।
समधातुः समाग्निस्तु विषमैर्विषमाग्निकी ।

..... जिस धात्री को मासिक स्राव नियमपूर्वक होता हो तथा वात और पित्त की प्रधानता हो वह धात्री तीक्ष्ण अग्नि वाली होती है । वातादि धातुओं के समावस्था में होने से अग्नि सम होती है तथा उनके विषम होने से अग्नि विषम होती है । चरक वि. अ. ६ में चार प्रकार की अग्नि (जाठराग्नि) का वर्णन किया है—अग्निषु तु शरीरेषु चतुर्विधो विशेषो बलभेदेन भवति तद्यथा-तीक्ष्णो मन्दः समो विषम इति । तत्र तीक्ष्णोऽग्निः सर्वोपचारसहः, तद्विपरीतलक्षणो मन्दः, समस्तु खल्वपचारतो विकृतिमापद्यतेऽनपचारतस्तु प्रकृताववतिष्ठते, समलक्षण-विपरीतलक्षणस्तु विषमः, इत्येते चतुर्विधा भवन्त्यग्नयश्चतुर्विधानामेव पुरुषाणाम् । तत्र समवातश्लेष्मणां प्रकृतिस्थानां समाभवन्त्यग्नयः, वातलानां तु वाताभिभूतेऽग्न्यधिष्ठाने विषमा भवन्त्यग्नयः, पित्तलानां तु पित्ताभिभूतेऽग्न्यधिष्ठाने तीक्ष्णा भवन्त्यग्नयः, श्लेष्मलानां तु श्लेष्माभिभूते ह्यग्न्यधिष्ठाने मन्दा भवन्त्यग्नयः । अर्थात् शारीर अग्नियां बल भेद से चार प्रकार की होती हैं । १. तीक्ष्ण, २. मन्द, ३. सम, ४. विषम । जिन पुरुषों में वात, पित्त तथा कफ समावस्था में हों उनकी सम होती है । वातप्रधान पुरुषों की अग्नि विषम होती है । पित्तप्रधान पुरुषों की अग्नि तीक्ष्ण होती है तथा श्लेष्मप्रधान पुरुषों की अग्नि मन्द होती है ॥

आयुरायोग्यमूलं प्रजानां च समाग्निता ।।
विषमः सर्वरोगाणां मूलं ह्रास .......... ।
(इति ताडपत्रपुस्तके १३८ तमं पत्रम् ।)

सम अग्नि प्राणियों की आयु एवं आरोग्य का कारण होती है तथा विषम अग्नि सब रोगों का मूल है और शरीर का ह्रास करती है ॥