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काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

पृष्ठ 537, कुल 942 में से

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पृष्ठ 537

कुष्ठचिकित्सिताध्यायः ? ] चिकित्सास्थानम् १७९

शरमूलानि निष्क्वाथ्य शीतं पूतं च तज्जलम् ।।
शर्करामधुसंयुक्तं पिबेत् कृच्छ्रोपशान्तये ।

अब मूत्रकृच्छ्र की सामान्य चिकित्सा कही जायगी—मूत्र-कृच्छ्र की चिकित्सा—मूत्रकृच्छ्र रोग की शान्ति के लिये शर मूलों का क्वाथ बनाकर उसे शीतल करके छान कर उसमें शर्करा एवं मधु मिलाकर पिलाना चाहिये ॥

मधुकं शरमूलं च त्रिफला सितवारिका ।।
शृतं सशर्कराक्षौद्रं मूत्रकृच्छ्रनिवारणम् ।

मुलहठी, शरमूल, त्रिफला, सितवारिका (सिंहल पिप्पली) इनके क्वाथ में शर्करा एवं मधु मिलाकर पीने से मूत्रकृच्छ्र दूर होता है ॥

तार्णस्य पञ्चमूलस्य रसं निष्क्वाथ्य पाययेत् ।।
शर्कराक्षौद्रसंयुक्तं सर्वकृच्छ्रनिवारणम् ।

पञ्चतृण मूल के रस का क्वाथ करके उसमें शर्करा एवं मधु मिलाकर पिलाने से सब प्रकार के मूत्रकृच्छ्रों की शान्ति होती है ॥

शतावरी पृथक्पर्णी कुलत्थबदराणि च ।।
शर्करामधुसंयुक्तो लेहो मूत्रग्रहापहः ।

शतावरी, पृथक्पर्णी (पृश्निपर्णी), कुलत्थ तथा बेर इनका शर्करा एवं मधु के साथ अवलेह बनाकर देने से मूत्रग्रह (मूत्रकृच्छ्र) नष्ट होते हैं ॥

विपरीतं प्रमेहेभ्यो मूत्रकृच्छ्रेषु कल्पयेत् ।।
औषधं पानमन्नं च सुस्निग्धं मृदु शोधयेत् ।

मूत्रकृच्छ्र में प्रमेह के विपरीत (भिन्न) औषध, पान तथा अन्न (आहार) का व्यवहार करना चाहिये तथा अच्छी प्रकार स्निग्ध एवं मृदु शोधन (वमन-विरेचन) कराये ॥

मधुराणीक्षुविकृतीस्त्रपुसानि घृतं पयः ।।
सेवेत वर्जयेन्नित्यं यत् संग्राही विदाहि च ।

मूत्रकृच्छ्र में पथ्यापथ्य मधुर पदार्थ, गन्ने के विकार (गुड आदि), त्रपुस (खीरा), घी तथा दूध का सेवन करना चाहिये तथा संग्राही (Astringent) एवं विदाही पदार्थों का त्याग करना चाहिये। चरक चि. अ. २६ में इसका निम्न परहेज बताया है—व्यायामसंधारणशुष्कभक्षपिष्टान्नवातार्ककरव्यवायान् । खर्जूरशालूककपित्यजम्बूबिसं कषायं न रसं भजेत् ॥

ऊषकोऽथ बृहत्यौ द्वे श्वदंष्ट्रा वसुकावुभौ ।।
शृङ्गवेरं यवाश्चैव दर्भो वृक्षादनी बला । पिप्पली तैः शृतं क्षीरं घृतमात्रादि(वि)मूर्च्छितम् ।।
सरक्ते पाययेत् कृच्छ्रे क्षिप्रमेतेन सिध्यति ।

रक्तज मूत्रकृच्छ्र की चिकित्सा—दूषक (कल्लर नामक वृष्य कन्द), छोटी कटेरी, बड़ी, कटेरी, गोखुरु, दोनों कुटज (मीठा और कड़वा), आर्द्रक, जौ, दर्भ (डाभ) वृक्षादनी (बन्दाक), बला (खरैटी) तथा पिप्पली–इनके द्वारा दूध को पकाकर उसे थोड़े से घृत से मूर्छित करके पिलाने से रक्तज मूत्रकृच्छ्र शीघ्र ही नष्ट होता है ॥