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सर्वकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

पृष्ठ 527, कुल 942 में से

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पृष्ठ 527

गुल्मचिकित्सिताध्यायः ? ] चिकित्सास्थानम् १६१

अभया पिप्पली द्राक्षा गुडूची सपुनर्नवा । लवणक्षारगन्धर्वभार्गीरास्नारसाञ्जनम् ॥२७॥
तुल्यक्षीरं पचेदेतैर्घृतमक्षमसैर्भिषक् । शैशुकं नाम तत् सर्पिर्वातगुल्मनिवारणम् ॥२८॥

हरड़, पिप्पली, द्राक्षा, गिलोय, पुनर्नवा, सैन्धव नमक, सर्जक्षार, गन्धर्व (श्वेत एरण्ड), भार्गी, रास्ना, तथा रसौंत-प्रत्येक १ कर्ष। दूध तथा घृत समान मात्रा में लेकर यथाविधि घृत पाक करे। यह शैशुक घृत (शिशुसर्पि) कहलाता है। यह वातगुल्म को नष्ट करता है ॥२७-२८॥

स्निग्धस्विन्नसमाश्वस्तं गुल्मिनं स्त्रंसयेत्ततः । विरेचनेन मृदुना तैलेनैरण्डजेन वा ॥२९॥

स्नेहन तथा स्वेदन किये हुए गुल्म रोगी को आश्वासन देकर किसी मृदु विरेचन (Mild Lexative) या ऐरण्ड तैल से विरेचन कराये ॥२९॥

विरिक्तं च यथाकालं नातिरूक्षाणि भोजयेत् । युक्तामुलवणोष्णानि युक्तस्नेहरसानि च ॥३०॥
भोजयेद्गुल्मिनं नित्यं निदानगुरुवर्जकम् । न चातिभोजनं नित्यं शस्यते सर्वगुल्मिनाम् ॥३१॥

विरेचन हो जाने पर उचित काल में रोगी को ऐसे पदार्थ खिलाये जो अत्यन्त रूक्ष न हों तथा जिनमें योग्य परिमाण में अम्ल तथा लवण पड़ा हो, जो उष्ण हो तथा अच्छी प्रकार स्निग्ध हों। रोगी को सदा निदान (वातिक गुल्म के कारण) तथा गुरु पदार्थों का त्याग कर देनो चाहिये। सब प्रकार के गुल्मरोगियों को अधिक भोजन करना हितकर नहीं है ॥३०-३१॥

पिप्पलीं पिप्पलीमूलं चव्यं चित्रकनागरम् । बिल्वं कपित्थं बदरं वृषकं गणिकारिकाम् ॥३२॥
हिङ्गुदाडिमजीवन्तीवृक्षाम्लं साम्लवेतसम् । पौष्करं शटिन्दन्त्यौ च लवणानि च सर्वशः ॥३३॥
द्वौ क्षारावजमोदं च तुल्यं शुष्काणि चूर्णयेत् । मातुलुङ्गरसेनेते वटका बदरोपमाः ॥३४॥
कृताः सुखाम्बुना पेया मद्यैरम्लेन वा भिषक्! । वातगुल्ममुदावर्तं प्लीहशूलं च नाशयेत् ॥३५॥

पिप्पली, पिप्पलीमूल, चव्य, चित्रक, सोंठ, बिल्व, कैथफल, बेर, बांसा, गणिकारिका (क्षुद्र अग्निमन्थ), हींग, अनारदाना, जीवन्ती, वृक्षाम्ल (विषांबिल), अम्लवेत, पुष्करमूल, शठि (कपूरकचरी-या कचूर), दन्ती (जमालगोटा) पांचों नमक, दोनों क्षार (सर्जक्षार तथा यवक्षार) तथा अजमोद-इन सबको समान मात्रा में लेकर शुष्क चूर्ण करे। बिजौरे के रस में भावना देकर इसकी बेर के समान गोलियां बनाये। इन्हें वैद्य गरम पानी या मद्य के अनुपान से सेवन कराये। इससे वातगुल्म, उदावर्त, तथा प्लीहाशूल, नष्ट हो जाता है ॥३२-३५॥

मयूरांस्तित्तिरीम् क्रौञ्चान् कपोतान् वनकुक्कुटान् ।
यवगोधूमशालींश्च वातगुल्मी सदाऽश्रि(श्री)यात् ॥३६॥

वातगुल्म में पथ्य—वातगुल्म का रोगी सदा मयूर, तीतर, क्रौञ्च, कबूतर और जंगली मुर्गे का मांस तथा जौ, गेहूं तथा शालि चावलों का सेवन करे। चरक चि. अ. ५ में भी कहा है—कुक्कुटांश्च मयूरांश्च तित्तिरिक्रौञ्चवर्तकाः । शालयो मदिरा सर्पिर्वातगुल्मभिषग्जितम् ॥ हितमुष्णं द्रवं स्निग्धं भोजनं वातगुल्मिनाम् । समण्डवारुणीपानं पक्वं वा धान्यकैर्जलम् ॥३६॥

यति तु स्निह्यमानस्य वातगुल्मो न शाम्यति ।
हितमास्थापनं तस्य तथैवाप्यनुवासनम् । क्षीरानुपानामभयां सगुडां संप्रयोजयेत् ॥३७॥

यदि स्नेहन करते हुए भी रोगी का वातगुल्म शान्त न हो तो उसे आस्थापन एवं अनुवासन बस्तियां देनी चाहिये तथा दूध के अनुपान से गुड़ और हरड़ को मिलाकर प्रयोग करना चाहिये। चरक चि. अ. ५ में भी गुल्म (वातिक) में बस्ति की श्रेष्ठता बताई है—बस्तिकर्म परं विद्याद् गुल्मघ्नं तद्धिमारुतम् । स्वे स्थाने प्रथमं जित्वा सद्यो गुल्ममपोहति ॥३७॥