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काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

पृष्ठ 476, कुल 942 में से

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पृष्ठ 476
१९८काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्जातिसूत्रीयशारीराध्यायः ? ]

यदि रजस्वला स्त्री के रजोदर्शन के प्रथम दिन ही गर्भ की स्थिति हो जाय तो उसे वृक्षों के वातपुष्प की तरह 'वातगर्भ' कहते हैं तथा वह फलशून्य होता है अर्थात् उस गर्भ के सन्तान की उत्पत्ति नहीं होती है। यदि (रजोदर्शन के) दूसरे दिन गर्भाधान किया जाय तो गर्भपात (स्राव अथवा पतन$^१$) हो जाता है। रजोदर्शन के तीसरे दिन यदि गर्भाधान हुआ हो तो उत्पन्न बालक की सूतिकागृह में ही मृत्यु हो जाती है अथवा यदि मृत्यु न भी हो तो वह बालक दीर्घायु नहीं होता तथा हीन अङ्गों वाला उत्पन्न होता है। चरक. शा. अ. ८ में भी रजोदर्शन के बाद की प्रथम तीन रात्रियों में सहवास करना निषिद्ध है। कहा है—ततः पुष्पात्प्रभृति त्रिरात्रमासीत ब्रह्मचारिण्यधःशायिनी पाणिभ्यामन्त्रमजर्जरपात्रे भुञ्जाना न च कांचिद् मृजामापद्येत। सुश्रुत शा. अ. २ में भी कहा है—ऋतौ प्रथमदिवसात् प्रभृति ब्रह्मचारिणी दिवास्वप्नाञ्जनाश्रुपात-स्नानानुलेपनाभ्यङ्गनखच्छेदनप्रधावनहसनकथनातिशब्दश्रवणावलेखनानिलायासान् परिहरेत्। किं कारणं ? दिवा स्वपन्त्याः स्वापशीलः, अञ्जनादन्धः, रोदनाद्विकृतदृष्टिः, स्नानानुलेपनाद् दुःखशीलः, तैलाभ्यङ्गात् कुष्ठी, नखापकर्तनात् कुनखी, प्रधावनाच्चञ्चल, हसनाच्छ्यावदन्तौष्ठतालुजिह्वः, प्रलापी चातिकथनात्, अतिशब्दश्रवणाद्वधिरः, अवलेखनात् खलतिः, मारुतायाससेवनादुन्मत्तोगर्भं भवतीत्येवमेतान् परिहरेत्। इन तीन रात्रियों के बाद ऋतुकाल होता है जो कि ब्राह्मणी के लिये १२ दिन, क्षत्रिय स्त्री के लिये ११ दिन, वैश्य स्त्री के लिये १० दिन तथा अन्य शूद्र आदि स्त्रियों के लिये ९ दिन होता है। सुश्रुत शा. अ. २ में भी कहा है—तत्र प्रथमे दिवसे ऋतुमत्यां मैथुनमनापुष्यं पुंसां भवति, यश्च तत्राधीयते गर्भः स प्रसवमानो विमुच्यते, द्वितीयेऽप्येवं सूतिकागृहे वा, तृतीयेऽप्येवं पूर्णाङ्गोऽल्पायुर्वा भवति, चतुर्थेतु संपूर्णाङ्गो दीर्घायुश्च भवति। न च प्रवर्तमाने रक्ते बीजं प्रविष्टं गुणकरं भवति, यथा नद्यां प्रतिस्रोतः प्लाविवद्रव्यं प्रक्षिप्तं प्रतिनिवर्त्तते नोर्ध्वं गच्छति तद्वदेव द्रष्टव्यम्। तस्मान्नियमवर्ती त्रिरात्रं परिहरेत्। अतः परं मासादुपेयात्। चतुर्थ दिन से लेकर अगले रजोदर्शन तक स्त्री-पुरुष परस्पर सहवास कर सकते हैं। यदि रजोदर्शन न हो तो इसका अभिप्राय यह है कि गर्भ की स्थिति हो चुकी है। उस अवस्था में पुनः मैथुन नहीं करना चाहिये। ऋतु-बीज (शुक्र और शोणित) तथा काल की भी अपेक्षा रखता है—ऐसा महर्षियों ने कहा है। अर्थात् केवल ऋतु के यथोचित होने मात्र से ही गर्भोत्पत्ति नहीं होती है अपितु उसके साथ स्त्री-पुरुष का शोणित तथा शुक्र शुद्ध एवं पूर्ण होना चाहिये तथा काल भी यथावत् होना चाहिए तब गर्भ की स्थिति होती है। सुश्रुत शा. अ. २ में गर्भोत्पत्ति की अङ्कुरोत्पत्ति के साथ बड़ी सुन्दर तुलना की गई है—ध्रुवं चतुर्णां सन्निध्याद् गर्भः स्याद्विधिपूर्वकः। ऋतुक्षेत्राम्बुबीजानां सामग्र्यादङ्कुरो यथा।। जिस प्रकार अंकुर की उत्पत्ति ऋतु (वर्षा आदि काल), क्षेत्र (खेत-भूमि), अम्बु (जल) तथा बीज पर निर्भर है उसी प्रकार गर्भ की उत्पत्ति भी ऋतु (रजोकाल) क्षेत्र (गर्भाशय का शुद्ध होना), अम्बु (आहार के परिणाम से उत्पन्न होने वाली रसधातु) तथा बीज (शुक्र तथा आर्तव) पर निर्भर है। अर्थात् ये चारों अवस्थायें ठीक हों तभी गर्भ की स्थिति सम्यक् प्रकार से हो सकती है। इन उपर्युक्त १२ रात्रियों के अतिरिक्त समय 'अकाल' कहलाता है अर्थात् इन में मैथुन नहीं करना चाहिये। इसीलिये सुश्रुत में कहा है—"त्रयोदशीप्रभृतयो निन्द्याः”। इस अकाल में स्थित गर्भ अकाल में होने वाले धान्य की तरह हीन गुणों वाला, दुर्बल, अस्थिर, अदृढ (कमजोर), पतला तथा भङ्गुर होता है ॥५॥

युग्मेष्वहःसु पुत्रकामोऽन्यत्र कन्यार्थी हर्षितस्तृप्तोऽनुरुद्धः स्त्रियमुपेयादिति सिद्धम् ॥६॥

पुरुष यदि पुत्रोत्पत्ति का इच्छुक है तो हर्षयुक्त (प्रसन्न अथवा ध्वजहर्ष होने पर), तृप्त तथा अनुरुद्ध (किसी अन्य स्त्री को न चाहता) हुआ युग्म दिनों में अर्थात् रजोदर्शन से चौथी, छठी, आठवीं, दसवीं तथा बारहवीं रात्रि में स्त्री से


१. सुश्रुत निदान अ. ८ में गर्भपात तथा गर्भास्राव का निम्न भेद दिया है—आचतुर्थातत्तो मासात् प्रस्रवेदगर्भ विद्रवः । ततः स्थिरतर शरीरस्य पातः पञ्चमषष्ठयोः ॥ अर्थात् गर्भाधान से चतुर्थमास तक गर्भस्राव होता है अर्थात् गर्भ, स्राव के रूप में गिरता है तथा उसके बाद पांचवें और छठे मास में स्थिर (घन) गर्भ का पात होता है। आधुनिक विज्ञान के अनुसार गर्भस्राव को Abortion तथा गर्भपात को miscarriage कहते हैं।