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सर्वकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

पृष्ठ 440, कुल 942 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 440
८२काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्लक्षणाध्यायः २८]

रेखा—पहले बताया जा चुका है कि आयुरेखा कनिष्ठका के मूल से तर्जनी के मूल तक जाती है। इस रेखा से प्रत्यक्ष रूप से बालक की आयु का विचार किया जाता है। मनुष्य की पूर्ण आयु १२० वर्ष की मानी गई है। कहा भी है— समाः षष्ठिर्द्विघ्ना मनुजकरिणां पञ्च च निशा। हयानां द्विपष्ठिः............ इत्यादि ।। (वराहमिहिर) यह आयु बुध स्थान से लेकर बृहस्पति स्थान तक क्रमशः १०, २०, ४० एवं ५० (= १२०) गणना के अनुसार ४ भागों में विभक्त हुई पूर्ण आयु (१२० वर्ष) को प्रकट करती है। भाग्यरेखा—इस रेखा से अधिकतर बालक के कार्य (राजसेवा-नौकरी) इत्यादि का विचार किया जाता है। रविरेखा—इस रेखा से बालक की विद्या एवं यश, प्रभाव आदि का विचार होता है। वाणिज्यरेखा—इस रेखा से स्वास्थ्य का विषय तथा व्यवसाय आदि का विचार किया जाता है इन तीनों रेखाओं (भाग्य, रवि तथा वाणिज्य रेखाओं) को सम्मिलित रूप से भाग्यरेखा कहा जा सकता है क्योंकि इन तीनों रेखाओं के द्वारा बालक के भव्य का ज्ञान होता है इन मुख्य रेखाओं के फलों के अतिरिक्त अनुग रेखाएं अपनी-अपनी मुख्य रेखाओं को दोषरहित करके अधिक बलवान बनाती है तृतीय श्रेणी की रेखाएं—वज्ररेखा-शुभस्थान अर्थात् बृहस्पति, शुक्र और सम उच्च चन्द्रमा तथा बुध के स्थान में भी ग्रहों के अपने २ स्वाभाविक भावों को बढ़ाते हैं। यदि यह वज्र रेखा क्रूर ग्रहों के स्थानों में (विशेषकर मंगल और शनि) हो तो उनकी स्वाभाविक अनिष्टकारिता को बढ़ाते हैं। नक्षत्ररेखा—इसके फल भी प्रायः इसी प्रकार के होते हैं। परन्तु नक्षत्रचिह्न वज्र की अपेक्षा अधिक बलशाली होता है। यवचिह्न—यह किसी रेखा या स्थान पर हो तो अनिष्टकारी माना जाता है। केवल अंगुष्ठ के मध्य में यदि यह चिह्न हो तो शुभ माना जाता है। उस अवस्था में बालक विद्वान्, अवि अथवा धनवान होता है। चतुष्कोण—इस रेखा के फल-बुध एवं बृहस्पति स्थान में शुभ होते हैं। इनके अतिरिक्त स्थानों में इसका होना अनिष्टकारक होता है। त्रिकोण—यह रेखा जिस ग्रह के स्थान में होती है उसी ग्रह की सबलता प्रकट करती है। यह चिह्न साधारणतया सभी स्थानों में प्रशस्त माना जाता है। इन उपर्युक्त सभी हस्तरेखाओं एवं चिह्नों का विचार करके बालक की आयु, भाग्य तथा कर्माजीव आदि का निर्णय किया जाता है। विषयान्तर होने से हमने संक्षेप में ही इस विषय को यहां दिया है। विशेष ज्ञान के लिये पाठकों को यह विषय अन्यत्र देखना चाहिये।


(चित्र: हस्तरेखा एवं ग्रह-स्थान)

  • भाग्य रेखा
  • बृहस्पति, शनि, रवि, बुध
  • मंगल
  • रवि रेखा
  • शुक्र
  • चन्द्र
  • भाग्य रेखा

करतल में सप्तग्रहों के पृथक्-पृथक् स्थान, पृष्ठ (सूत्रस्थान)