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काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

पृष्ठ 364, कुल 942 में से

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पृष्ठ 364

६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् लेहाध्यायः ? ]

ग्रीवामूल अथवा अंसफलकास्थि (Clavicles-collar-bones) से है। उससे ऊपर के रोगों अर्थात् श्रवण, नयन, मुख, नासिका तथा सिर के रोगों को ऊर्ध्वजत्रुज या शालाक्य रोग कहते हैं।

अलसक—यह विसूचिका का भेद है। इसकी निरुक्ति निम्न प्रकार से की है—'प्रयातिनोर्ध्वं नावन्तात् आहारो न विपच्यते। आमाशयेऽलसीभूतस्तेन सोऽलसकः स्मृतः॥ कफ द्वारा मार्गों के रुक जाने से आहार आमाशय में ही स्थित रहता है। वह न नीचे की ओर आता है और न ऊपर की ओर जाता है। अन्दर ही आलसी की तरह पड़ा रहता है इसीलिये इसे अलसक कहा है। इसके लक्षण निम्न होते हैं' कुक्षिरानह्यतेऽत्यर्थं प्रताम्येत् परिकूजति। निरुद्धो मारुतश्चैव कुक्षाबुपरि धावति॥

सेवितान्यन्नपानानि गर्भिण्या यान्यभ ...... । तानि सात्म्यानि बालस्य तस्मात्तान्युपचारयेत् ।।
देशकालाग्निमात्राणां न च कुर्याद्व्यतिक्रमम् ।

गर्भ के समय गर्भिणी जिस अन्नपान का सेवन करती है बालकों को वे ही सात्म्य होते हैं। इसलिये उन्हीं का सेवक कराना चाहिये। इसमें देश, काल तथा अग्निमात्रा का व्यतिक्रम न करे। अर्थात् सात्म्य होते हुए भी देश, काल तथा अग्निमात्रा का ध्यान रखकर ही उनका सेवन करे अन्यथा सात्म्य होने पर भी वे विपरीतार्थकारी सिद्ध होंगे।

वक्तव्य—बालक को वही अन्नपान विशेष रूप से सात्म्य हो सकता है जिसका गर्भावस्था में माता द्वारा सेवन किया हो। माता के आहार रस से ही गर्भ की पुष्टि होती है। गर्भ के प्रत्येक अवयव में उस आहार रस का प्रभाव व्याप्त हो जाता है। इसीलिये माता जिस प्रकार के आहार का सेवन करती है गर्भस्थ बालक की वैसी ही प्रकृति भी बनती है। सात्म्य से अभिप्राय उस वस्तु से है जो निरन्तर उपयोग में आने से अनुकूल हो गई हो। चरक विमानस्थान अ. १ में कहा है—सात्म्यं नाम तत् यदात्मन्युपशेते, सात्म्यार्थोह्युपशयार्थः।

द्रव्याणां लेहनीयानां विधिञ्चैवोपदेक्ष्यते । विघृष्य धौते दृषदि प्राङ्मुखी लघुनाऽम्बुना ।
आमथ्य मधुसर्पिर्भ्यां लेहयेत् कनकं शिशुम् ।।
सुवर्णप्राशनं ह्येतन्मेधाग्निबलवर्धनम् । आयुष्यं मङ्गलं पुण्यं वृष्यं वर्ण्यं ग्रहापहम् ।।
मासात् परममेधावी व्याधिभिर्न च धृष्यते । षड्भिर्मासैः श्रुतधरः सुवर्णप्राशनाद्भवेत् ।।

अब लेहनीय द्रव्यों की विधि बतलाई जायगी। पूर्व दिशा में मुँह करके धोये हुए पत्थर पर थोड़े से पानी के साथ स्वर्ण को घिस कर उसमें मधु और घृत (असमान मात्रा) मिलाकर बालक को चटावे। यह सुवर्णप्राशन कहलाता है जो कि मेधा (बुद्धि), अग्नि और बल को बढ़ाने वाला है। यह आयु को देने वाला, कल्याणकारक, पुण्यकारक, वृष्य, वर्ण्य (शरीर के वर्ण को ठीक करने वाला) तथा ग्रहबाधाओं को दूर करने वाला है। सुवर्णप्राशन से बालक एक मास के अन्दर मेधायुक्त होता है तथा वह व्याधियों द्वारा आक्रान्त नहीं होता है। और वह ६ मास में श्रुतधर (सुनी हुई बात को धारण करने वाला) हो जाता है अर्थात् उसकी स्मरणशक्ति बहुत बढ़ जाती है।

वक्तव्य—बालक के उत्पन्न होते ही जातकर्मसंस्कार में भी सुवर्णप्राशन का विधान मिलता है। सुश्रुतसंहिता के शारीरस्थान में यह विधि निम्न प्रकार से दी है—'अथ कुमारं शीताभिरद्बिराश्वास्य जातकर्मणि कृते मधुसर्पिरनन्तचूर्णमङ्गुल्याऽनामिकया लेहयेत्' बालक को मधु और सर्पिस् (घृत) में मिलाकर अनन्तचूर्ण (सुवर्ण) का लेहन करावे। इसी स्थान पर किसी २ ग्रन्थ में निम्न पाठभेद भी मिलता है—मधुसर्पिरनन्ताब्राह्मीरसेन सुवर्णचूर्णमङ्गुल्याऽनामिकया लेहयेत्'। वाग्भट में यह प्राशन (लेहन) विधि भिन्न प्रकार से कही है—'ऐन्द्री ब्राह्मी शंखपुष्पी वचाकल्कं मधुघृतोपेतं हरेणुमात्रं कुशलाभिमन्त्रितं सौवर्णेनाश्वत्थपत्रेण वा मेधायुर्बलजननं प्राशयेद्वा ब्राह्मी वचानन्ता शतावर्यन्यतमचूर्णम्'। यह सुवर्णप्राशन तथा अन्य लेहन बालक के जन्म के बाद तीन चार दिन तक देने का विधान है क्योंकि तीन चार दिन तक