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काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

पृष्ठ 239, कुल 942 में से

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पृष्ठ 239

उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद
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चरक संहिता में आत्रेय पुनर्वसु द्वारा वार्योविद तथा उसके सहभावी मारीच कश्यप का पूर्व आचार्य के रूप में उल्लेख किया होने से मारीच कश्यप के बाद तथा चरक संहिता के अनुसार काम्पिल्य की राजधानी पाञ्चाल देश में स्थित पुनर्वसु आत्रेय आचार्य प्रतीत होते हैं। काश्यपसंहिता के चतुष्पाद वर्णन में निम्न श्लोक दिया है—

अस्य पादचतुष्कस्य मन्यन्ते श्रेष्ठमातुरम्। तदर्थं गुणवन्तो हि त्रयः पादा इहेप्सिताः ।।
नेति प्रजापतिः प्राह भिषङ्मूलं चिकित्सितम् ।

उपर्युक्त श्लोक के अनुसार काश्यपसंहिता में केवल चतुष्पाद का वर्णन है और वह भी संक्षिप्त रूप में। इसके विपरीत चरकसंहिता में पहले खुड्डाक चतुष्पाद अध्याय में उन चतुष्पादों के चातुर्गुण्य के द्वारा षोडशकलाओं का वर्णन करके अगले महाचतुष्पाद अध्याय में उसकी विस्तृत व्याख्या होने से कश्यप तथा आत्रेय का क्रमशः पौर्वापर्य प्रतीत होता है। तथा कश्यप के समय की अपेक्षा आत्रेय के समय क्रमप्राप्त अधिक विकसित अवस्था दृष्टिगोचर होती है।

इसी प्रकार रोगों का वर्णन करते हुए भी काश्यपसंहिता में संक्षेप से ही रोग दिये हैं तथा उनके संबद्ध विषयों को भी केवल एक २७वें अध्याय में ही दिया गया है जब कि आत्रेय संहिता में इस विषय के चार अध्याय दिये हैं। इनमें से एक महारोगाध्याय में ही काश्यपोक्त सब विषयों को दे दिया गया है तथा इससे पूर्व के कियन्तःशिरसीय आदि तीन अध्यायों में अन्य विषयों के दिये होने से इसमें विकसित अवस्था दृष्टिगोचर होती है। इस प्रकार अनेक उदाहरण मिल सकते हैं।

न केवल कश्यप तथा आत्रेय का पौर्वापर्य ही है अपितु चरक संहिता में गर्भ्रवाक्रान्ति विषयक नाना मतों के वर्णन में 'विप्रतिपत्तिर्वादास्त्वत्र बहुविधाः सूत्रकारिणामृषीणां सन्ति' के द्वारा कुमारशिरा भरद्वाज, काङ्कायन, भद्रकाप्य, भद्रशौनक, वडिश, वैदेह जनक तथा धन्वन्तरि आदि आचार्यों के साथ सूत्रकर्ता ऋषि के रूप में स्वयं मारीच कश्यप का नाम लेकर उसके मत का उल्लेख किया होने से स्पष्ट है कि आत्रेय संहिता के निर्माण के पूर्व ही अन्य ग्रन्थों की तरह मारीच कश्यप का ग्रन्थ भी विद्यमान एवं प्रसिद्ध था।

चरकसंहिता के महाचतुष्पाद अध्याय में मैत्रेय (प्रतिपक्षी) के 'प्रतिकुर्वन् सिध्यति प्रतिकुर्वन्निय्रते, अप्रतिकुर्वन्सिध्यति, अप्रतिकुर्वन्निय्रते तस्माद्भेषजमभेषजेनाविशिष्टम्' इस सिद्धान्त का खण्डन करते हुए 'मिथ्या चिन्त्यत इत्यात्रेयः' द्वारा आत्रेय का सिद्धान्त दिया है। इसी के समान भेडसंहिता के चतुष्पाद अध्याय में भी इसी उपर्युक्त सिद्धान्त का खण्डन करके नामोल्लेख सहित आत्रेय का बिलकुल मिलता जुलता मत दिया होने से तथा चरक संहिता में भरद्वाज से प्राप्त आयुर्वेद विद्या विशद करके पुनर्वसु आत्रेय द्वारा उपदिष्ट उसके अग्निवेश, भेड आदि ६ शिष्यों ने ग्रहण करके पृथक्-पृथक् तन्त्रों का निर्माण किया। इस उल्लेख के मिलने से उसी के अनुसार भेडसंहिता के प्रत्येक अध्याय में 'इत्याह भगवानात्रेयः' द्वारा उपदेशक (आचार्य) रूप में आत्रेय का निर्देश होने से तथा पूर्वाचार्यों के वर्णन में कश्यप के भी नाम का उल्लेख होने से भेड की अपेक्षा आत्रेय के समान कश्यप की भी प्राचीनता निर्विवाद सिद्ध है।

भेडसंहिता में आत्रेय तथा कश्यप का नाम दिया है, काश्यप संहिता में भेड तथा आत्रेय पुनर्वसु का नाम दिया है तथा आत्रेय संहिता में मारीच कश्यप का नाम दिया है। इस प्रकार परस्पर नामोल्लेख होने से तथा चरक संहिता में


१. सिध्यति प्रतिकुर्वाण...वर्णोत्साहसमन्विता। भेड संहितायां पृ. (१५)
यहां भेड द्वारा शौनक नाम से गृहीत प्रतिपक्षी के मत का चरक में मैत्रेय नाम से निर्देश किया गया है। दोनों ग्रन्थों में गृहीत मत के संवाद के मिलने से मुद्रित चरक में समयवश नाम का परिवर्तन हो सकता है। अथवा शौनक कुल का नाम होने से तथा मैत्रेय माता के अनुसार नाम होने से संभवतः दोनों एक ही आचार्य हों।

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