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काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

पृष्ठ 194, कुल 942 में से

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पृष्ठ 194
१८०काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

ऋज्राश्व की आंखें ठीक की, श्रोण के जानुओं को क्रियाशील बनाया-इत्यादि के विशेष विधान का इससे ज्ञान नहीं होता। कहीं-कहीं किन्हीं ओषधियों का वर्णन है परन्तु वहां उनकी उपयोग विधि नहीं दी है। अथर्ववेद में यद्यपि नाना रोग, औषध, रोगों के कारण, कृमि आदि, अमुक ओषधि के सेवन से अमुक रोग का प्रतीकार इत्यादि विषय भी मन्त्रों में मिलते हैं परन्तु उनसे भी उनकी उपयोग की विधि मालूम नहीं होती। इस प्रकार उन मन्त्रों से केवल तात्कालिक आयुर्वेद विज्ञान की स्थिति सूचित होती है।

'यत्रौषधीः समग्मत राजानः समिताविव । विप्रः स उच्यते भिषग्रक्षोहामीव चातनः' ।।
(ऋक् १०. ९७. ६)

शतं ह्यस्य भिषजः सहस्रमुर्वी गभीरा सुमतिस्तेऽस्तु ।। (ऋक्. १. २४. ९)
शतं ह्यस्य भिषजः सहस्रमुत वीरुधः ।। (अथर्व २. ९. ३)

इत्यादि मन्त्रों से प्रतीत होता है कि सैकड़ों ओषधियों के संग्रहकर्ता विप्र भिषक् (वैद्य) होते थे। वैद्य भी न केवल एक दो थे अपितु सैकड़ों की संख्या में थे। ओषधिरूप से ज्ञात लता वनस्पतियां आदि भी स्वल्प नहीं थीं अपितु हजारों की संख्या में थीं। इनसे ज्ञात होता है कि इस विज्ञान के ज्ञाता सैकड़ों महर्षियों द्वारा प्रतिपादित, सम्पूर्णरूप से व्यवहृत, तथा श्रृंखलारूप में विद्यमान सम्पूर्ण ओषधियों से युक्त यह आयुर्वेद एक पृथक् ग्रन्थ के रूप में विद्यमान था। क्योंकि ज्ञातव्य विषयों की सूचना तथा उनके उपयोग से होने वाले लाभों का निर्देश वेदों में स्थान-स्थान पर विकीर्णरूप में (Scattereb) हमें मिलता है। वेद शब्द से समष्टि रूप में विद्यमान आदिम ज्ञान का बोध होता है तथा उसकी समीपता वाले व्यक्ति विशेष का ज्ञान उपवेद शब्द से सूचित होता है। गान्धर्व, धानुष्य, स्थापत्य आदि के ज्ञान की तरह व्यष्टि रूप से विद्यमान आयु की रक्षा का ज्ञान आयुर्वेद शब्द से ध्वनित होता है। यह प्राचीन आयुर्वेद ब्रह्मा, अश्वि तथा इन्द्र की संहिता रूप से पृथक् रूप में ही विद्यमान होगा। इसी कारण कुछ आचार्यों ने इसे जो उपवेद रूप से लिखा है तथा कश्यपाचार्य ने इसका पांचवें वेद के रूप में निर्देश किया है वह ठीक ही है। परन्तु कालव्यतिक्रम से वह प्राचीन तथा मूलभूत आयुर्वेद आजकल पृथक् रूप से नहीं मिलता है। केवल वैदिक संहिताओं में कहीं-कहीं विकीर्णरूप से अथवा सम्प्रदाय परम्परा द्वारा किसी-किसी ऋषि की लेखबद्ध रचना द्वारा ही मिलता है।

उपलब्ध प्राचीन आयुर्वेदिक ग्रन्थों तथा वैदिक संहिता ग्रन्थों में आये हुए आयुर्वेद के विषयों का विचार करने पर रोगों के नाम, ओषधियों के नाम, उनके उपयोग तथा निरूपण शैली आदि में बहुत ही भेद दिखाई देता है। वैदिक विषयों की अपेक्षा आर्षसंहिता ग्रन्थों के विषयों में क्रमागत विकसितावस्था भी विशेषरूप से दिखाई देती है। भाषाशास्त्र की दृष्टि से भी इस प्रकार का अन्तर थोड़े समय के व्यवधान से संभव नहीं है। लेख तथा भाषा की शैली में जितना अन्तर प्राचीन सूत्र आदि ग्रन्थों, दो हजार वर्ष पूर्व के कवियों की रचनाओं, बौद्ध-साहित्य तथा काश्यप, आत्रेय, धन्वन्तरि आदि महर्षियों के लेखों का आधुनिक लेखों से है उससे भी अधिक अन्तर वैदिक संहिताओं तथा आर्षसंहिताओं में आये हुए आयुर्वेद के विषय में है। यह अन्तर (भेद) बहुत लम्बे समय के व्यवधान के विना संभव नहीं है। प्रत्येक साहित्य में विज्ञान का विकास क्रमिक ही हुआ करता है। आयुर्वेद विज्ञान के विषय में भी वैदिक साहित्य की अपेक्षा आर्षसंहिता के साहित्य का विकास बहुत लम्बा कालक्रमागत पूर्व परम्परा की अपेक्षा रखता है। वैदिक साहित्य के बाद ब्राह्मण, उपनिषद्, कल्प, सूत्र रूपी धाराओं में विरलरूप से बहता हुआ आयुर्वेद विज्ञान का प्रवाह अपनी-अपनी आचार्य परम्परा के बिना प्राचीन आर्ष संहिता ग्रन्थों में उस ज्ञानोदधि को किस प्रकार प्रकट कर सकता है। इसलिये स्थान-स्थान पर पूर्वाचार्यों द्वारा निर्दिष्ट, नाममात्र शेष तथा जिनके नाम भी लुप्त हो चुके हैं ऐसे प्राचीन आचार्यों की उपदेशरूपी विज्ञान परम्परा ही आयुर्वेद विज्ञानप्रवाह में वैदिक साहित्य एवं आर्षसंहिता की मिलाने वाले सेतु (Connecting link) के रूप में कार्य कर रही