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सर्वकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

Devanagarihipublished264 पृष्ठ

पृष्ठ 66, कुल 264 में से

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अब मधुमय बना दिया। नहीं तो पहले मन की ही हुकूमत थी। कई जन्मों की तपस्या से भी नहीं बदल सकते थे, इतने शुद्ध नहीं हो सकते थे। तभी तो साहिब कह रहे हैं-

यह सब साहिब तुम्हीं कीना । बरना मैं था परम मलीना ॥

यह सब कैसे हुआ? नाम के बाद आपके पास दूसरी ताकतें आ गयीं, जिन्होंने काम, क्रोध आदि गंदी ताक़तों से युद्ध किया ।

पहले इनकी पूरी फौज को समझते हैं ।

प्रथम काम धनुष कर लीन्हें । पाँच बान सो तासंग चीन्हें ॥

मोहन वशीकरण उचाटा। बान लगत घर भूले बाटा ॥

दुष्ट काम उर प्रकटे आयी । ज्ञान विचार बिसरि सब जायी ॥

ऋतु बसंत त्रिय सैन सिंगारा । कहि न काम की सेन अपारा ॥

सोलह श्रृंगार देखी मन मानी । निरखत अंग अंग की वाणी ॥

ऐसी निरखि काल की सेना । सुर नर मुनि उर धरत न चैना ॥

काम के पाँच बाण हैं- मारण, मरण, मोहन, वशीकरण और उच्चाटन। इन पाँच बाणों से काम ने सबकी मति मार दी है। क्या देवता, क्या मनुष्य, क्या ऋषि-मुनि, सबका चैन काम ने छीन लिया है। इसके बाणों से आहत होकर सभी बेहाल घूम रहे हैं । यह काम अति प्रचण्ड है, होय उत्पन्न तिय अंग । सैन चैन अतिही बढ़े, चढ़े काम रति

रंग ॥

तन मन अस्थिर न रहे, काम बान उर साल ।

एक बाण से सब किये, सुर नर मुनि विहाल ॥

यह काम बड़ा प्रबल है, जो तपस्वियों का तप नहीं रहने देता है । यह काम स्त्री के संग से उत्पन्न होता है । देवता लोगों को भी यह अपने वश में रखता है। शास्त्रों में प्रमाण मिलते हैं—

चलै काम यह सबै पलाने । महारुद्र की करत न काने ॥

महारुद्र पहँ पहुँचे जानी । मारयो पुहुप बान शर तानी ॥

देखि कामिनी मोहे देवा । पुहुप बान को कुछ लह्यो न भेवा ॥

छांडि ध्यान धाये त्रिपुरारी । समुझे जबहिं परे जुहारी ॥

बड़े-बड़ों की ख़बर ली है इसने । महारुद्र को भी नहीं छोड़ा। मोहिनी