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सर्वकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

Devanagarihipublished264 पृष्ठ

पृष्ठ 60, कुल 264 में से

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टी.बी. पर देखें तो कोई महात्मा बाल बना रहा है, कोई दाढ़ी, कोई टिक्का लगाए है। सबने भेष से पहचान बनाई हुई है । मेरी पहचान भेष नहीं है। मेरे कुर्ते से आप मुझे पहचान लेते हैं । यदि मैं पैंट-कमीज पहनकर निकल पहूँ तो पूरा शहर घूमकर आ जाऊँगा पर कोई पहचान नहीं पाएगा। ट्रेन में एक लड़की मिली । मैं ब्रश कर रहा था। रात को वो मिली। सुबह जब मैं ब्रश कर रहा था तो अपनी नज़र झुकाकर मुझे देखने लगी। बाद में कहने लगी कि आप साहिब हैं न? मैं मुस्कराया तो वो जान गयी। वो कहने लगी कि मैं अपने पति से रात को ही कह रही थी कि ये साहिब लग रहे हैं, पर वो मान नहीं रहे थे। मैं आपको पहचानने में लगी हुई थी। आपकी चाल देखकर मुझे लग रहा था कि आप साहिब ही हैं । उसने नाम भी लिया था। देखा न, वो मुझे पहचान नहीं पा रही थी । इतनी देर से ट्रेन में बैठी थी। ....तो इस तरह काम का भी परिवार है। काम की स्त्री है— रति । यह रति क्या है ? संभोग क्रिया ही रति है । काम की यही पत्नी है । दोनों मिलकर वार करते हैं। ये दुश्मन ऐसे हैं कि दिखाई भी नहीं देते, वार पूरा करते हैं । फिर लालच इसका पुत्र है । जहाँ ये सब नहीं, वहाँ संभोग नहीं। फिर लोलुपता यानी उसी में रहना। तू-ही-तू बस । यह लोलुपता है। यह भी काम की बहू है । किसी से कोई लड़ाई करे तो उसके घर के सारे सदस्य भिड़ जायेंगे, एक हो जायेंगे। इस तरह ये सब भिड़ते हैं । एक महापुरुष ख़ालिस होता है, सबकी ख़बर लेने वाला होता है ।

प्रबल अविद्या का परिवारा ॥

गोस्वामी जी रामायण में बोल रहे हैं-

इन सब मिल जीवहि घेरा ॥

ये दिख नहीं रहे हैं । इन्होंने आत्मा को घेरा है । आत्मा यहाँ बँधी है । वो पीड़ित है। ये समझ नहीं आ रहे हैं। बड़े बारीक दुश्मन से पाला पड़ा है। फिर क्रोध है। उसकी पत्नी है— हिंसा । क्रोध आता है तो मारने की भावना आती है। हिंसा आती है तो मारकूटकर मज़ा आता है। तब ही तसल्ली मिलती है । यह सबकी कहानी है। यह कहती है कि मारने से ही शांति मिली । तसल्ली के लिए मारता है। यह कैसी तसल्ली है कि गाली देकर मारकर तसल्ली ले रहे हैं ! शरीर का इल्म ही नहीं है इंसान को । पूरे सिस्टमों को नहीं समझ पा रहा है।