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सर्वकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

Devanagarihipublished264 पृष्ठ

पृष्ठ 43, कुल 264 में से

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पृष्ठ 43

निरंजन ने कहा "मैंने तीन-लोक की रचना तो की है, लेकिन जीव ही नहीं हैं तो राज्य किस पर करूँ ! इसलिए कृपा करके थोड़े से जीव मुझे भी दे दें, ताकि मैं उन पर राज्य कर सकूँ ।' परम-पुरुष ने तब इच्छा करके ऐसी कन्या (आद्य-शक्ति) की उत्पत्ति की, जिसकी आठ भुजाएँ थीं । आद्य शक्ति ने परम - पुरुष को प्रणाम करते हुए पुछा कि उसे क्यों बनाया गया है ? परम-पुरुष ने अनन्त आत्माएं देते हुए कहा कि पुत्री ! मानसरोवर में निरंजन है, जिसने शून्य में तीन-लोक की रचना की है। तुम ये आत्माएं लेकर उसके पास जाओ और दोनों मिलकर शून्य में सत्य-सृष्टि करो (आत्माओं को योनियों में न लाकर अर्थात शरीरों में न डालकर सत्य-सृष्टि करने की आज्ञा दी, जैसी कि अमर - लोक की सृष्टि थी)। रुद्र मांस वाली सृष्टि करने की आज्ञा नहीं दी थी। यहीं पर जीवात्माएँ अपने साहिब से बिछुड़ गयीं। निरंजन ने फिर आद्य-शक्ति को भी बलपूर्वक अपने साथ रख लिया और सत्य - पुरुष की आज्ञा का उलंघन करते हुए उसने सत्य-सृष्टि के बजाय शरीर - सृष्टि की और जीवों को अनेकानेक कष्ट देना प्रारम्भ कर दिया । जीवों का सारा आनन्द लुट गया। साहिब कह रहे हैं- बासुरि सुख ना रैणि सुख, नाँ सुपिनै माहिं ।

कबीर बिछुड़ा साहिब सूं, ना सुख धूप न छाहिं ॥

तथा

चकवी बिछुड़ी रैणि की, आई मिली परभाति ।

जे जन बिछुड़े साहिब सूं, ते दिन मिले न राति ॥

साहिब कह रहे हैं कि चकवी (एक पक्षी, जो रात को अपने प्रियतम से बिछुड़ जाती है ) चाहे रात्रि में अपने प्रियतम से बिछुड़ जाती है, पर प्रात: होते ही पुन: मिल जाती है अर्थात उसका कष्ट थोड़ी देर का होता है, पर जीवात्माएँ अपने साहिब से बिछुड़ कर पुनः मिल नहीं पा रही हैं, उन्हें निरन्तर कष्ट सहने पड़ रहे हैं। अनेक कुकर्म करने के कारण सत्य - पुरुष ने निरंजन को मानसरोवर से निकाल दिया था और एक लाख जीव नित्यप्रति ग्रसित करने का शाप दे