सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

Devanagarihipublished264 पृष्ठ

पृष्ठ 221, कुल 264 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 221

शरणागत कह सब गुण आवै । ज्ञान भक्ति तेहि माहिं समावै ।।

शरण हो जब यह निश्चय आई । प्रभु मोहि दोनो सकल सहाई ।।

सकल पाप ताको जरि जावै । जो सतगुरु की शरण में आवै ।।

सद्गुरुकी, प्रभु की शरण में होता है, उसके सब काम वे स्वयं ही कर लेते हैं । यही बात किसी सत्संग में एक महात्मा जी कह रहे थे । एक बंदा वहाँ पर बैठा हुआ था। उसने कहा- अगर हम खाना नहीं खाएँ तो क्या प्रभु खिलाएगा? महात्मा ने कहा- हाँ खिलाएगा। उस बंदे ने उस दिन से खाना खाना ही छोड़ दिया, सोचा, देखता हूँ, वो प्रभु कैसे खिलाता है। एक पूरे दिन खाना नहीं खाया। उसकी बीवी कहने लगी- खाना खाओ। पहले दिन प्रभु बीवी में बैठकर प्यार से खिलाने लगा। पर उस बंदे ने भी जिद्द पकड़ी थी, कहा—मैं नहीं खाता । अब दूसरे दिन भूख बड़ी, घर में खाने की महक भी आ रही थी तो मन भी करने लगा। उसने सोचा, इधर तो मन कर रहा है, पर मुझे देखना है कि वो प्रभु खिलाता कैसे है.... .. जाकर जंगल में बैठ गया । पास के गाँव में किसी की शादी थी। बहुत सारे पकवान बने थे। एक आदमी को जंगल में सुबह से बैठे हुए देख उन्होंने सोचा, इसे भी खिला देते हैं । यह सोच, दो आदमी खाना लेकर उसके पास गये, कहा- यह लो, खाओ। यह था प्रभु । पर वह बंदा भी बड़ा जिद्दी था, कहा- नहीं, मैं नहीं खाता, मुझे भूख नहीं है । वे कहने लगे, भाई, तू सुबह से भूखा बैठा है, खा । लेकिन जब वह बंदा नहीं माना तो यह सोचकर कि जब भूख लगेगी तो खा लेगा, वे खाना वहीं पेड़ के नीचे रखकर चले गये । अब महक भी आ रही थी खाने की । उसने सोचा कि यहाँ तो खाना पड़ जायेगा, इसलिए वो उठकर दूसरे पेड़ के नीचे चला गया। कुदरती दो चोर रात के 12 बजे चोरी करके आ रहे थे; वहीं बैठकर अपना हिस्सा बाँटने लगे। इतने में खाने की महक आई । वे भूखे भी थे, पर जैसे ही खाने लगे, एक में प्रभु बैठा, उसने दूसरे से कहा कि मत खाओ, इसमें ज़हर भी हो सकता है, हो सकता है कि किसी ने रखा हो । दूसरे ने भी कहा- - हाँ, हो सकता है, ढूँढ़ो, यहाँ कोई है तो नहीं। वो बंदा वहाँ पेड़ के नीचे बैठा दिखा। उन्होंने सोचा कि यह यहाँ क्यों बैठा हुआ है। वो उसे पकड़कर ले आए, कहने लगे कि बड़े चालाक निकले, हमें ज़हर खिलाकर सारा माल हड़प लेना चाहते थे । उसने कहा कि नहीं, मुझे कुछ नहीं पता। मैंने कोई ज़हर नहीं रखा।

करूँ जगत से न्यार · पृष्ठ 221, कुल 264 में से · SarvaKosh