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कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा द्वारा

DevanagariHindipublished115 पृष्ठ

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४२ कर्मयोग

खिलाने के बाद योगी के पास आकर पूछा, “अब आप बतलाइए कि मैं आपकी क्या सेवा करूँ?” तब योगी ने ईश्वर और जीव के विषय में कुछ प्रश्न किये। वधिक ने उसके उत्तर में उसको एक अत्यन्त मनोहर और सार-गर्भित उपदेश सुनाया जो आज तक “व्याधगीता” के नाम से प्रसिद्ध है और जिसको आत्मजिज्ञासु बड़े चाव से पढ़ते और सुनते हैं। वेदान्त की उच्च से उच्च शिक्षा उसमें दी गई है। तुमने 'भगवद्गीता' पढ़ी है, 'व्याधगीता' भी पढ़ो और देखो, वेदान्तदर्शन के कैसे गूढ़ रहस्य उसमें भरे हुए हैं। जब व्याध उपदेश सुना चुका तब योगी को बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने पूछा, जब तुम ऐसे ज्ञानी हो तो इस शरीर में क्यों रहते हो और क्यों ऐसा निन्दनीय काम करते हो? व्याध ने उत्तर दिया—पुत्र! कोई काम बुरा नहीं है, न कोई धर्म दूषित है। लड़कपन से मैंने यह काम सीखा, मुझको इसका बन्धन नहीं है। मैं सच्चाई के साथ प्रमादरहित होकर अपने कर्त्तव्य का पालन करता हूँ। गृहस्थ होकर गृहस्थ-धर्म का पालन करता हूँ। माता-पिता को प्रसन्न रखता हूँ। न तो मैं योग जानता हूँ और न संन्यास; न कभी जङ्गल में गया और न देशाटन किया। तो भी तुमने सुन लिया कि मेरे विचार कैसे हैं! और देख लिया कि मुझको किसी प्रकार का बन्धन नहीं है। मैं अपनी योग्यता और अवस्था के अनुसार अपने धर्म का पालन करता हूँ।

भारतवर्ष में एक बहुत बड़ा योगी है। मैंने एक बार उसका दर्शन किया। वह विचित्र पुरुष है। न वह किसी को पढ़ाता-लिखाता है, न किसी के प्रश्न का उत्तर देता है। वह उपदेशक या