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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 529, कुल 549 में से

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पृष्ठ 529

किष्किन्धाकाण्ड ५२१

पत्थरों के बने ऊँचे प्राचीर के सुन्दर द्वार को पार करने के पूर्व ही वह (सीता) कह उठी—सीमाहीन घोर अरण्य कहाँ है ?—यह भी उससे कहना।

(रामचन्द्र ने हनुमान् से) इस प्रकार के वचन कहे। फिर, यह कहकर कि सुख से जाओ, उत्तम रत्न से जड़ी मुँदरी भी दी और कहा—'हे बुद्धिमान् ! तुम्हारे सब कार्य सफल हों'—ऐसा आशीष देकर रामचन्द्र ने हनुमान् को विदा किया। हनुमान् वीर-वलय-धारी (रामचन्द्र) की कृपा को आगे करके चल पड़ा।

अंगद प्रभृति वीर वानर, जिनका क्रोध शत्रुओं को विनष्ट कर सकता था, सूर्यपुत्र के प्रति नतशिर होकर फिर उत्तम धनुर्धारी (राम-लक्ष्मण) को भी नमस्कार करके, विशाल समुद्र-सम सेना के साथ दक्षिण दिशा की ओर चले। (१-७४)

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अध्याय १३

बिल-निष्क्रमण पटल

अंगद प्रभृति वे वीर, दक्षिण दिशा की ओर चले। उनके चले जाने के पश्चात् सूर्यपुत्र दक्षिण के अतिरिक्त सब दिशाओं में अन्य वानरों को भेज दिया। वे वानर आदेश दिये हुए कार्य (सीतान्वेषण) को संपन्न करने के लिए सारे संसार को भी जीतनेवाली विशाल सेना को लेकर, एक मास की अवधि के भीतर लौट आने का निश्चय करके, प्रवल गति से चल पड़े।

पर्वत-सदृश कंधोवाले वानर, विद्युल्लता-समान कटिवाली (सीता) का अन्वेषण करते हुए किस प्रकार पूर्व, पश्चिम और उत्तर दिशाओ में गये—यह न कहकर, हम समृद्ध तमिल (भाषा और साहित्य) से संपन्न दक्षिण दिशा मे गये हुए वानरो के कार्यों का वर्णन करेंगे।

वे वीर, सिंदूर और पुंजीभूत माणिक्य की कांति फैलने से संध्याकालिक गगन की समता करनेवाले तथा सर्पों से, चंद्र से एव नदियो से संयुक्त रहने के कारण शिवजी की जटा की समता करनेवाले विंध्य-पर्वत के सानुओ पर शीघ्र जा पहुँचे।

उन दोष-रहित वीरों ने, उस दीर्घ पर्वत के मध्य उज्ज्वल रत्नो से पूर्ण शिखरो पर, मनोहर घाटियो में स्थित कदराओ मे, पर्वत के सानुओ तथा दीर्घ एवं सुन्दर प्रान्त-प्रदेशो (तलहटियों) में इस प्रकार ढूंढ़ा कि अनेक दिनो तक अन्वेषण करने का कार्य एक ही दिन में समाप्त कर लिया।

(धरती की) सीमाओ पर स्थित समुद्र ही जिनके उपमान हैं, ऐसी वह वानर-सेना उस सीता के, जो समृद्ध भूमि को निष्पाप करने के लिए अवतीर्ण हुई थी और जो सोने की पट्टी से अलंकृत अंधकार-सदृश केशोंवाली थी—रहने के स्थान को खोजते हुए उस भू-प्रदेश