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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 477, कुल 549 में से

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पृष्ठ 477

किष्किन्धाकाण्डं ४६२

कुमार्ग पर चलाये और बलहीनों पर क्रोध करे, तो वह वीरधर्म से च्युत हो जाता है। ऐसे ही यदि कोई पर-पुरुष की सुरक्षित शीलवाली स्त्री के चारित्र्य को मिटाता है, तो वह भी धर्म से च्युत होता है।

धर्म क्या है?—तुमने यह नहीं सोचा। इहलोक तथा परलोक के फलों (यश और पुण्य) का विचार भी नहीं किया। यदि तुमने यह सोचा होता, तो क्या अधर्मता के साथ अपने छोटे भाई की प्राण-समान पत्नी की संगति प्राप्त करते ?

इन कारणों से, तथा उस सुग्रीव के मेरे प्राणसम मित्र होने से, मैंने तुम्हारे प्राण हरण किये। इतना ही नहीं, पराया होने पर भी, बलहीनों के दुःख को दूर करना ही मेरा ध्येय है।

तुम्हारा यही अपराध है। जब अतिसुन्दर महावीर राम ने इस प्रकार कहा, तब अनुचित कार्य करनेवाला वाली फिर कहने लगा—तुम्हारा यह कथन मेरे लिए लागू नहीं होता। क्योंकि, हम वानरों के लिए अपनी इच्छा के अनुकूल कार्य करना कुछ अधर्म नहीं होता।

वाली ने कहा—हे प्रभु ! पातिव्रत्य धर्म तथा उसके अनुकूल अन्य सद्गुणों से युक्त कर्म, तुम्हारे असत्य-रहित कुल की स्त्रियों के लिए, कमलभव (ब्रह्मा) ने जिस प्रकार विवाह का विधान किया है, उसी प्रकार हमारे कुल की स्त्रियों के लिए नहीं किया। किंतु, हमारे यहाँ जब जैसा संयोग मिले, तब वैसा ही संबंध करने का विधान है।

हे शत्रुओं की मज्जा तथा घृत से लिप्त चक्रायुध धारण करनेवाले ! हमारा मन जैसा चाहता है, वैसा ही हमारा आचरण भी होता है। इसके अतिरिक्त, हम वानरों के लिए वेद-प्रतिपादित विवाह का कोई विधान नहीं है। कुल-परंपरागत गुण भी हममें नहीं होते।

मुझे जीतनेवाले हे विजयशील ! यही हमारे कुल की नीति है। अतः, मैंने अपने कुल-धर्म के अनुसार कोई पाप नहीं किया है। यह तुम समझ लो। वाली के यह कहने पर रामचन्द्र ने उत्तर दिया—

तुम उत्तम गुणवाले देवों के पुत्र बनकर उत्पन्न हुए हो और शाश्वत धर्म-मार्ग के ज्ञाता हो। तुम मृग नहीं हो। अतः, विजय-मालाओं से भूषित रहनेवाले तुम-जैसे वीर के लिए ऐसा कार्य अनुचित ही है।

क्या धर्म, पंचेंद्रियों के वशीभूत शरीर से ही संबंध रखता है ? क्या वह विषयों का विवेचन करनेवाले विवेक से संबंध नहीं रखता है ? तुमने तो (शरीर से वानर होने पर भी विवेक से) धर्म के महत्त्व को भली भाँति जाना है। अतः, क्या पापकर्म करना तुम्हारे लिए उचित है ?

वह गजेंद्र भी जन्म से मृग-जाति का ही तो था, जिसने एक मगर से ग्रस्त होकर शंखधारी विजयशील भगवान् (विष्णु) को पुकारा था और अपने अनुपम विवेक के कारण मोक्ष-पद प्राप्त किया था।

मेरे पितृ-तुल्य वह जटायु भी तो एक गृद्ध ही था, जिसने धर्म-मार्ग में अपने मन