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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 464, कुल 549 में से

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पृष्ठ 464

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कंब रामायण

सब से प्रशंसनीय महिमा से युक्त मेरे पिता का सत्य-व्रत यदि टूट जाय, तो उससे बड़ा अपवाद होगा—यह विचार करके मैने राज्य-मुकुट धारण नही किया । अब यहाँ इक्षुरस-सदृश बोलीवाली (पत्नी) के शत्रु से अपहृत होने का सबसे बड़ा अपवाद मुझे प्राप्त हुआ है । अपवाद-मुक्त मै कब हुआ ?

राम, इस प्रकार के वचन कहकर वर्णनातीत दुःख से मूर्च्छित हो गये । उनकी वेदना को देखकर सहस्रकिरण के पुत्र ने उन्हें सांत्वना दी और उन्हें दुःख-सागर के तट पर लाकर खड़ा किया ।

(तब राम ने सुग्रीव से कहा—) हे मित्र ! तुम्हारे वचनों से मेरा दुःख शांत हुआ । नहीं तो क्या मैं जीवित रह सकता था ? मेरे लिए मृत्यु से बढ़कर, हितू अन्य कोई नहीं है । अपवाद-मुक्ति के लिए वही कर्तव्य है (अर्थात्, मर जाना ही भला) । फिर भी, जबतक मैं तुम्हारे दुःख को दूर न करूँ, तबतक मैं मृत्यु को नहीं अपनाऊँगा ।

राघव ने इस प्रकार कहा। इसी समय अतिबली मारुति ने (राम को) नमस्कार किया और कहा—हे उन्नत पर्वत-सदृश कंधोवाले ! मुझे कुछ निवेदन करना है। आप ध्यान से सुनने की कृपा करें ।

हे अपने आज्ञाचक्र को सर्वत्र चलानेवाले ! क्रूरकर्मी वाली का वध होना चाहिए । सूर्यपुत्र को राजा बनाना चाहिए और फिर बड़ी सेना का संगठन करना चाहिए । तभी भयंकर आयुधधारी राक्षसों के निवास-स्थान को ढूँढ़कर हम वहाँ जा सकते हैं । अन्यथा; यह कार्य असंभव है ।

हे भ्रमरों से संकुल पुष्पमालाधारी ! राक्षसों का निवास धरती पर है ? कही पर्वतों में है ? अंतरिक्ष में है ? इनसे पृथक् नागलोक में है ?—अल्पशक्तिवाले नर-जन्म ¹ में उत्पन्न होने के कारण हम यह निश्चित रूप से नहीं जान सकते कि उनका निवास कहाँ है ।

वे राक्षस पलमात्र में किसी भी लोक मे जा सकते हैं। वहाँ अपने अभिलषित किसी भी पदार्थ को ग्रहण कर सकते हैं। किसी विपदा के समान ही वे अकस्मात् आ गिरते हैं और फिर लौट जाते हैं। अतः, उनके निवास को पहचानना आसान नहीं है ।

एक ही समय में सर्वत्र जाकर सीता का अन्वेषण करना है। यदि एक-एक करके सब दिशाओ में ढूँढ़ने लगेंगे, तो उसमे बड़ी कठिनाई होगी। धरती अनंत रूप में फैली है और अन्वेषण में असंख्य वर्ष लग जायेंगे।

सत्तर 'शारा' संख्यावाली वानर-सेना युगांत मे उमड़नेवाले सागर के समान सर्वत्र फैल जायगी। समुद्र को पी डालना हो, ब्रह्मांड को उठाना हो, आज्ञा पाने पर वह सेना सब कुछ कर सकेगी।

अतः, हे नीतिज्ञ ! यही उचित होगा—(कि पहले वाली-वध हो, फिर सीता का अन्वेषण हो)—यों हनुमान् ने कहा। तब उस सद्गुणागार प्रसिद्ध धनुर्धारी ने कहा—चलो, वाली के निवास-स्थान पर जायेंगे। फिर, वे सब चल पडे।


१. वानर भी नर के जैसे होते हैं, अतः नर-जन्म शब्द से वानर-जन्म को भी लिया गया है।—अनु०