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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 444, कुल 549 में से

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पृष्ठ 444

४३६ | कंब रामायण

समुद्र से उदित हुआ। रात्रि भी जो अंतहीन-सी लगती थी, अब उसी प्रकार मिट गई, जिस प्रकार स्वच्छ आत्मज्ञान के प्राप्त होने पर धूम एव कीचड के पुज-जैसे पाप मिट जाते हैं। कमल-पुष्पो का मुख विकसित हुआ।

गन्ने पेरने के कोल्हू से बहनेवाले रस-प्रवाह की ध्वनि से युक्त (कोशल) देशवासी, वे दोनों (राम-लक्ष्मण) क्षीरसागर से उत्पन्न अमृत के समान मधुरवाणी तथा हरिण-समान नयनों से युक्त देवी का अन्वेषण करते हुए, समुद्र-जैसे वनो से घिरे पर्वतों, तथा वहाँ के अरण्यो के दीर्घ मार्गों को पार करके, त्वरित गति से आगे चले। (१-४२)


अध्याय २

हनुमान् पटल

उस प्रकार चलकर राम-लक्ष्मण, उस बडे ऋष्यमूक पर्वत पर, जिसपर दीर्घकाल तक शबरी निवास करती थी, सुगमता से शीघ्र चढ़ गये। तब उस पर्वत पर स्थित महिमामय वानराधिप (सुग्रीव) ने उन्हें देखकर सोचा कि वे कोई शत्रु हैं और भयभीत और कर्त्तव्य-विमूढ होकर अपने प्राण लेकर भागा और एक कंदरा में जा छिपा।

उस सुग्रीव ने (हनुमान् से) कहा कि 'हे वायु के वीर पुत्र! दृढ धनुष धारण करनेवाले महान् पर्वत-सदृश वे दोनों हमारे वैरी वाली की आज्ञा से ही आये हैं। तुम जाकर देखो। सत्य को पहचानो।'—यह कहकर वह बिना कुछ जाने-बूझे ही अति व्याकुल हो, कंदरा के भीतर जा छिपा।

तार, नील, तेजस्वी हनुमान् आदि वीरों के साथ, सूर्यपुत्र (सुग्रीव) मेरु पर्वत समान उस ऊँचे पर्वत के एक ओर जा छिपा। इधर हार-भूषित वक्षवाले वे दोनो (राम-लक्ष्मण) यह सोचकर उस पर्वत पर चढे कि वहाँ सीता का अन्वेषण करने का कोई उपाय विदित होगा।¹

वे सीता का अन्वेषण करने में तत्पर हुए। इतने में कुछ वानरों ने उस पर्वत-कंदरा मे जाकर सुग्रीव से कहा - वे दोनो वाली की आज्ञा से आये हुए नहीं हो सकते, क्योकि वे बहुत दुःखी हैं, व्याकुलमन और शिथिलप्राण हैं। तब हनुमान् ने अपने (दिव्य) ज्ञान से विचार किया।


¹१. अरण्यकाण्ड में कबंध-वध के प्रसग में यह उल्लिखित है कि कबंध मरकर गंधर्व का रूप लेता है और राम से यह कहता है कि आप दक्षिण दिशा में जायें और ऋष्यमूक पर्वत पर सूर्यपुत्र के साथ मैत्री करें। उनसे सीता के अन्वेषण में आपको सहायता मिलेगी। रामचन्द्र उसी बात का स्मरण करके इस पर्वत पर चढ़ते है।—अनु०