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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 387, कुल 549 में से

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पृष्ठ 387
श्रीरणयकांड३७९

शासक हुए, उनमें अधर्मी राजाओ ने कभी सुख नही पाया। इस ससार मे कौन चिरकाल तक जीवित रहनेवाला है। सब मिट जानेवाले ही तो हैं?

उस वीर (राम) से जिसने अपने वाण से मेरे भाई (सुबाहु) को और मेरी माता (ताड़का) को मार डाला और जिसके निकट खड़े रहनेवाले उनके भाई से मेरा सारा पराक्रम मिट गया, उनके स्मरण से ही मेरा व्याकुल मन काँप उठता है। राम के ऐसे पराक्रम से मै बहुत चिन्तित हूँ।

हम इस सत्य को प्रत्यक्ष देखते हैं कि सब स्थावर तथा जगम पदार्थ अस्थिर हैं, नष्ट होनेवाले हैं, अतः हे तात! कोई नीच कार्य करने का विचार न करो। मेरी बात सुनो, अपनी महान् समृद्धि के साथ तुम चिरकाल तक जियो। इस प्रकार, मारीच ने (रावण से) कहा।

यह सुनकर रावण अपनी भयंकर आँखो मे आग उगलने लगा। उसकी भौंहि तन गई; बहुत क्रुद्ध होकर उसने कहा—तुम कहते हो कि मेरी ये पराक्रमी सुन्दर भुजाएँ, जिन्होने गंगा को अपनी जटा में धारण करनेवाले (शिव) को उनके कैलास के सहित, एक हथेली पर उठाया था, अब एक मनुष्य से पराजित होनेवाली हैं।

अभी जो घटना हुई, उसके वारे में तुमने नही सोचा, पर निःसंकोच होकर मेरी निंदा की। जिन्होने मेरी वहन के मुँह में एक गढ़ा-सा खोद डाला हो, उन (मनुष्यो) की तुमने प्रशसा की, यह तुम्हारा एक अपराध है। फिर भी, मैने इसके लिए क्षमा कर दिया।

तब मारीच, यह सोचकर भी कि उसके ऊपर क्रोध करनेवाला वह निर्भीक (रावण) उनके वचनों को सुनकर पुनः क्रुद्ध होगा - चुप नही रहा। किन्तु, फिर कहा—तुम्हारा यह क्रोध मुझ पर नही है, किंतु यह स्वय तुम पर ही है और तुम्हारे कुल पर है।

यदि तुम यह सोचते हो कि तुमने कैलास पर्वत को उठाया था, तो यह भी तो सोचो कि जब जनक ने (राम से कहा कि यह धनुष शिवजी के द्वारा झुकाया हुआ पर्वत ही है, तुम इसे चढ़ाओ, तो राम ने एक क्षण में अनायास ही उस (धनुष) को हाथ मे उठा लिया और उस पर डोरी चढ़ाने के निमित्त उसे झुकाकर तोड़ दिया। वह पर्वताकार शिव-धनुष गगन को छूनेवाला मेरु-पर्वत ही तो था।

तुम (राम के प्रभाव के बारे मे) कुछ नही जानते हो। मेरे वचन को भी स्वीकार नही करते हो। वह (राम), युद्ध के लिए सन्नद्ध होकर पुष्पमाला धारण करे, इसके पूर्व ही, उसके शत्रुओ के प्राण लुट जाते हैं। तुमने मूढ़ता से यह समझ रखा है कि वह (सीता) एक मानव-स्त्री मात्र है। क्या वह, सीता का अपना रूप है? वह तो राक्षसो के पाप के परिणाम की ही प्रतिमूर्ति है।

मेरे मन मे, यह सोचकर कि (यदि तुम सीता का हरण करोगे, तो) तुम अपने बंधुओ-सहित मिट जाओगे, नही बच सकोगे, ऐसी धड़कन उत्पन्न हो रही है, जैसे नगाडा बज रहा हो। इसका तुम विचार नही करते। अज्ञान में पड़कर जो विष पीने जा रहा हो, उससे उसके समीप रहनेवाले ज्ञानी व्यक्ति, क्या यह कहेंगे कि यह कार्य ठीक है?

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