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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 378, कुल 549 में से

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पृष्ठ 378

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कंब रामायण

अत्यन्त शिथिल हो गया। तब उसने अपने परिजनों को आज्ञा दी कि तुमलोग जाकर शीघ्र चंद्रमा को ले आओ, क्योंकि लोग कहते हैं कि वह शीतल होता है।

परिजनों ने जाकर उस पूर्णचंद्र से, जो दारुण क्रोधवाले राक्षस (रावण) के द्वारा शासित उस विशाल लंकापुरी के ऊपर जाने से भी डरता था, कहा कि—डरो नहीं, शीघ्र आओ। राजा तुझे बुला रहा है। इसपर चंद्र अपने मन की अधीरता को छोड़कर आकर प्रकट हुआ।

युद्ध में परास्त होकर बैर को छिपाकर दबे रहनेवाले लोग, अपने शत्रु के कमजोर पड़ने पर जिस प्रकार उस (शत्रु) को सताने के लिए आगे बढ़ जाते हैं, उसी प्रकार मंडलाकार चंद्र रावण के प्राणों के लिए यम-जैसा बनकर, सूक्ष्म सिकता से युक्त जल-भरे समुद्र से उदित हुआ।

चंद्रमा, अपनी अवर्णनीय किरणों को सब दिशाओं में फैलाकर ऊपर उठा और स्वर्ग तथा धरती के निवासियों में से किसी के लिए भी प्रिय न होनेवाले उस रावण को सताता हुआ (वह चंद्र) इस प्रकार दिखाई पड़ा, जैसे आदिशेष पर शयन करनेवाले विष्णु के द्वारा रावण के वध के लिए भेजा गया चक्रायुध ही हो।

क्षीर-सागर के अमृत को छक-छककर पान करनेवाला चंद्रमा, अपनी शीतल किरणों के समुदाय को चारों ओर व्याप्त करने लगा। वह चंद्रिका टेढ़ी भौंहों और लाल आँखोंवाले रावण को ऐसी लगी, जैसे आग में पिघली हुई चाँदी भर-भरकर चारों ओर छिड़की जा रही हो।

चंद्र-किरणें, जो धरती पर संचरण करनेवाली बिजली-सी लगती थीं, लाल धान के मनोहर खेतों से आवृत मिथिला नगर के राजा की पुत्री के सौंदर्य का वर्णन सुनकर विरह-पीड़ा से तप्त होनेवाले रावण को उसी प्रकार जलाने लगीं, जिस प्रकार कभी पराजित न होनेवाले शत्रु की कीर्ति किसी वीर को जलाती है।

वीर-कंकणधारी यम भी जिसको देखकर भयभीत होता है, उस रावण ने पूछा— मैंने कहा था कि शीतल किरणोंवाले चंद्र को ले आओ, तो जलानेवाली आग और दारुण विष में बुझी हुई तपती किरणों से युक्त सूर्य को कौन ले आया ?

उस समय, कुछ दासों ने भय के साथ निवेदन किया—हे प्रभु ! यह कथन सत्य नहीं है कि जिसे लाने की आज्ञा नहीं हुई थी, उसे हम लाये हैं। अरुण किरणोंवाला सूर्य सदा रथ पर ही आता है। यह चंद्रमा यद्यपि आपको उष्ण किरण-सा लगता है, तो भी विमान पर ही आरूढ़ है।

सर्प के फन के जैसे जघन-तट तथा शीतल वचनों से युक्त रमणियों के प्रति होने-वाले प्रेम की वेदना को उस (रावण) ने इससे पहले कभी नहीं जाना था। वह अब चंद्रमा से अत्यन्त पीड़ित हुआ। अब उसे ज्ञात हुआ कि शीतल और मनोहर कमल-पुष्पों का शत्रु चंद्रमा, यही है। फिर, उस चंद्र से प्रार्थना करने लगा कि हे चंद्र ! तू मेरे प्राणों को ला दे।

रावण कहने लगा—हे नक्षत्रों के पति ! तू क्षीण होता है। तेरा शरीर श्वेत