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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 342, कुल 549 में से

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पृष्ठ 342

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कंब रामायण

उसको तपाने लगा । उसके स्तन उत्तप्त हो उठे । वह क्या उपचार करना है—यह न जानती
हुई स्वर्ण रग के नवपल्लवो की शय्या पर करवटे लेने लगी ।

वीर (राम) का आकार उस क्रूर स्त्री की दृष्टि मे कालमेघ के समान दिखाई
पड़ता । तब वह लज्जित हो उठती, शिथिल हो उठती, चौंक पड़ती, जैसे वह उनको अपने
सम्मुख ही देख रही हो । जब वह आकार अदृश्य हो जाता, तब वह कठोर विरहाग्नि मे
फँस जाती ।

अंजन-समान काले मेघ को प्रभु (राम) ही समझकर वह उसे पकड़कर अपने
स्तनो से लगा लेती । किन्तु, उस मेघ को झुलसकर मिटते हुए देखकर रो पड़ती । क्षुद्र
स्वभाववाली उस राक्षसी की काम-वेदना की कोई सीमा भी थी ?

वह यो तप रही थी, जैसे प्रलय-काल की भीषण अग्नि मे फँस गई हो । फिर भी,
वह मूढ़ स्त्री चक्रधारी (राम) को प्राप्त कर जीवित रहूँगी—इस आशा-रूपी ओषधि से
अपने प्राणो को रोके रही ।

कभी वह (राम से) प्रार्थना करने लगती—तुम क्रूर माया को अधिकाधिक
बढ़ाने की शक्ति रखनेवाले मेरे विष-सदृश हृदय मे आ जाओ और मेरी वेदना को दूर करो ।
कभी कहती—हे अंजन पर्वत ! मुझपर कृपा करो । वह इस प्रकार पीडित हुई, जैसे
उसने विष पी लिया हो ।

प्राण जाने पर भी कामना को न त्यागनेवाली वह (स्त्री) सोचती—(उस स्त्री
के नयन) नीलोत्पल है ? या मीन है ?—ऐसा संदेह उत्पन्न करनेवाले नयन-युगल से युक्त
वह स्त्री (सीता) लक्ष्मी से भी अधिक सुन्दर है । ऐसी दशा मे वह (राम) क्या मुझ
पापी की ओर दृष्टि भी फेरेगा ?

वह सोचती—इस पुरुष के पास रहनेवाली सुन्दरी उत्तम पातिव्रत्यवाली है । रक्त
कमल में वास करनेवाली लक्ष्मी ही है, फिर सोचती—मै उस (पुरुष) पर अनुरक्त होऊँ,
तो भी वह इस वेदना से तस नही होता ।

जब उसकी काम-वेदना इस प्रकार बढ़ रही थी, तब सूर्य इस प्रकार उदित हुआ,
जैसे तीनों लोकों में भरे हुए राक्षस-रूपी गाढ अन्धकार को दूर करने के लिए राम ही उदित
हुए हो ।

उस क्रूर राक्षसी ने प्रभात को देखा और अपने प्राणो को भी सुरक्षित देखा ।
उसने विचार किया—जबतक वह अनुपम सुन्दरी उसके समीप रहेगी, तबतक वह पुरुष आँख
उठाकर भी मुझे नही देखेगा, अतः मैं शीघ्र जाकर उस स्त्री को उठा ले आऊँगी और कहीं
छिपा दूँगी । फिर, उस पुरुष के साथ सुखी जीवन व्यतीत करूँगी ।

उसने (पर्णशाला मे) आकर देखा—राम गोदावरी के सुन्दर घाट पर सध्यो-
पासना मे मग्न हैं, पर उसने यह न देखा कि समीपस्थ घनी छाया से पूर्ण सुरभित उद्यान मे
रहकर उनके अनुज, चंद्र-समान ललाटवाली देवी (सीता) की रक्षा कर रहे हैं ।

उसने सोचा कि यह (सीता) अकेली हैं, मेरा उद्देश्य सफल हुआ, अब सोचते
हुए विलम्ब करना उचित नहीं है। और, कलंकित चित्तवाली वह, कलापी (तुल्य सीता को)