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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 315, कुल 549 में से

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पृष्ठ 315

अररायकाण्ड ३०५

हे धर्म के अनुपम स्वरूप ! सृष्टिकर्त्ता कमलभव से लेकर सब देवो तथा उनमे इतर प्राणिवर्ग के लिए माता और पिता दोनो तुम्ही हो ।

आदि परब्रह्म तुम हो, सब लोक तुम्हारे अधीन हैं। विवेचन से परे अनेक धर्म तुम्हारे चरणो के ही आश्रित हैं। फिर, तुम बच्चक के सदृश क्यो छिपे रहते हो ? यदि तुम प्रकट हो जाओ, तो क्या हानि है ? क्या तुम्हारी यह अनन्त मायामय क्रीडा आवश्यक है ?

हे प्रभु ! तुम अज्ञेय होते हुए भी ( अपने दासो के लिए ) सुलभ-ज्ञेय भी हो। ससार मे ऐसा कोई वछड़ा नही होगा, जो अपनी माता को नही पहचानता हो । ऐसी माता भी नही होगी, जो अपने वछडे को नही पहचानती हो । अखिल सृष्टि की माता बने हुए तुम सबको पहचानते हो । किन्तु, वे सब तुम्हें यथार्थ रूप मे नही पहचानते । यह भी तुम्हारी कैसी माया है ?

संसार के लोग अनेक देवताओ की स्तुति करते हैं। किंतु महात्मा पुरुष तुम्हारे अतिरिक्त अन्य किसी को श्रेष्ठ नही मानते । सदाचार मे स्थिर रहनेवाले वे लोग क्या यह नही जानते कि ब्रह्मा आदि वेदज्ञो के द्वारा आराध्य देव तुम्हारे अतिरिक्त और कोई नही है ?

हे लक्ष्मी से अधिष्ठित सुन्दर वक्षवाले ! हे सदा जागरित रहनेवाले ! अनेक धर्मों के द्वारा आराध्य देवता भी कर्म के बधनो मे पड़े हुए लोगों के समान ही कठोर तपस्या करते रहते हैं। किंतु, तुम्हारे लिए करने योग्य कोई तपस्या नही है । अतएव कर्म-बधनो से मुक्त आत्माओं के सदृश तुम योगनिद्रा मे मग्न रहते हो ।१

तुम स्वयं आदिशेष का रूप धारण करके सुन्दर भूमिदेवी का वहन करते हो । ( वराह के रूप में ) अपने दाँत पर ( इस भूमि को ) धारण करते हो । ( प्रलय-काल मे ) एक ही बार ( एक ही कौर मे ) इस सृष्टि को निगल जाते हो । एक ही पग मे इस सारी पृथ्वी को ढक लेते हो । उस भूमि के प्रति तुम्हारे प्रेम को यदि सुगंधित तुलसी-हारो से अलंकृत तुम्हारे मनोहर वक्ष पर आसीन ( लक्ष्मी ) देवी जान लेंगी, तो क्या वह तुम से रूठ नही जायेंगी ?

हे प्रभु ! तुम्हारे द्वारा सृष्ट प्राणी यदि परम तत्त्व को किंचित् भी पहचान लेंगे और मुक्त हो जायेंगे, तो इससे तुम्हारी क्या हानि होगी ? स्वर्ग एवं इस धरती के निवासियो मे ऐसे लोग भी तो हैं, जो पूर्वकाल मे, तुमने शिवजी को जो भिक्षा दी थी, उस घटना को जानकर, सदेह से (अर्थात्, कौन परम-तत्त्व है, इस शंका से) मुक्त हो गये हैं।२


१. भाव यह है कि भगवान् विष्णु, कर्म-बधन में पडे प्राणियो के समान निद्रित नही हे, वह सजग हैं। किंतु, ऐसो योग-निद्रा में निरत हैं, जिससे अखिल विश्व की रक्षा होती है।
२. भाव यह हे कि शिवजी ने एक बार ब्रह्मा के पाँच शिरो में एक को काट दिया, तो वह कपाल शिवजी के हाथ मे सट गया। बहुत कोशिश करने पर भी वह कपाल उनके हाथ से नहीं छूटा। तब आकाशवाणी हुई कि उसमें भीख माँगते रहो। जब वह कपाल भीख से भर जायगा, तब वह छूट जायगा। शिवजी सर्वत्र भीख माँगते रहे, कितु कपाल भरा नहीं। अंत में विष्णु भगवान् के पास पहुँचे। जब उन्होने भीख दी, तब कपाल एकदम भर गया और हाथ से छूट गया। इस घटना से यह सिद्ध होता है कि विष्णु शिवजी की भी रक्षा करनेवाले हे । —अनु०