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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 230, कुल 549 में से

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पृष्ठ 230

२२० | कंब रामायण

ऐसे सरोवर के समान लगता था, जिसमे रक्त कुवलय दिन मे ही विकसित हो रहे हो ।

उनके नेत्रों से उत्पन्न अश्रु की नदियाँ, उनके वक्ष पर के प्रभूत कुंकुम-लेप और चंदनरस-रूपी कीचड़ से मिलकर मुक्ताहार को वहाती हुई, घने स्तन-रूपी पर्वतो को पार कर गईं और मेखला-युक्त कटि-तट रूपी समुद्र मे जा पहुँची ।

उद्यानो से पूर्ण कोशल देश के प्रभु (दशरथ) की पत्नियो को, उनके कमल-सदृश उज्ज्वल मुखो को आज सूर्य ने भी देखा । स्वर्ग मे रहनेवाला देवेंद्र ही क्यो न हो, जब विपदा उत्पन्न होती है, तब उसे क्या नही भोगना पड़ता है ?—(अर्थात्, असूर्यम्पश्या कही जानेवाली स्त्रियाँ भी राम के वन-गमन का समाचार सुनकर बाहर निकल आईं ।)

माताएँ, वधुजन, आश्रित जन, दूर की रहनेवाली, समीप की रहनेवाली, सब प्रकार की स्त्रियाँ प्रज्वलित अग्नि मे गिरी-सी तड़प उठी और घरो के आँगनो मे और बाहर भर गईं ।

सब लोग चिल्ला उठे । (अयोध्या की जनता) सब दिशाओ मे उमड़े हुए समुद्र के समान बड़ी ध्वनि करती हुई राम को घेरकर चल पड़ी । पर्वत-समान कंधोवाले राम, उनको क्या कहना चाहिए—यह नही जानते हुए और उनको लौटाने का कोई उपाय भी नही देखते हुए अपने प्रासाद की ओर बढ़ चले ।

जो राम उन्नत किरीट को धारण करने के लिए, उत्तम रत्नो से जटिल रथ पर सवार होकर गये थे, वही अब वल्कल पहनकर पुनः उसी सुन्दर तथा विशाल वीथी मे (पैदल) चल रहे थे ।

उनको देखकर कुछ लोग कह रहे थे—अंजन-वर्ण इस प्रभु पर जो विपदा आ पड़ी है, उसे देखकर भी जो प्राण शरीर को छोड़कर नही जा रहे हैं, उन प्राणो तथा उन हृदयो से बढ़कर कठोर वस्तु का हम अनुमान तक नही कर सकते । सचमुच मनुष्य का स्वार्थ विष से भी अधिक क्रूर होता है ।

कुछ लोग कह रहे थे—हम इस प्रतीक्षा में वीथी मे खडे थे कि रामचन्द्र राज-तिलक धारण करके इस मार्ग से लौटेगे, किन्तु अब हम उन्हें धूप से भरी धरती पर यो चलते हुए देख रहे हैं । इस देश मे, जहाँ एक स्त्री इस प्रकार का क्रूर कार्य करती है, नेत्रवान् होकर जन्म लेना ही पाप है ।

कुछ लोग कह रहे थे—क्या यह उचित है कि सारे ससार को अपना बनाने की शक्ति रखनेवाला, ज्येष्ठ पुत्र होकर उत्पन्न होनेवाला, यह राम, व्याघ्रो के निवासभूत अरण्य मे निवास करने के लिए जायें और यो उसे जाते हुए देखकर भी हम चुप रहे ? अहो ! हमारा प्रेम भी अद्भुत सुन्दर है !

कुछ लोग कह रहे थे—क्षत्रिय-कुल को मिटानेवाले परशुराम के बल को भग करनेवाले इस घनश्याम राम ने शक्तिहीन तथा विवेक-भ्रष्ट हुए चक्रवर्ती को देखकर यह नही कहा कि आप हित को छोड़कर धर्म का नाश क्यो करना चाहते हैं ? अतः, यह राम भी इस पृथ्वी के शासन से हटानेवाली उस कैकेयी के ही समान है ।

कुछ लोग कह रहे थे—अपनी सुन्दर कटि मे वल्कल पहने, बड़े दुःख मे अभिभूत