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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 190, कुल 549 में से

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पृष्ठ 190

१८० | कंब रामायण

विधि भी उन ब्राह्मणों की आज्ञा के अनुसार बनने और बिगड़ने को सन्नद्ध रहती हैं। अतः, इहलोक और परलोक में देव-समान वेदज्ञ विप्रों की प्रस्तुति करने के जैसा उत्तम कार्य और कोई नहीं है।

वर्त्तुलाकार चक्रायुध, उज्ज्वल परशु तथा भ्रान्ति-रहित वाणी को शस्त्र के रूप में धारण करनेवाले त्रिमूर्त्ति भी यदि सद्धर्म को, मन की स्वच्छता को तथा दया को छोड़ दें, तो इससे उनका कुछ हित नहीं हो सकता।

स्वभाव से ही न्याय पर दृढ़ रहनेवाले (हे कुमार)। जूआ आदि प्रसिद्ध दुर्व्यसन तुझमें नहीं हैं, फिर भी यह जान लो कि वे दुर्व्यसन सब दोषों की प्राप्ति के हेतु बनते हैं।

यदि हमारे मन में किसी के प्रति विरोध भाव नहीं रहे, तो युद्ध भी शान्त हो जायेंगे (अर्थात्, युद्ध नहीं होंगे), इस प्रकार (युद्ध नहीं करने से) यश की भी हानि नहीं होती, सेना की क्षति भी नहीं होती। जब इस प्रकार हित होना संभव हो, तब शत्रु के समूल नाश की कामना करने की आवश्यकता ही नहीं रह जायगी।

विषयों में प्रवृत्त होनेवाली पञ्चेन्द्रियों को शान्त करके, संपत्ति को बढ़ाकर, निष्पक्षता तथा मन की दृढ़ता के साथ किया जानेवाला शासन ही सच्चा शासन है। हे वत्स! वैसा शासन, तलवार की धार पर खड़े रहकर की जानेवाली तपस्या के सदृश होता है।

भले ही कोई शासक उमापति (शिव) की, गरुडवाहन (विष्णु) की और अनिमेष आठ आँखोंवाले (ब्रह्मा) की भुजाओं की शक्ति से युक्त हो, तथापि उसके लिए भी मन्त्रियों के परामर्श के अनुसार कार्य करना ही हितकारक होता है।

अस्थि-चर्ममय शरीरवाले मनुष्यों तथा वैसे शरीर से रहित अन्य लोगों (अर्थात् देवों) को भी, अपने बलवान् शत्रु पञ्चेन्द्रियों का दमन करने से क्या फल मिल सकता है? तीनों अनादि लोकों में प्रेम से बढ़कर अन्य कोई फलदायक गुण नहीं हैं।

राज्य के प्राण हैं प्रजा, उन प्राणों की रक्षा करनेवाला शरीर हैं राजा। यदि वह राजा धर्म के अनुकूल रहकर सच्ची करुणा पर निश्चित रूप से दृढ़ खड़ा रहे, तो उसके लिए अन्य यज्ञ करने की आवश्यकता ही क्या है?

यदि राजा मधुरभाषी हो, दाता हो, विवेकवान् हो, कर्मनिरत हो, पवित्र हो, ऋजु हो, विजयी हो, न्यायपरायण हो सन्मार्ग से पृथक् न होनेवाला हो, तो उस (राजा) का कभी नाश नहीं होगा।

जो राजा, सदाचार के विरोधी कार्यों से दूर रहकर, सोने को तौलनेवाली तुला के समान निष्पक्ष भाव से रहता है, उसके लिए अच्छे स्वभाववाले मंत्रियों के द्वारा परीक्षा करके, कार्यविशेष के लिए, निर्धारित समय के अतिरिक्त अन्य कोई नेत्र नहीं हैं।

(कभी) परिवर्त्तित न होनेवाली नियति भी, आलोचना से परे सत्कार्यवाले मुनियों की वाणी के अनुसार चलती है, यह जानकर उन (मुनियों) पर दृढ़ श्रद्धा रखनी चाहिए। उसमें उन (मुनियों का) प्रेम (श्रद्धा रखनेवालों की रक्षा के लिए) शस्त्र का काम देगा।