सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 183, कुल 549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 183

अयोध्याकाण्ड १७१

फिर अपने राजा को प्रणाम किया और यथोचित स्थान पर आसीन हुए। वे उचित शब्द तथा अर्थ के ज्ञान से युक्त चक्रवर्त्ती की कृपा-दृष्टि के पात्र बने।

इस प्रकार, जब वे आसीन हो गये, तब चक्रवर्त्ती ने उनके मुखो की ओर क्रम से देखकर कहा, मेरी एक चिरकालिक इच्छा है, मेरी बुद्धि के अनुकूल रहनेवाले आप लोग ध्यान से सुने—

मैं सूर्यकुल के उत्तम राजाओ की परंपरा मे स्थिर रहकर, आप लोगो की सहायता से साठ सहस्र वर्ष से शासन करता रहा हूँ।

मैंने कन्याओ के लिए योग्य पातिव्रत्य रखनेवाली धरती का धर्मपूर्ण शासन किया है और अवतक संसार के प्राणियो का हित करता रहा हूँ। अब मै अपने जीवन को सफल करना चाहता हूँ।

मै तपस्या के योग्य वार्द्धक्य को प्राप्त कर चुका हूँ। अवतक मैं, फनवाले आदि-शेष, दिग्गज, प्रसिद्ध कुलशैल—इन सब के भार को कम करके इस पृथ्वी का भार वहन करता रहा। किन्तु, अव इस भार को वहन करने की किंचित् भी शक्ति मुझमे नही रही।

मेरे कुल में उत्पन्न मेरे पूर्वज, अपने पुत्रो को राज्य का भार देकर स्वयं अरण्य में चले जाते थे और क्रूर इंद्रिय-समुदाय को संयम मे लाकर मोक्ष प्राप्त करते थे। ऐसे राजा (हमारे कुल मे) असख्य उत्पन्न हुए हैं।

समुद्र से आवृत्त धरती मे, स्वर्ग मे, पाताल मे, सर्वत्र मैने शत्रुओ को परास्त किया। अव क्या मै काम आदि अंतःशत्रुओ के वशीभूत रहकर भय के साथ जीवन व्यतीत करूँगा ?

मैने अलक्तक-रस (महावर) लगे हुए कोमल चरणवाली कैकेयी के सारथ्य करते हुए रथ पर आरूढ होकर, कठोर क्रोधवाले दस राक्षसो के रथ को विध्वस्त किया और उन राक्षसो को परास्त किया। ऐसे मेरे लिए, पंचेन्द्रिय-रूपी रथो को, जिन पर मन-रूपी भूत आरूढ रहता है, परास्त करना क्या कठिन कार्य है ?

कोई (क्षत्रिय) जबतक वह शत्रुओ की सेना के साथ युद्ध करते हुए न मरे या उत्तम ज्ञान को प्राप्त न करे अथवा संपत्ति की नश्वरता को देखकर संसार की आसक्ति को न छोड़ दे, तबतक उसे मुक्ति नही प्राप्त होती।

इस ससार के लोगो के लिए इस सत्य को भूलने से बढ़कर हानिकारक विषय और कुछ नही है कि हमारी मृत्यु अवश्य होनेवाली है। यदि विरक्ति-रूपी नौका हमारी सहायता न करे, तो इस जीवन-रूपी समुद्र को हम कैसे पार कर सकते हैं ?

यदि महिमा से पूर्ण वैराग्य तथा उस (वैराग्य) से उत्पन्न होनेवाला सत्यज्ञान--ये दोनो पंख हमारे पास हों, तो हम इस जीवन-रूपी कारागार से मुक्ति पा सकते हैं।

मेरा मन, सुख की परंपरा के जैसे (अर्थात्, सुख की भ्रांति उत्पन्न करते हुए) आनेवाले इन्द्रिय-रूपी शत्रुओ को मिटाकर मोक्ष नामक अनुपम साम्राज्य को पाना चाहता है। अव इस ससार के राज्य को वह (मेरा मन) नही चाहता।

आपलोगो को (मंत्रियो के रूप में) पाने के कारण मै सारे ससार की

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · पृष्ठ 183, कुल 549 में से · SarvaKosh