कामन्दकीय नीतिसार (आचार्य कामन्दक - प्राचीन भारतीय राजनीति शास्त्र)
Kamandakiya Nitisara with Hindi Commentary
आचार्य कामन्दक / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४र्थ सर्ग ] प्रकृति संपत्। २७
आकर, गोचारणेर माठयुक्त, प्रचुर जल युक्त, पवित्र-जनपदविशिष्ट,
रमणीय़, हस्ती युक्त, वन-विशिष्ट, जलपथ ओ स्थलपथ युक्त एवं अदेव-
मातृक अर्थात् बृष्टि व्यतिरेकेओ जेखाने प्रचुर शस्य उत्पन्न हय़—एईरूप
भूमिई ऐश्वर्य्यलाभेर् जन्य प्रशस्त वलिया कथित ॥५१—५२॥
जे भूमिते काँकर ओ प्रस्तर विद्यमान, जे भूमि वने परिपूर्ण,
जाहाते सर्व्वदा तस्करेर प्रादुर्भाव ओ उपद्रव आछे, जे भूमि रूक्ष,
काँटावन युक्त एवं हिंस्र जन्तु ओ सर्प बहुल—एईरूप भूमि भूमिपद-
वाच्यई নহে ॥५३॥
जे जनपदे सकल प्रकार लोकेर जीविकानिर्व्वाह हय़, जाहा
पूर्व्वोक्त भूमिगुणसम्पन्न, जे देश सजल ओ पर्व्वताश्रय़, जे देशे बहु
शूद्र-शिल्पी ओ वणिकदिगेर वास, जे देशे बड़ बड़ चाषी थाके, जे
जनपदेर प्रति लोकेर अनुराग आछे, जाहा शत्रुविद्वेषी, शत्रु-पीड़ा-
सहिष्णु, विस्तीर्ण, नानादेशीय़ लोके परिपूर्ण, जे देशे धर्म्म आछे,
जे देशे अनेक पशु आछे, जे देश धनशाली, जे देशेर नेता
मूर्ख ओ व्यसनी नय़—एईरूप जनपदई प्रशस्त। यत्नेर सहित सेइ
देशेरई वृद्धिसाधनेर चेष्टा करिते हइवे; ताहा हइतेई सकल
उन्नति प्रवर्त्तित हय़ ॥५४-५६॥
पर्व्वत-नदी मरुभूमि एवं वन आश्रय़ करिय़ा सुगभीर অথচ चओड़ा
परिखावेष्टित, उच्च प्राचीर ओ पुरद्वार-युक्त दुर्ग निर्म्माण कर्त्तव्य
अर्थात् गिरिदुर्ग, जलदुर्ग, मरुदुर्ग ओ वनदुर्ग राखिवे। दुर्गेर मध्ये
नगर स्थापन करिवे एवं उहार मध्ये प्रचुर जल, धान्य अर्थात्
खाद्यद्रव्य ओ धन राखिवे; आर जाहाते दुर्गटि सुदृढ़ ओ बहुकालस्थाय़ी
हय़ ताहा करिते हइवे। नरपतिर दुर्ग ना थाकिले तिनि वायु-
विचलित मेघेर अवय़वेर न्याय़ छिन्न भिन्न अवस्था प्राप्त हन ॥५७-५८॥
तीव्रबुद्धिसम्पन्न दुर्गेर विषय़ अनुशीलनकारी व्यक्तिगण जलदुर्ग, गिरिदुर्ग,