कामन्दकीय नीतिसार (आचार्य कामन्दक - प्राचीन भारतीय राजनीति शास्त्र)
Kamandakiya Nitisara with Hindi Commentary
आचार्य कामन्दक / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें২य सर्ग ] विद्याविभाग। १३
अनायासेइ ऐ राजाके वशवर्त्ती करिया फेले। पक्षान्तरे ये राजा शास्त्र
ओ विनय-विधान मानिया चलेन, सेइ नृपति क्षुद्र हइलेओ कखनओ पराभव
प्राप्त हन ना ॥ ६८ ॥ इति—कामन्दकीय नीतिसारे इन्द्रियविजय, विद्या ओ
वृद्ध योग नामक प्रथम सर्ग।
द्वितीय सर्ग।
विद्याविभाग।
ये सकल लोक आन्वीक्षिकी ( तर्कविद्या ), त्रयी (ऋक्, यजुः ओ साम वेद),
वार्त्ता ( कृषि, गोरक्षा ओ वाणिज्य ) एवं दण्डनीति एइ कयटि विद्याय विज्ञ
एवं ऐ सकल शास्त्रोचित व्यवहार करिया थाकेन, सेइ समस्त व्यक्तिगणेर
सहित राजा विनयान्वित हइया ऐ समुदय शास्त्रेर चिन्ता करिबेन ॥ १॥
आन्वीक्षिकी, त्रयी, वार्त्ता एवं दण्डनीति—एइ चारि प्रकार विद्याइ मनुष्य-
गणेर योगेर ( अलब्ध वस्तुर प्राप्तिर ) ओ क्षेमेर ( प्राप्तवस्तुर रक्षार )
कारण हय; अर्थात् एइ चारिटि विद्याइ लोकरक्षार हेतु ॥ २॥ त्रयी, वार्त्ता
एवं दण्डनीति—एइ तिन प्रकार विद्या मनुशिष्यगण कर्तृक कथित
हइयाछे एवं ताँहादेर मते आन्वीक्षिकी विद्या त्रयीर विभागमात्र ॥ ३॥
बृहस्पतिर शिष्यगण बोलेन ये मनुष्येर अर्थइ प्रधान; एइज्न्य वार्त्ता
एवं दण्डनीति एइ दुइटि विद्याइ स्थितिशील। येहेतु एइ दुइटिइ
अर्थकरी विद्या ॥ ४॥ शुक्राचार्य्येर मते दण्डनीतिइ एकमात्र विद्या।
एइ विद्यातेइ समस्त विद्यार आरम्भ ओ प्रतिष्ठा ॥ ५॥ पूर्व्वोक्त चारिटि
विद्याइ विद्या; इहारा प्रत्येके पृथक् पृथक् भावे प्रसिद्धि लाभ
करियाछे; एवं एइ चारि विद्यातेइ लोकरक्षा हइतेछे; इहाइ
आमादिगेर गुरुदर्शन अर्थात् गुरुर उपदेश ॥ ६॥ आन्वीक्षिकी द्वारा
आत्मज्ञान हय; त्रयीते धर्म्म ओ अधर्म्मेर ज्ञान हय; वार्त्ताते अर्थ एवं