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सर्वकोश
कामन्दकीय नीतिसार (आचार्य कामन्दक - प्राचीन भारतीय राजनीति शास्त्र)

कामन्दकीय नीतिसार (आचार्य कामन्दक - प्राचीन भारतीय राजनीति शास्त्र)

Kamandakiya Nitisara with Hindi Commentary

आचार्य कामन्दक / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished164 पृष्ठ

पृष्ठ 156, कुल 164 में से

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पृष्ठ 156

२०श सर्ग ] प्रकाश-युद्ध । १४५
करिबे ॥५६॥ ( पृथिवीपति यत्नवान् हइया व्यूह-रचना पूर्व्वक व्यूहकृत
बलद्वारा शत्रुसैन्यके सयत्ने ध्वंस करिबेन । ) । * । ये स्थाने शत्रुर
दुर्ब्बलसैन्य आछे, ये स्थाने उपजापकृत वा अपसृत-सैन्येर स्थान पूरण
करियाछे एइरूप भेदप्राप्त सैन्य आछे एवं जेखाने क्रुद्ध लुब्ध प्रभृति
दुष्टसैन्य आछे, सेइ स्थाने शत्रुसैन्यदलके ध्वंस करिबे; आर निजेर
सैन्यदलके परिवर्द्धित करिबे ॥५७॥ शत्रुर सारभूतसैन्यके निजेर
द्विगुण सारभूतसैन्यद्वारा पीड़ित करिबे। शत्रुर फल्गुसैन्यके निजेर
सारभूतसैन्य द्वारा पीड़ा दिबे; एवं शत्रुर संहत अर्थात् दुर्भेद्यसैन्यके
निजेर प्रचण्ड गजसैन्य द्वारा मर्दित करिबे ॥५८॥ शत्रुपक्षेर दुर्ज्जय-
हस्तीगणके स्वपक्षीय सिंह-वधे सक्षम एरुप महाहस्ती द्वारा अथवा निपुण-योद्धृ-
पुरुषाधिष्ठित-करिणी-समूह द्वारा समूले निहत करिबे ॥५९॥ ये हस्ती-
समुदय लोहार जालेर वर्म्माय आवृत, सुदृढ़-भावे याहादेर दन्तद्वय बाँधान
हइयाछे, याहारा सुशिक्षित, याहारा मदमत्त, याहारा प्रवीण-योद्धृ-
पुरुषकर्त्तृक अधिष्ठित एवं याहारा प्रबल पदातिगण-कर्त्तृक सुरक्षित—
एइरूप गजेन्द्र समूह द्वारा विपक्षदिगेर सैन्यवध करिबे ॥६०॥ मद-सत्त्व-
गुण-युक्त एकटि गजराज शत्रुदिगेर मिलित सैन्यके वध करिते समर्थ।
क्षितिपतिगणेर जयलाभ हस्तीगणेर उपरइ निर्भर करिया थाके। अतएव
राजा सर्व्वदा अधिक परिमाणे हस्तीसैन्य राखिबेन ॥६१॥
इति कामन्दकीय नीतिसारे गजाश्व-रथ-पत्ति-कर्म्म, पत्ति-अश्व-रथ-गज-भूमि-
निर्णय, दान-कल्पना, व्यूहविभाग ओ प्रकाशयुद्ध नामक विंश-सर्ग ॥
सम्पूर्ण

  • इहा कलिकाता संस्करणेर १९।५७ श्लोक। किन्तु ट्राभाङ्कूर संस्करणे इहा
    बन्धनीर मध्ये आछे; आर टीकाकार इहार उल्लेख करेन नाइ।