सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कामन्दकीय नीतिसार (आचार्य कामन्दक - प्राचीन भारतीय राजनीति शास्त्र)

कामन्दकीय नीतिसार (आचार्य कामन्दक - प्राचीन भारतीय राजनीति शास्त्र)

Kamandakiya Nitisara with Hindi Commentary

आचार्य कामन्दक / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished164 पृष्ठ

पृष्ठ 138, कुल 164 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 138

प्रेरित सैन्य ) एवम् आटविक—एइ छय़ प्रकार सैन्यदल। इहारा पूर्व्व पूर्व्व
बलवान् ; अर्थात् आटविक हइते द्विषत्, द्विषत् हइते सुहृत्, सुहृत् हइते
श्रेणी, श्रेणी हइते भृत एवम् भृत हइले मौल बलवान्। इहादेर
व्यसनओ पूर्व्व पूर्व्व बलवान् ॥ ३ ॥ [ कलिः सं १८।४ ] ॥ सर्व्वदा संकार
अर्थात् सम्मान प्राप्ति, राजार प्रति अनुराग, राजार सहित एकत्र
कथोपकथन ओ एकत्र अवस्थान, एवम् राजार भावे भावित हओय़ा—एइगुलि
मौल-बले वर्त्तमान थाके ; अतएव भृतबल हइते मौलबल गुरुतर ॥ ४ ॥
[ कलिः सं १८।३ ] ॥ सर्व्वदा निकटे वास, हुकुम मात्रेइ उपस्थिति, वृत्ति अर्थात्
वेतन स्वामीर अधीन बलिय़ा भृत्यसैन्य श्रेणीसैन्य अपेक्षाय़ गुरुतर ॥ ५ ॥
राजार सहित संघर्षजन्य क्रोधे तुल्यता, स्वार्थलाभे तुल्यता ( पाठान्तरे—
हर्ष ओ अमर्षे तुल्यता एवम् सिद्धिर अलाभे तुल्यता ) एवम् जनपदबासहेतु
श्रेणीबल मित्रबल अपेक्षाय़ गुरुतर ॥ ६ ॥ ये कोन देशे ओ ये कोन
समये याइते प्रस्तुत बलिय़ा, एकइरूप लाभ बलिय़ा एवम् स्नेहयुक्त
बलिय़ा मित्रबल शत्रुबल अपेक्षाय़ गुरुतर ॥ ७ ॥ आटविक-बल स्वभावतः
अधार्म्मिक लोभी अनार्य्य ओ सत्यभेदी, अतएव एइ आटविक-बल हइते
शत्रुबल गुरुतर ॥ ८ ॥ विपक्ष-ध्वंसेर जन्य कालप्रतीक्षा करिय़ा अवस्थित
शत्रुबल ओ आटविकबल इहारा शत्रुके विनाश करिले अथवा शत्रुर विपद्
ना हइले अर्थात् शत्रुकर्त्तृक इहारा पराभूत हइले, विजिगीषु राजार
निश्चय़इ जय़लाभ हय़ अर्थात् शत्रुबल ओ आरण्यकबल कर्तृक शत्रुध्वंस
हइलेओ जय़ एवम् ऐ पूर्व्वोक्त उभय़ बल शत्रुकर्त्तृक ध्वंस हइलेओ राजार
जय़ हइल, कारण ऐ दुइ सैन्य अविश्वासी। फलतः इहा आंशिक जय़लाभ ॥ ९ ॥
शत्रु उपयाप करिले विशेष भय़ उपस्थित हय़, अतएव शत्रुर सम्बन्धे उपयाप
अर्थात् भेदनीति प्रयोग करिबे, ताहा हइले निश्चय़इ जय़ हइबे ॥ १० ॥
शत्रु स्फीत सारयुक्त ओ अनुरक्त मौलबल द्वारा युक्त हइले, विजिगीषु क्षय़-
व्यय़-सहिष्णु हइय़ा उक्त रूप मौलबल सहाय़ करिय़ा अभियान करिबे