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कामन्दकीय नीतिसार (आचार्य कामन्दक - प्राचीन भारतीय राजनीति शास्त्र)

कामन्दकीय नीतिसार (आचार्य कामन्दक - प्राचीन भारतीय राजनीति शास्त्र)

Kamandakiya Nitisara with Hindi Commentary

आचार्य कामन्दक / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished164 पृष्ठ

पृष्ठ 116, कुल 164 में से

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पृष्ठ 116

১৫শ সর্গ ] সপ্তব্যসন-বর্গ। ১০৫
संक्लेश ( हाजत ), क्षणे क्षणे साक्षीमाना, स्नानादि गात्रसंस्कार ओ
भोगविलासेओ अनादर, व्यायाम-परित्याग, अङ्ग-दौर्बल्य, शास्त्रवाक्ये
उपेक्षा, मलमूत्रेर् वेगधारण, क्षुधा पिपासार पीड़ा सह्य करा—एइ
गुलि नीतिशास्त्र-कुशल पण्डितगण द्यूतक्रीड़ार दोष बलिया उल्लेख
करियाछेन ॥४४–४९॥ द्वितीय लोकपालेर् तुल्य पाण्डुवंशीय-धर्मराज
युधिष्ठिर कपटद्यूतक्रीड़ा करिया भार्य्या पर्य्यन्त हारियाछिलेन। राजा नल
द्यूतक्रीड़ाय् सुबृहत् राज्य हाराइया वनमध्ये धर्मपत्नी दमयन्तीके त्याग करिया
परेर् ( ऋतुपर्ण राजार् ) चाकुरी करियाछिलेन ( सारथि हइयाछिलेन )।
पृथिवीते इन्द्रतुल्य ओ अद्वितीय धनुर्द्धर स्वर्णकान्ति सेइ प्रसिद्ध
रुक्मी द्यूत-व्यसने क्षय-प्राप्त हइयाछिलेन॥ द्यूतक्रीड़ार भयावह दोषे
हतबुद्धि काशी ओ करुषदेशाधिपति दन्तवक्त्रेर्ओ दाँत भाङ्गिया गियाछिल॥
द्यूतक्रीड़ाय् निरर्थक क्रोध जन्मे, अत्यन्त स्नेहेर्ओ क्षय हइया याय् एवं
एकान्त अनुरक्त स्वपक्ष लोकेर् मध्येओ भेद घटिया याय्। ( पाठान्तरे—
हितकारी पक्षेर्ओ भेद घटिया याय् )॥ अतएव राजा केवलमात्र दोषेर्
आकर एइ द्यूतक्रीड़ा त्याग करिबेन। आर मेधावी राजा दर्पान्वित-
व्यक्तिर् ये द्यूतक्रीड़ार आह्वान ताहाओ निवारण करिबेन ॥५०—५१॥
यथाकाले कार्य्य करिते ना पारा; धर्मनाश; अर्थनाश; सर्व्वदा अन्तःपुरे
थाकार जन्य अनुगत प्रकृतिर् कोप; स्त्रीके विश्वास कराय् रहस्यभेद; स्त्रीर्
पक्ष हइया अकार्य्य प्रवृत्ति; [ स्त्रीहेतु ] ईर्ष्या, विद्वेष, क्रोध, निरोध ( जेल
देओया) ( पाठान्तरे—अनुरोध रक्षा करा) एवं साहस—एइगुलि स्त्री-जनित
व्यसन। आर पूर्व्वकथित द्यूतव्यसनान्तर्गत व्यसनगुलिओ इहार सङ्गे धरिते
हइबे। अतएव राज्यरक्षाभिलाषी राजा एइ स्त्री-व्यसन त्याग करिबेन
॥५५-५८॥ स्त्रीमुख-दर्शने चञ्चलचित्त मूढ़ व्यक्तिगणेर् इष्ट-विषय-समुदय यौवनेर्
सहित विनष्ट हय् ॥५९॥
वमन, विह्वलता, संज्ञानाश, विवस्त्रता, असम्बद्ध प्रलाप, हठात् विपदेर्