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सर्वकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 93, कुल 832 में से

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पृष्ठ 93
  • ईशोपनिषदमें 'शक्तिकारणवाद' *
    न चेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमपि ।
    (सौ० ल०)
    शक्तियुक्त ब्रह्म ही कार्य करनेमें समर्थ होता है, अन्यथा
    वह कुछ भी नहीं कर सकता। ब्रह्मवाद निरीह, निष्क्रिय,
    निरञ्जन आदि लक्षणोंवाले परम तत्त्वको बतलाता है, परंतु
    ऐसे लक्षणोंवाले तत्त्वसे सृष्टि-कार्य नहीं हो सकता, न उससे
    सृष्टिका सङ्कल्प ही बन सकता है, न उसमे आविर्भाव-तिरोभाव
    ही हो सकते हैं। अतएव शक्ति-पदार्थको ही जगत्‌का कारण
    मानना पड़ता है। इस मतमें ब्रह्म जीवको भी अन्ततोगत्वा
    धर्मी शक्तिके रूपमें अङ्गीकार कर लिया गया है। इस प्रकार
    सारा विश्व शक्तिमयके रूपमें ही दृष्टिगोचर होता है—
    'सर्वं शाक्तमजीवन्त्‌' (बह्वृच०)
    इस श्रुतिका भाव ही सर्वत्र अनुभूत होता है। 'ईशावास्य-
    मिदम्' इसी अभिप्रायका द्योतक है। इसलिये शक्तिकारणवाद
    ही युक्तिसङ्गत सिद्धान्त है। 'तदेजति तन्नैजति' इत्यादि मन्त्रका
    अर्थ ब्रह्मवादसे ठीक सङ्गत नहीं लग सकता, क्योंकि
    'एजृ कम्पने'का अर्थ क्रियापरक ही है। निष्क्रिय ब्रह्मवाद-
    में यह असम्भव है। इसकी यथार्थ सङ्गति शक्तिकारणवादसे
    ही लग सकती है। इसी प्रकार अन्य मन्त्रोंका अर्थ भी समझना
    चाहिये। द्वैत-विशिष्टाद्वैतवादोंमे तो शक्तिपदार्थ माना ही
    जाता है। शक्तिवादके सर्वथा विपरीत मायावादमे भी इसे
    मानना ही पड़ा है। स्वामी श्रीविद्यारण्यने कहा है—
    वस्तुधर्मा नियम्येरन् शक्त्या नैव यदा तदा ।
    अन्योन्यधर्मसाङ्कर्याद्विप्लवेत् जगत्खलु ॥
    (प० द० ३।३९)
    'वस्तुधर्मको नियमन करनेवाली यदि शक्ति न हो तो
    परस्पर अन्योन्य धर्मका सङ्कर होकर जगत् नष्ट हो जायगा।'
    शक्तिपदार्थ स्वसत्ताशून्य मिथ्या होकर जगत्‌का नियामक
    कैसे हो सकता है, यह एक विचारणीय बात इस मतमें है।
    -शाक्तसिद्धान्तमें शक्तिपदार्थ स्वतन्त्र सच्चिदानन्दस्वरूप माना
    गया है। इसीके अनुसार ईशोपनिषद्‌का अर्थ कैसे सङ्गत होता
    है, इसे यहाँ बताते हैं।
    उपनिषदर्थ-संगति
    काण्व-माध्यन्दिनी दोनों शाखाओंके पाठानुसार इस
    उपनिषद्में एक ही तत्त्वका प्रतिपादन हुआ है। यद्यपि दोनों-
    के पाठोंमें शब्दकृत अनेक भेद हैं तथापि मौलिक अर्थमें भेद
    नहीं है। उपक्रमोपसंहारन्यायसे एक ही पराशक्तिसे आरम्भ
    करके उसीमें उपसंहार किया गया है। 'ईशावास्यमिदं सर्वम्'
    इस मन्त्रमें 'ईशाया आवास्यम्' ऐसा अ ऽ लेनेसे 'ईशा' परा-
    शक्तिरूप परब्रह्मका अभिन्न रूप ही यहाँ अभिप्रेत होता है;
    इसी पराशक्तिका यह सारा संसार वासस्थान है। इसमे त्याग-
    रूपसे अर्थात् उसीका सब कुछ है, उसके प्रसादरूपसे ही
    भोग्य-वस्तुओंका ग्रहण कर मुमुक्षुको अपना निर्वाह करना
    चाहिये । 'ददाति प्रतिगृह्णाति'के अनुसार ही परम सिद्धि प्राप्त
    होती है। यह अर्थ उपक्रमसे कथन कर उपसंहारमें 'योऽसाव-
    सौ पुरुषः सोऽहमस्मि' (१६) इस मन्त्रार्थके द्वारा पराशक्तिमें
    ही उपसहार किया गया है। 'सोऽहम्' यह पराशक्तिका वाचक है।
    सकारः शक्तिरूपः स्याद्धकारः शिवरूपक ।
    उभयोरैक्यमादाय पराशक्तिरुदीर्यते ॥
    इस तन्त्रवचनसे यह स्फुट होता है। प्रथम मन्त्रमें जो
    तत्त्व कहा गया है उसे जान लेनेपर संसारमें कर्म करते हुए
    भी साधक निर्लिप्त रहता है, यह दूसरे मन्त्रका अर्थ है। तीसरे
    मन्त्रमें आत्मज्ञानकी आवश्यकता बतायी गयी है। चौथे-
    पाँचवें मन्त्रोंमें परमात्माका स्वरूपलक्षण बताया गया है,
    छठे-सातवेंमें आत्मज्ञानका फल शोक-मोहकी निवृत्तिरूप
    कहा गया है। आठवेंमें जगत्‌के सञ्चालक सगुण रूपको बताया
    गया है। इस प्रकार प्रथम वर्णक आठ मन्त्रोंका है। शक्तिका
    निर्देश प्रायः स्त्रीलिङ्ग शब्दोंसे ही होता है; परंतु यह नियम
    नहीं है कि पुँल्लिङ्ग, नपुंसकलिङ्गका प्रयोग उसके विषयमें
    वर्जित हो। कवि कालिदासने कहा है—
    न त्वमम्ब पुरुषो न चाङ्गना चित्स्वरूपिणि न षण्ढतापि ते ।
    नापि भर्तुरपि ते त्रिलिङ्गिता त्वां विना न तदपि स्फुरेद्यम् ॥
    इसलिये इन उक्त आठों मन्त्रोंमें पुँल्लिङ्ग, नपुंसकलिङ्ग
    शब्दोंका प्रयोग उक्त अर्थकी सिद्धिमें विरुद्धताका आपादक
    नहीं हो सकता।
    दूसरे वर्णकमें विद्या-अविद्या, सम्भूति-असम्भूतिके रहस्य-
    का वर्णन छः मन्त्रोंमें किया गया है। निर्देश तथा अर्थके
    अनुसार यह अर्थ शक्तिपरक ही है। शेष तीन मन्त्रोंमें उक्त
    अर्थका उपसंहार करके शक्ति-तत्त्वमें पर्यवसान किया गया है;
    एवं अद्वैतकी सिद्धिके लिये जीव-तत्त्वका अभेद 'अस्मि'
    क्रियापदसे बताया गया है। अन्तिम मन्त्रमें क्रममुक्तिके प्रापक
    मार्ग (देवयान) को बताया है, जो मध्यमाधिकारियोंके लिये
    कहा गया है। ईशा, विद्या, अविद्या, सम्भूति, असम्भूति,
    सोऽहम् आदि शक्तिवाचक अनेकों पदोंका प्रयोग उक्त अर्थको