कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 92, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें७८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *
जो पुरुष ज्ञानयोग और कर्मयोगको फलरूपमें एक देखता
है, वही यथार्थ देखता है।'
और भी कहा है—
ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना ।
अन्ये सांख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे ॥
(१३ । २४)
'उस परमात्माको कितने ही मनुष्य तो शुद्ध हुई सूक्ष्म
बुद्धिसे ध्यानके द्वारा हृदयमें देखते हैं; अन्य कितने ही
ज्ञानयोगके द्वारा और दूसरे कितने ही कर्मयोगके द्वारा
देखते हैं अर्थात् प्राप्त करते हैं।'
गीता, उपनिषद् आदि शास्त्रोंमें जितने साधन बतलाये
हैं, उन सबका फल—अन्तिम परिणाम एक ही है और वह
अनिर्वचनीय है, जिसे कोई किसी प्रकार भी बतला नहीं
सकता । जो कुछ भी बतलाया जाता है, उससे वह अत्यन्त
विलक्षण है ।
इस प्रकार यहाँ सगुण-निर्गुणरूप सच्चिदानन्दघन
परमात्माकी भेदोपासना एव अभेदोपासनापर बहुत ही संक्षेपसे
विचार किया गया है । उपनिषदुक्त उपासनाका विषय
बहुत ही विस्तृत और अत्यन्त गहन है । स्थान-सङ्कोचसे
यहाँ केवल दिग्दर्शनमात्र कराया गया है । सुरुचि-सम्पन्न
जिज्ञासु पाठक इस विषयको विशेषरूपसे जानना चाहें तो वे
उपनिषदोंमें ही उसे देखें और उसका यथायोग्य मनन
एंव धारण कर जीवनको सफल करें ।
ईशोपनिषद्में 'शक्तिकारणवाद'
(लेखक—श्री १०८ स्वामीजी महाराज)
सृष्टिके आदिकालसे ही मनुष्य अक्षय सुख और शान्ति-
की प्राप्तिके लिये प्रयत्न करता रहा है। उसीका परिणाम धार्मिक
जगत्में विस्तृत भिन्न-भिन्न सिद्धान्त एव पन्थभेद हैं। प्रारम्भ-
कालमें प्रत्येक पन्थमें अनेकता देखनेमे आती है। पर जब
सतत अभ्याससे राग द्वेष, आग्रह-अहङ्कार आदि अज्ञानजन्य
दोष निवृत्त हो जाते हैं तथा वास्तविकता झलकने लगती है,
तत्र भेदभावका मूल्य जाता रहता है और सर्वत्र एक तत्त्वका
ही अनुगम होने लगता है । इस प्रसङ्गको वैदिक साहित्यके
मूर्धन्य उपनिषद् ग्रन्थोंमे जिस प्रकारसे उपस्थित किया गया है,
वैसा अन्यत्र कहीं भी मिलना अत्यन्त दुर्लभ है।
सनातन कालसे ही तत्त्वज्ञानियोने परमतत्त्वको भिन्न-भिन्न
नाम रूपोंसे अनुभव किया है एव उसीके अनुसार चलकर
उन्होंने सिद्धि प्राप्त की है, क्योंकि चरम लक्ष्यकी प्राप्ति उसी परम
तत्त्वकी उपलब्धिमें है और उसीमें अक्षय सुख एव शान्ति
है। पिता, बन्धु, सखा आदि भावोंके आलम्बनसे जिस प्रकार
सम्बन्ध जोड़कर हम उसे पहचानते हैं, वैसे ही मातृभाव-
से भी उसे प्राप्त करते हैं; इसीका परिणाम शक्तिकी उपासना
है जो कि सनातन कालसे ही हमारे देशमें प्रचलित है और
कृपा, दया, करुणा, स्नेह आदि भावोंकी अभिव्यक्तिके लिये
उपासनामार्गमे अपना श्रेष्ठ स्थान रखती है। स्वामी श्रीराम-
तीर्थजीने अपने अमेरिकाके एक व्याख्यानमें इसे बड़े ही
सुन्दर शब्दोंमे यों कहा है—
"In this country you worship God
as the Father-'My Father which art
in Heaven' But in India God is worshipped
not only as the Father but as the
Mother also The Mother is the dearest
word in the Indian language (Mātājī),
the blessed God the dearest God."
“इस देशमें आप सब ईश्वरकी उपासना पिताके
रूपमें करते हैं, जो कि स्वर्गमें रहता है, पर हिंदुस्थानमें पिता-
के ही रूपमें उसकी उपासना नहीं होती है, बल्कि उसे माता-
के रूपमें भी पूजते हैं। भारतीय भाषामें 'माताजी' यह अत्यन्त
प्रिय शब्द है। यह परम कल्याणका करनेवाला परम प्रिय
ईश्वरतत्त्व है !”
शक्तितत्त्व
नाम-रूपसे व्यक्त सभी पदार्थोंमें शक्तितत्त्व धर्म या गुण-
रूपसे व्यक्त हो रहा है, इसीसे पदार्थका परिचय होता है
और उसका व्यवहार किया जाता है। यह तत्त्व परम सत्ता—
ब्रह्ममे अपृथक् रूपसे विद्यमान है। उपनिषद्के ऋषियोंने
बतलाया है—'देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम्' वास्तवमें यह
तत्त्व देवकी स्वरूपशक्ति है। देवको अचलरूपसे अपनी सत्ता-
में धारण किये हुए है। यह पदार्थ शक्तिके सिवा भिन्न नहीं
हो सकता। इसीलिये आचार्यप्रवर श्रीशङ्करस्वामीने कहा है—
शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुं