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सर्वकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 55, कुल 832 में से

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पृष्ठ 55

उपनिषद्-रहस्य
( लेखक—आचार्य श्रीक्षेत्रकाल साहा, एम० ए० )
हमलोग पाश्चात्त्य विज्ञानकी बातें सोच-सोचकर आश्चर्यमें
डूब जाते हैं। इसीसे आज पाश्चात्य वैज्ञानिकोंके गौरव-गानसे
भारतका गगनमण्डल मुखरित है । सैकड़ों सहस्रों परीक्षालय
और सैकड़ों-सहस्रों लेबोरेटरियाँ बनी हैं, अपूर्व अगणित
यन्त्रसमूह, सुन्दर-सुन्दर एपरेटस स्थान-स्थानपर सजे रक्खे
हैं, विचित्र विद्युदाधार, विपुल रासायनिक सामग्रियाँ, प्रकाण्ड
दूरवीक्षणयन्त्र, निपुणनिर्मित अणु-वीक्षणयन्त्र—सारांश यह
कि चारों ओर विशाल विज्ञान-समारोह है। महान् आयोजन है।
इस विज्ञानयज्ञके धूम्रसे, धूमर छायासे और इसके
अकल्याणमय आलोकसे संसार परिपूर्ण है, और साथ ही
भारतवर्ष भी । इस अमङ्गल-विज्ञान-व्यापारके विपरीत एक
महान् व्यापार प्राचीन कालके भारतवर्षमें था और अब भी है।
यह भी एक सुमहान् विज्ञान-आयोजन है। ज्ञान-विज्ञानकी
अति महती सामग्री-सज्जा है । महान् गभीर विज्ञान-
विद्यानुशीलन—दिग्दिगन्तव्यापी विज्ञानाभियान है। जल-स्थल,
जड़-चेतन, चर-अचर, अनिल-अनल, सरित्-सागर, ग्रह-नक्षत्र,
विद्युत्-नीहारिका, तरु-लता, पशु-पक्षी, कीट-पतङ्ग, प्राण-मन,
मस्तिष्क-हृदय, यहाँतक कि शरीरके प्रत्येक स्नायुमें यह
विशाल विज्ञान-अनुसन्धान प्रचलित था, अब भी समाप्त
नहीं हुआ है—इस भारतवर्षमें ।
इस अनुसन्धानके और इस अनुसन्धानसे उपलब्ध ज्ञान-
विज्ञान और प्रज्ञानराज्यके जीवन्त, ज्वलन्त, अनन्त इतिहास,
आख्यान, व्याख्यान, वितर्क-विचार, विवरण-विश्लेषण हैं—
भारतके वेद, उपनिषद्, पुराण, तन्त्र और दर्शनादि शास्त्र ।
पाश्चात्य विज्ञान है—जड़विज्ञान, प्रपञ्च-विज्ञान और वाह्य
जगत्का विज्ञान । तथाकथित मनोविज्ञान, प्राणविज्ञान आदि
जो कुछ है, सभी वह वाह्य विज्ञान—जड़विज्ञान है, जिसका
निश्चित फल है—अन्धकारमें प्रवेश, अन्तरके समस्त अमृत-
आलोकका निर्वाण एव नित्य मृत्युके दासत्वकी प्राप्ति । वही
बाइबिल-कथित ज्ञानवृक्षका फल है । जो खायेगा, उसीको
मृत्युका किङ्कर बनना पड़ेगा !
परंतु भारतवर्षकी जो असंख्य प्रवाहमयी विज्ञानविद्या
है, वह जडविज्ञान नहीं है; वह है चिद्विज्ञान, वाह्य वस्तु-
विज्ञान नहीं है, वह है—आध्यात्मिक विज्ञान, नित्य तत्त्व-
विज्ञान, सच्चिदानन्द-विज्ञान, अमृत-विज्ञान, आत्म-विज्ञान,
ब्रह्म-विज्ञान और भगवद्-विज्ञान । वह है—सृष्टि-स्थिति,
प्रलय, भूर्भुवःस्वरादि लोक, देव-दानव-गन्धर्वादि जीव-जाति,
जन्म जरा-मृत्यु, सुख-दुःख, पाप-पुण्य और भगवत्स्वरूप-
धाम लीला-परिकर आदिका परमाश्रर्य-विज्ञान, एव वह है इन
उपनिषद्-पुराणादि शास्त्रोंमें । यहाँ जो 'विज्ञान' शब्दका
व्यवहार किया गया है, सो यह शब्दमात्र नहीं है। फिजिक्स,
केमेस्ट्री आदि जिस अर्थमें. विज्ञान हैं, उपनिषद्-पुराण-
तन्त्रादि भी उसी अर्थमें विज्ञान हैं। यह कल्पना नहीं है,
स्वप्न नहीं है। यह सत्य है, अभ्रान्त सत्य है। यह परीक्षित
वस्तुसत्ताकी अव्यभिचारिता है, जिसका न व्यत्यय है, न
व्यतिक्रम है। जिसकी नीति-प्रणालीमे भी अन्यथा नहीं है।
नियमित नित्यतावद्ध विषय है। यही विज्ञानका अर्थ है। गभीर
भावमे विचार करनेपर भारतीय अध्यात्म-विज्ञान इसी अर्थसे
युक्त है। श्रीमद्भागवतमें वेदको ‘प्रपञ्चनिर्माणविधि' बतलाया
गया है। अर्थात् वेदमे प्रकृतिके नियमोंका विचार-विवेचन
भरा है। अतएव वेदादि शास्त्र विज्ञानशास्त्र हैं ।
पाश्चात्य-विज्ञान-परीक्षागार ‘यन्त्रयोग’को अर्थात् एवस-
पेरिमेण्टको लेकर चलता है और यह भारतीय विज्ञान
विशोधित चित्तागार ‘योगयन्त्र'को अर्थात् यम-नियम-आसन-
प्राणायाम प्रत्याहार-ध्यान-धारणा-समाधिके उस आश्चर्यमय
अव्यर्थ एक्सपेरिमेन्टको लेकर चलता है, जो अपने निर्मल
आलोकसे दसों दिशाओंको उद्भासित करके अचिन्तितपूर्व
सत्यसमूहको प्रकाशित करता है—समस्त भ्रान्तियोंको दूर
करता है। पाश्चात्य विज्ञान प्रपञ्च-सर्वस्व है अर्थात् इस दृश्यमान
जगत्के अतिरिक्त अन्य किसीके अस्तित्वको स्वीकार नहीं
करता । कठोपनिषद्की भाषामे वह—
‘अयं लोको नास्ति पर इति मानी’ ( १ । २ । ६ )
—है । भारतीय विज्ञान इस विश्व-जगत्‌को तामसिक
सत्य मानता है, तम समझता है, प्रकाश होनेपर भी यह
अनाद्यन्त ज्योतिकी तुलनामे तमोवत् है । यथार्थ सत्य
और ज्योतिर्मय जगत् इस तमोयवनिकासे आच्छन्न है।—
• 'आदित्यवर्णं तमस_परस्तात् ।' ( श्वेताश्वतर० ३ । ८ )
—उस सहस्रो सूर्यमदृश ज्योतिकी एक किरणमात्र भी
दीख जाती है तो मर्त्य जीव अमृत हो जाता है।
उ० अं० ६—