कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 54, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें४० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *
विश्वे अमृतस्य पुत्रा ' देखो, तुम जिस जगत्मे निवास करते
हो, उसका यथार्थ स्वरूप देखो—
ब्रह्मैवेदममृतं पुरस्ताद् ब्रह्म पश्चाद् ब्रह्म दक्षिणतश्चोत्तरेण ।
अधश्चोर्ध्वं च प्रसृतं ब्रह्मैवेदं विश्वमिदं वरिष्ठम् ॥
( मुण्डक० २ । २ । ११ )
अमृतस्वरूप (मृत्युरहित, विकाररहित, दुःखदैन्यरहित,
नित्यसत्य परमानन्दघन ) ब्रह्म ही इस विश्वके रूपमें लीला
करता हुआ हमारे सामने, पीछे, दाहिने, बायें, ऊपर नीचे
सर्वत्र प्रसारित हो रहा है । ब्रह्म ही इस विश्वका यथार्थ
स्वरूप है और ब्रह्म ही सर्वश्रेष्ठ वरणीय (जीवनका आराध्यतम
आकाङ्क्षणीयतम सत्य ) है । समस्त विश्वमे ब्रह्मस्वरूप-
की साक्षात् उपलब्धि करनेसे ही मानव जीवन परम कल्याणमें
प्रतिष्ठित होता है ।
ऋषि जब अपनी ओर देखते हैं तब अनुभव करते
हैं—'अहं ब्रह्मास्मि' ( मै ब्रह्म हूँ ।) अर्थात् मे क्षुद्र देह-
विशिष्ट, दुर्बलमनोविशिष्ट, सुख-दु खसमन्वित, देश काला-
वस्थापरिच्छिन्न एक जीवमात्र नहीं हूँ, मै तत्त्वतः ब्रह्म
हूँ, मेरी चित्त सत्ता विश्वव्यापी है, सभी मनुष्यों, सभी
जीवों और सभी जड पदार्थोंकी सत्ता मेरी सत्ताके साथ
नित्य एकीकृत है । मेरा भागीदार कोई नहीं है, मुझसे
बड़ा या छोटा कोई नहीं है, सभी मेरी सत्ताकी कुक्षिमें
हैं, कोई सुख-दुःख, जय-पराजय और अभाव अभियोग
मेरा स्पर्श नहीं कर सकता । मैं नित्य शुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वभाव
हूँ । सम्यक् सम्बुद्धचेतन उपनिषदनुभूतिसम्पन्न महामानव
समस्त विश्व-जगत्के साथ अपनी चैतन्यमयी एकताका
अनुभव करके आत्माके परम गौरवकी प्रतिष्ठा करता है ।
उपनिषदने मानवात्माकी इस गौरव वाणीका समस्त विश्वके
मानवोंमें प्रचार किया है ।
ऋषियोंने जैसे अपनेको ब्रह्मस्वरूप अनुभव किया, वैसे
ही सभी मनुष्यों और सभी जीवोंमें ब्रह्मका दर्शन करके
प्रत्येकको प्रकटरूपसे उन्होंने यही कहा—'तत्त्वमसि' ( तुम
वही ब्रह्म हो ) । उन्होंने मानवमात्रके चित्तमे ब्रह्म चेतना-
को जाग्रत् करनेका प्रयास किया । ब्रह्म-चेतनाके जाग्रत्
होनेपर मनुष्योंमें परस्पर भेद विसंवाद नहीं रह सकता ।
सभी शरीरोमे एक ही आत्माकी अनुभूति होनेपर मन बुद्धि-
हृदय अभेदज्ञान एव प्रेमसे भर जाते हैं । जाति भेद, सम्प्रदाय-
भेद, उच्च-नीच-भेद, हेयोपादेय-भेद सभी मनसे मिट जाते हैं ।
समस्त विश्व ब्रह्मधाम, सच्चिदानन्दधाम, सौन्दर्य-माधुर्य-
सिन्धु बनकर आस्वाद्य हो जाता है । उपनिषद् विश्वके
सभी नर नारियोंको ब्रह्मभावसे भावित होकर प्रेमानन्दमय
ब्रह्मधामके निवासी होनेके लिये आह्वान कर रहे है ।
प्रत्येक मनुष्य, प्रत्येक जीव, प्रत्येक पदार्थ और भूत-
भविष्य वर्तमानके समस्त मनुष्य, सभी प्राणी और सभी
पदार्थके समष्टिभूत विश्व-जगत्के यथार्थ तात्त्विक स्वरूपको
उपनिषदोंने जैसे 'सत्य ज्ञानमनन्तम्' ( सत्य, ज्ञान और
अनन्त ) बतलाया है, वैसे ही उसे 'रसमय' मानकर आस्वादन
किया है,—'रसो वै स ।' ब्रह्म रसरूप है, परमास्वाद्य-
स्वरूप है, परम सौन्दर्य-माधुर्य-निकेतन है, परम प्रेमास्पद है ।
यह रसरूप ब्रह्म ही वैचित्र्यमय जगत्मे विभिन्न रूपोंमें प्रकट
होकर अनादि-अनन्तकाल आत्मरमण, आत्मविलास, आत्म-
रसास्वादन कर रहा है । विश्व जगत्मे सर्वत्र ही रसका
विश्राम है, सर्वत्र ही आनन्दकी क्रीड़ा है । विश्वमे जितने भी
सङ्घर्ष, जीवन सङ्ग्राम, घात प्रतिघात और आपात-बीभत्सतामय
युद्ध विग्रह प्रभृति होते है, उन सबमें भी एक अनन्त चैतन्य
घन रसरूप ब्रह्मका ही विचित्र रसविलास चलता है—
उसीका रस-प्रवाह बहता है । उपनिषद्की दृष्टिमे सभी रस-
मय हैं, सभी सुन्दर है, सभी आस्वाद्य है । आनन्दरूपमें,
विज्ञानरूपमे, मनरूपमे, प्राणरूपमे, अन्न या भोग्य जड
पदार्थरूपमे भी एक रसामृतसिन्धु ब्रह्मकी ही आत्माभिव्यक्ति
और आत्मास्वादन हो रहा है ( 'आनन्द ब्रह्म' 'विज्ञान ब्रह्म,'
'मनो ब्रह्म,' 'प्राणो ब्रह्म,' 'अन्न ब्रह्म' ) सम्बुद्ध मानव
चेतनाकी अनुभूतिमें समस्त विश्व-जगत् ही प्रेम और आनन्द
के सहित आस्वाद्य है ।
संसारमें ऐसे दो प्रकारके पुरुष बिरले ही होते हैं
१—जिसने जो माँगा, उसको वही दे देनेवाले ।
२—स्वयं कभी किसीसे कुछ भी न माँगनेवाले ।