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कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

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पृष्ठ 96

पंचम अध्याय-२ ] [ ३४६
जलस्तम्भमथालोक्य कल्कि. सबलवाहन ।
प्रययौ पद्मया राशेरुपरि श्रीनिकेतन. ॥१४॥
गत्वा पार शुक प्राह याहि मे शम्भलालयम् ।१५।
फिर राजा बृहद्रथ ने अपनी पुत्री और जामाता का पूजन कर
उन्हे विदा किया और स्वयं अपनी कारुमती नगरी मे लौट गया ।१२।
फिर कल्किजी ने सेना के सहित समुद्र के जल मे स्नान किया और तभी
वहाँ एक श्रृगाल उस स्तम्भित हुए जल पर होता हुआ पार चला गया
।१६। जब कल्किजी ने जल को इस प्रकार स्तम्भित हुआ देखा तो वे
अपनी सेना और वाहनादि के सहित समुद्र के जल पर चलते हुए पार
हो गये ।१४। समुद्र के पार पहुँच कर उन्होंने शुक के प्रति कहा -हे
शुक ! तुम शम्भल ग्राम स्थित मेरे घर पर जाओ ।१५।
विश्वकर्मकृत यत्र देवराजाज्ञया बहु ।
सद्म सम्बाधममलं मत्प्रियार्थं सुशोभनम् ।१६।
तत्रापि पित्रोर्ज्ञातीनां स्वस्ति ब्रूया यथोचितम् ।
यद्वत्राङ्ग ! विवाहादि सर्वं वक्तुं त्वमर्हसि ।१७।
पश्चाद्यामि वृतस्त्वेकैस्त्वमादौ याहि शम्भलम् ।१८।
कल्केर्वचनमाकर्ण्य कीरो धीरन्ततो ययौ ।
आकाशगामी सर्वज्ञ. शम्भल सुरपूजितम् ।१६।
सप्तयोजनविस्तीर्णं चातुर्वर्ण्यजनाकुलम् ।
सूर्य्यश्मिप्रतीकाश प्रासादशतशोभितम् ।२०।
देवराज इन्द्र की आज्ञा से मेरा प्रिय करने के लिए वहाँ विश्व-
कर्मा ने अनेको शोभा सम्पन्न भवनो का निर्माण किया है ।१६। तुम
वहाँ जाकर मेरे माता-पिता और जाति-बन्धुओ को मेरा कुशल समाचार
देकर विवाहादि का प्रसग उन्हे बताना ।१७। तुम आगे-आगे शम्भल ग्राम
पहुचो, मैं भी सेना सहित पीछे पीछे आ रहा हूँ ।१८। कल्किजी के वचन
सुन कर वह धीर शुक आकाश मार्ग से होता हुआ शीघ्र ही शम्भल ग्राम