कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम अध्याय-२ ] [ ३०६
ततः शेषं मस्तकेन कृत्वा नैवेद्यभुग्भवेत् ।
इत्येतत्कथितं कीर ! कमलानाथसेवनम् ।६।
सका मना कामपूरणाकामृतदायकम् ।
श्रोत्रानन्दकरं देव-गन्धर्व्व-नर-हृत्प्रियम् ।७।
समीरिमं श्रुतसाध्वि भगवद्भक्तिलक्षणम् ।
त्वत्प्रसादात्पापिनो मे कीरस्य भुवि मुक्तिदम् ।८।
किन्तु त्वा काञ्चनमयी प्रतिमां रत्नभूषिताम् ।
सजीवामिव पश्यामि दुर्लभा रूपिणी श्रियम् ।६।
नान्या पश्यामि सदृशी रूपशीलगुणैस्तव ।
नान्यो योग्यो गुणी भर्त्ता भुवनेऽपि न दृश्यते ।१०।
फिर भगवान् का निर्माल्य शेष मस्तक पर धारण करे और नैवेद्य
ग्रहण करे । हे शुक ! कमलानाथ की सेवा का यह विधान मैने तुमसे
कह दिया ।६। इस प्रकार की पूजा से कामना वालो की कामना पूर्ण
होती और कामना न करने वाले को मोक्ष मिलता है । यह कथा देवता,
गन्धर्व और मनुष्य सभी के श्रोत्रो को आनन्द देने वाली है ।७। शुक
बोला—हे साध्वी ! तुमने मुझ पापिष्ठ तोते को भी मोक्ष देने वाली हरि-
भक्ति की विधि कही है, उसे तुम्हारी कृपा से मैंने भली प्रकार सुना है
।८। परन्तु मैं तुम्हे रत्नालकारो से विभूषिता, स्वर्णमयी प्रतिमा के समान
तीनो लोको मे दुर्लभ साक्षात् लक्ष्मी रूप मे देख रहा हूँ ।६।
ससार मे तुम्हारे समान रूप शील और गुणमयी अन्य नारी मुझे दिखाई
नही देती तथा तुम्हारे योग्य कोई अन्य गुणवान् भर्त्ता भी मुझे लोक मे
दिखाई नही देता ।१०।
किन्तु पारे समुद्रस्य परमाश्चर्यरूपवान् ।
गुणवानीश्वर साक्षात्कश्चिदृष्टोऽतिमानुषः ।११।
न हि धातुकृतं मन्ये शरीर सर्व्व सौभगम् ।
यस्य श्रीवासुदेवस्य नान्तर ध्यानयोगतः ।१२।