कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०६ ] [ कल्कि पुराण
लक्ष्मीजी के हृदय को प्रफुल्लित करने वाले हैं, हरि के उन भृकुटि-पत्रो
का मैं स्मरण करता हूँ ।२२। जिनमें मकराकार कुण्डल शोभा पाते हुए
दिशाओं और आकाशको प्रकाशित करते हैं, जो अग्रभाग में चंचल अलकों
के स्पर्श से कुछ संकुचित हुए प्रतीत होते हैं, जो मणिमय किरीट के तीर
पर स्थित हैं, भगवान के उन कानों का मैं स्मरण करता हूँ ।२३। जिस
ललाट में सुगन्धित अद्भुत गोरोचन तिलक नेत्रों में मैत्री भाव प्रकट करता
है, जो ललाट रूपी ब्रह्मधाम मणिमय मुकुट से दीप्तिमान् है, उस नेत्रों
को आनन्द देने वाले हरि के ललाट का मैं स्मरण करता हूँ ।२४।
श्रीवासुदेवचिकुरं कुटिलं निबद्धम् नानासुगन्धिकुसुमैः
स्वजनादरेण । दीर्घं रमाहृदयगाशमने धुनन्तं
ध्यायेऽम्बुवाहरुचिरं हृदयाब्जमध्ये ।२५।
मेघाकारं सोमसूर्यप्रकाशं सुभ्रूनसं चक्रचापेक
मानम् । लोकातीतं पुण्डरीकायताक्षं विद्युच्चैल-
च्छाश्रयेऽहं त्वपूर्वम् २६।
दीनं हीनं सेवया वेदवत्त्या पास्तपैः पूरितं मे
शरीरम् । लोभाक्रान्तं शोकमोहाधिविद्धं कृपा
दृष्ट्या पाहि मा वासुदेव ।२७
जिन कुटिल केशों में सुगन्धित पुष्प गूंथ कर स्वजनों ने वेणी बनाई
तथा जिन चंचल केशों के दर्शन से लक्ष्मीजी का मन शान्त होता है, उन
नील मेघ जैसे दीर्घ एवं मनोहर केशों का मैं हृदय में ध्यान करता
हूँ ।२५। मेघवर्ण वाले चन्द्रमा और सूर्य के समान प्रकाशित, इन्द्र-धनुष
के समान भौंह वाले, विद्युत् जैसे समुज्ज्वल वस्त्र धारण करने वाले, लोका-
तीत, पुण्डरीकाक्ष भगवान् विष्णु की मैं शरण लेता हूँ ।२६। मैं अत्य-
न्त दीन, वेदोक्त सेवा से हीन और पाप-ताप युक्त देह वाला हूँ। मैं
लोभ, शोक, मोह और मानसिक व्यथा से व्यथित हूँ । हे वासुदेव !
अपनी कृपा दृष्टि द्वारा मेरी रक्षा कीजिये ।२७।
ये भक्त्याद्या ध्यायमाना मनोज्ञां व्यक्तिं विष्णोः