कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तम अध्याय
विष्ण्वर्चनं शिवेनोक्तं श्रोतुमिच्छाम्यहं शुभे ।
धन्यासि कृतपुण्यासि शिवशिष्यत्वमागता ॥१॥
अह भाग्यवशादत्र समागम्य तवान्तिकम् ।
शृणोमि परमाश्चर्यं कीराकारनिवारणम् ॥२॥
भगवद्भक्तियोगञ्च जपध्यानविधि मुदा।
परमानन्द-सन्दोह-दान-दक्षं श्रुतिप्रियम् ॥३॥
श्रीविष्णोरर्चनं पुण्यं शिवेन परिभाषितम् ।
यच्छ्रद्धयानुष्ठितस्य श्रुतस्य गदितस्य च ॥४॥
सद्य पापहरं पुंसां गुरुगोब्रह्मघातिनाम् ।
समाहितेन मनसा शृणु कीर यथोदितम् ॥५॥
शुक बोला—हे शुभे ! शिवजी ने भगवान् विष्णु की जो पूजा-
विधि तुम्हे बताई थी, उसे मैं सुनना चाहता हूँ। तुम धन्य हो, तुम
अपने पुण्य कर्म द्वारा भगवान् शिव की शिष्या हो गई हो ।१। मैं भाग्य-
वशात् ही यहाँ आ पहुँचा हूँ । अब मैं अपने शुक-शरीर का निवारण
करने वाली आश्चर्यमयी पूजन विधि का श्रवण करूँगा ।२। भगवान् विष्णु
का जप-ध्यान एवं पूजन की यह विधि भगवद्भक्ति के देने वाली, श्रवण
मे सुखद एवं परमानन्ददायिनी है ।३। पद्मा ने कहा—शिव-वर्णित विष्णु
के पूजन की विधि अत्यन्त पुण्यमयी है । इसके श्रद्धापूर्वक सुनने, अध्ययन
करने या कहने से गोहत्या, गुरुहत्या और ब्रह्महत्या के पाप भी नष्ट हो
जाते हैं । हे कीर ! इसका वर्णन शिवजी ने जिस प्रकार किया था,
उसे समाहित चित्त से सुनो ।४-५।
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