कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयांश—
विंश अध्याय
हे सूत ! सर्वधर्मज्ञ यत्वया कथितं पुरा ।
गङ्गां स्तुत्वा समायाता मुनयः कल्कि सन्निधिम् ।१।
स्तवं तं वद गङ्गायाः सर्वपापप्रणाशनम् ।
मोक्षदं शुभदं भक्त्या शृण्वतां पठता मिह ।२।
शृणुध्वमृषयः सर्वे गङ्गास्तव मनूत्तमम् ।
शोकमोहरं पुंसामृषिभिः परिकीर्त्तितम् ।६।
इयं सुरतरगिणी भवनवारिधेस्तारिणी ।
स्तुता हरिपदाम्बुजादुपगता जगत्संसदः ।
सुमेरुशिखरामरप्रियजला मलक्षालनी ।
प्रसन्नवदना शुभा भवभयस्य विद्राविणी ।४।
भगीरथमथानुगा मुरकरीन्द्रदर्पापहा
महेशमुकुटप्रभा गिरिशिरः पताकासिता ।
सुरासुरनरोरगैर्जभवाच्छुतैः स स्तुता
विमुक्तिफलशालिनी कलुषनाशिनी राजते ।५।
शौनकजी बोले— हे सूतजी ! आप सभी धर्मों के जानने वाले हैं।
आपने कहा था कि मुनिगण गङ्ग जी का स्तवन करके कल्किजी के पास
पहुँचे थे, तो वह स्तव कौन-सा है, जिसके भक्ति-सहित पढ़ने या सुनने
से मोक्ष रूपी मङ्गल की प्राप्ति होती हैं और सभी पापों का नाश होता
है । उसे हमारे प्रति कहिये ।१-२। है सूतजी ने कहा— हे मुनियो ! उस
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