कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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हुई है इसके द्वारा आपके वक्षस्थल की शोभावृद्धि होगी । इस श्रेष्ठ
माला को आप ग्रहण कीजिये ।२८। हे हरे ! आपको आवृत्त करने मे
कोई भी समर्थ नही है । आप अपनी प्रिया लक्ष्मी जी के सहित इस सूत्र-
सथान द्वारा निर्मित शुद्ध वस्त्रावरण को स्वीकार कीजिये ।२६। हे देव !
यह सूत्र प्रजापति द्वारा निर्मित हुआ है इसे आप अपनी पत्नी रुक्मिणीजी
के सहित ग्रहण कीजिये ३०।
नानारत्नसमायुक्त स्वर्णमुक्ताविघट्टितम्
प्रियया सह देवेश गृहाणाभरण मम ।३१।
दधिक्षीरगुडान्नादिपूपलड्डुकखण्डकान् ।
गृहाण रुक्मिणीनाथ सनाथ कुरु मा प्रभो ।३२।
कर्पूरागुरुगन्धाढ्य परमानन्ददायकम् ।
धूप गृहाण वरद वैदर्भ्या प्रियया सह ।३३।
भक्ताना गेहशक्ताना ससारध्वान्तानाशनम् ।
दीपमालोकय विभो ! जगदालोकनादर ।३४।
श्यामसुन्दर ! पद्माक्ष ! पीताम्बर ! चतुर्भुज ! ।
प्रपन्न पाहि देवेश रुक्मिण्या सहिताच्युत ।३५।
हे देवेश ! हे प्रभो ! विभिन्न प्रकार के रत्नो से युक्त एव स्वर्ण
द्वारा निर्मित इन आभूषणो को आप अपनी प्रिया लक्ष्मीजी के सहित
ग्रहण कीजिये ।३१। हे रुक्मिणीनाथ ! यह दधि,दुग्ध,गुड, अन्न, पुआ
लड्ढू एव शर्करादि को ग्रहण करके मुझे सनाथ कीजिये ।३२। हे वरद !
परमानन्द के देने वाली इस कर्पूर और अगर युक्त गन्ध को आप अपनी
प्रिया के सहित स्वीकार कीजिये ।३३। हे विभो ! आप सस-कामी
भक्तो के अन्धकार को नष्ट करने वाले हैं और आदर सहित जगत् को
अपने प्रकाश से आलोकित कर रहे हैं, इस दीपक का अवलोकन कीजिये
।३४। हे श्यामसुन्दर ! हे कमलाक्ष ! हे पीताम्बरधारी चतुर्भुज ! हे
देवेश ! आप रुक्मिणीजी के सहित प्रसन्न होते हुए हमारी रक्षा
कीजिये ।३५।