कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 224, कुल 259 में से
संदर्भ में पढ़ेंषोडश अध्याय-३ ] [ ४७७
कहा ।२६। माया बोली- मै माया हूँ । जब मैने तुम्हारा त्याग कर
दिया है, तब तुम पुनर्जीवन प्राप्त करने की इच्छा क्यो करते हो ? । ३०।
इस पर जीव ने कहा- हे माये ! मैं तो जीवन की इच्छा नही करता,
परन्तु जीवन का श्राश्रय शरीर ही है । मह रूपी अभिमान के बिना
देह धारणा ही किस प्रकार सभव है ? ।३१। माया बोली देह धारण पर
पर जो भेद ज्ञान होता है, तब तुम्हारी बुद्धि उस प्रकार की क्यो होती
है ? जब चेष्टा माया के बिना सम्भव नही, तब माया रहित तुम्हारी
चेष्टा किस प्रकार होती है ? ।३२।
• मां विना प्राज्ञता माये प्रकाशविषयस्पृहा
मायया जीवति मरश्चेष्टते हतचेतनः ।
निःसारः सारवद्भाति गजभुक्तकपित्थवत् ।३४।
मम ससर्जजाता त्व नानानामस्वरूपिणी ।
मा विनिन्दसि कि मूढे स्वैरिणी स्वामिन यथा ।३५।
ममाभावे तवाभाव प्रोद्यत्सूर्ये तमो यथा ।
मामावर्य विभासि त्व रविनवघनो यथा ।३६।
लीलाबीजकुशूलासि मम माये जगन्मये :
नाद्यन्ते मध्यतो भासि नानात्वादिन्द्रिजालवत् ।३७।
जीव ने कहा- हे माये ! तुम्हारी प्राज्ञता मेरे बिना प्रकाशित
नही हो सकती और न फिर विषय मे स्पृहा ही सम्भव है । ३३। माया
बोली- जीव का जीवन धारण माया से ही हो सकता है । माया से
रहित जीव हाथी द्वारा भक्षित कपित्थ फल के समान सारहीन होता है
।३४। जीव बोला- हे मूढ़े ! तूने हमारे ही ससर्ग से उत्पन्न होकर
नाना प्रकार के नाम और रूप धारण कर लिये हैं । स्वामी की निन्दा
करने वाली स्वैरिणी नारी के समान तू हमारी निन्दा क्यो कर रही
है ? ।३५। जैसे सूर्योदय होने पर अन्धकार का अभाव हो जाता है, वैसे
ही मेरे अभाव मे तेरा भी अभाव निहित है । जैसे सूर्य को आवृत्त करता