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कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

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पृष्ठ 189

नृत्यन्तावगायन्तौ विलुठन्तौ स्थिताविह ॥१६॥
कल्केर्नारायणांशस्य अवतार, कलिकक्षयः ।
पुरा विदितवीर्यस्य पृष्टो ब्रह्ममुखाच्छ्रुत ॥२०'|
हे राजागण ! फिर अब हम इस मर्त्यलोक मे उत्पन्न हुए हैं।
परन्तु हमें शालग्राम शिला का वह स्थान और भगवान् विष्णु की कृपा
का अभी तक स्मरण है ।१६। क्योंकि गण्डकी नदी के तट पर मरण
होने पर जन्मो की स्मृति कभी नष्ट नही होती । यह अद्भुत माहात्म्य
उस नदी के जल-स्पर्श का ही है ।१७। यदि उस चक्राङ्कित शिला के
स्पर्श मात्र से मृत्यु के पश्चात् ऐसा शुभ फल होता है, तो भगवान् वासु-
देव की सेवा के फल का तो कहना ही क्या है ? ।१८। यही सोचते हुए
हम कभी हरि-पूजन मे अपने चित्त को एकाग्र करते हैं, कभी हर्ष से
विह्वल होकर नृत्य करने लगते हैं, कभी उनका गुण-गान करते और
भक्ति भाव मे मग्न हो ज ते हैं ।१९। यह समाचार हमे श्री ब्रह्माजी
द्वारा पहिले ही मिल गया था कि कलियुग का क्षय करने के लिए
भगवान् नारायण का अंशावतार होगा । इस प्रकार हम इनके पराक्रम
को भले प्रकार जानते हैं ।२०।
इति राजसभायां स. श्रावयित्वा निजा कथाः ।
ददौ गजानामयुतमश्वाना लक्षमादरात् ॥२१
रथानां षट्सहस्रन्तु ददौ पूर्णस्य भक्तितः ।
दासीनां युवतीनाञ्च रमानाथाय षट्शतम् ॥२२॥
रत्नानि च महार्घाणि दत्त्वा राजा शशिध्वजः ।
मेने कृतार्थमात्मान स्वजनैर्बान्धवैः सह ॥२३॥
सभासद इतिश्रुत्वा पूर्वजन्मोदिताः कथाः ।
विस्मयाविष्टमनसः पूर्णं त मेनिरे नृपम् ।२४।
कल्कि स्तुवन्तो ध्यायन्तो प्रशंसन्त जगज्जना ।
पुनस्तमाहूराजान लक्ष्या भक्तिभक्तयोः ।२५।
इस प्रकार उस सभा में अपना पूर्व प्रसंग कह कर राजा शशि-
ध्वज ने भक्ति-भाव पूर्वक कल्किजी को दस सहस्र गज, एक लाख अश्व,