कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदशम अध्याय ] ४३५
को छोड़ कर शत्रु के अन्तःपुर मे क्यो आ गये यह ? सब मुझे
बताओ ।१५।
शत्रुपत्न्य कथं साधु सेवन्ते मामरिं मुदा ।
शशिध्वज, शूरमानी मूर्च्छित हन्ति नो कथम् ॥१६॥
पाताले दिवि भूमौवा नरनागसुराऽसुराः ।
नारायणस्य ते कल्के केवा सेवा न कुर्वते ॥१७॥
यत्सेवकाना जगता मित्राणा दर्शनादपि ।
निवर्तन्ते शत्रुभावस्तस्य साक्षात्कृतो रिपुः ॥१८
त्वया सार्द्धं मम पतिः शत्रुभावेन संयुगे ।
यदि योग्यस्तदानेतुं कि समर्थो निजालयम् ॥१९॥
तत दासो मम स्वामी अह दासी निजा तव ।
आवयो. सप्रसादाय आगतोऽसि महाभुज ॥२०॥
मुझे शत्रु की यह शत्रु-पत्नियाँ प्रसन्न होती हुई क्यो परिचर्या
कर रही हैं ? जब मैं मूर्च्छित हो गया था, तब इन शूर एव मानी राजा
शशिध्वज ने मेरा सहार क्यो नही कर दिया ? ।१६। रानी बोली-
पाताल, स्वर्ग अथवा पृथिवी पर, नाग, सुर और असुर मे ऐसा कौन
है जो भगवान् कल्कि की सेवा नही करता ? ।१७। संसार जिनका
सेवक और मित्र है तथा जिनके दर्शन मात्र से शत्रु भाव नष्ट हो जाता
है, क्या उनका कोई प्रत्यक्ष रूप से कभी शत्रु हो सकता है ? ।१८।
मेरे पति यदि आपके प्रति शत्रु-भाव रख कर आपसे युद्ध करते तो क्या
वह आपको अपने घर मे इस प्रकार ले आते ? ।१९। हे महाभुज !
मेरे पति आपके दास हैं, इसलिए मैं भी आपकी दासी हूँ । इस प्रकार
हम पर प्रसन्न होकर ही आप स्वयं यहाँ पधारे हैं ।२०।
अह तवैतयोर्भक्तया नामरूपानुकीर्तनात् ।
कृतार्थोऽस्मि कृतार्थोऽस्मि कलिकेव ॥२१॥
अधुनाह कृतयुग तव दासस्य दर्शनात् ।
त्वमोध्वरो जगत्पूज्यसेवकस्यास्य तेजसा ॥२२॥